मैं कौन हूँ? ये एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब २७ सालों के बाद भी मैं नहीं ढूंढ़ पाया हूँ... पर यकीन मानिए रोज कोशिश करता हूँ इस जवाब को ढूंढने का. आखिर मेरा क्या अस्तित्व है... मैं कौन हूँ??? मैं रोज सुबह इसलिए नहीं जागना चाहता कि मुझे उठ कर ऑफिस जाना है, रात को इसलिए नहीं सोना चाहता कि सुबह ऑफिस जाने के लिए उठना है... मैं सोना चाहता हूँ खुद के लिए, जागना चाहता हूँ खुद के लिए... कुछ ऐसा करना चाहता जिससे मुझे ख़ुशी मिले, संतुष्टि मिले, जिस काम को कर मेरा दिल खुश हो... जिससे मुझे गर्व की अनुभूति हो...
मुझसे संपर्क साधना बहुत आसान है... ab8oct@gmail.com पर मेल कर सकते है, http://ab8oct.blogspot.com/, http://humarinayisubah.blogspot.com/ पर मेरे विचारों को पढ़ सकते है....
http://facebook.com/ab8oct या http://twitter.com/ab8oct जैसे सोसल साईट पर मुझसे जुड़ सकते है...
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शनिवार, 6 मार्च 2010

जब कभी अपनों की आँखों में आंसू देखता हूँ

जब कभी अपनों की आँखों में आंसू देखता हूँ, मेरा दिल भी रोने लगता है. तड़प हो उठता है मेरा मन. जी करता है मैं भी जार-जार रोऊँ...

आज भी मैंने एक अपने बहुत अजीज को रोते हुए देखा. हुआ कुछ यों की दिल को उनके बहुत ठेष लगी, आँखों में दो बूँद उतर आये उनकी. मेरे उस अजीज को उनकी माँ ने एक मोबाइल गिफ्ट किया था. सस्ता ही सही पर अनमोल तोहफा था वो उनके लिए. पर आज उनके पति ने वो मोबाइल किसी और को दे दिया. उनके पति को सोंचना चाहिए था उस मोबाइल से मेरे अजीज और उनकी माँ की भावनाएं जुडी हुई थी. मोबाइल भले ही सस्ता था पर मेरे अजीज के लिए तो बहुत अजीज था वो. उनकी माँ बहुत मेहनत से पैसे कमाती है. अपनी तीन बेटियों को अकेले पाला है उनकी माँ ने. अपनी तीनों बेटियों की परवरिश अपने सामर्थ्य से बढ़कर की, उनकी शादी की, और आज भी अपने बेटियों के लिए जीती है वो.

आज जब मेरे अजीज की भावनाओं का ख़याल नहीं रखा गया तो दिल रो आया मेरा. उनकी आँखों में आंसुओं की बूँद देखकर मेरी भी आँखों में पानी आ गए. हमेशा उनके भावनाओं को बड़ी बेदर्दी से टुकड़े टुकड़े कर दिए जाते है पर आज पहली बार उनके आँखों में आंसू देखे मैंने....

सोमवार, 8 फरवरी 2010

भई क्यों नहीं करूँगा?

सुना है वैलेंटाइन डे आ रहा है... सच है क्या? अब सच ही होगा... अब लोग झूट क्यों बोलेंगे... है न? पर ये कमबख्त वैलेंटाइन डे है क्या बला? किसी ने बताया प्यार का दिन होता है... अब बताया तो सच ही बताया होगा... क्योंकि झूट क्यों बतायेगा? पर मेरी समझ में एक बात नहीं आई ये प्यार का एक ही दिन क्यों होता है? मेरे ख्याल से तो प्यार का हर लम्हा होना चाहिए... क्यों गलत कह रहा हूँ क्या? अब मैं क्यों गलत बोलूँगा?

भाई मेरी नजर में तो....
"प्यार का कोई दिन नहीं होता,
कोई एक लम्हा प्यार का नहीं होता...
मैं तो हर सांस में प्यार करता हूँ,
इसलिए तो किसी का नाम मेरे नाम के साथ बदनाम नहीं होता...."

वाह क्या खूब कहा है मैंने... अरे नाराज क्यों हो रहे हो? क्या अपनी बडाई भी नहीं कर सकता मैं? कोई और करता नहीं मैं खुद कर लेता हूँ... गलत करता हूँ क्या? अब मैं गलत क्यों करूँगा? कोई दुश्मनी थोड़े ही है आप लोगों से? नहीं है न?

भई अब आप लोगों से क्या छिपाऊं... मैं भी प्यार करता हूँ... हाँ भई... सच में मैं भी प्यार करता हूँ... क्यों नहीं कर सकता क्या? करता हूँ... छिपाता नहीं... डंके की चोट पर करता हूँ... छिपाना क्यों... कोई गलत थोड़े करता हूँ... अब मैं क्यों गलत करने लगा? सच तो ये है कि बहुतों से प्यार करता हूँ... फिर से चौंक गए... हाँ भई बहुतों से प्यार करता हूँ... इस लिए आप सब लोगों को इस प्यार के एक दिन की बधाई देता हूँ... अब आपको बधाई दे रहा हूँ तो मुझे भी तो दीजिये... क्यों नहीं दीजियेगा क्या? हाँ... हाँ मुझे पता है आप लोग भी मुझे बधाई दीजियेगा... तो भई आप सबको आप लोगों का प्यार मुबारक और प्यार का ये एक दिन "वैलेंटाइन डे" मुबारक... पर दुआ यही करूँगा कि प्यार का हर लम्हा आपको हो मुबारक.... अब दुआ भी नहीं कर सकता क्या? कर सकता हूँ न? भई क्यों नहीं करूँगा? जरूर करूँगा....

बृहस्पतिवार, 28 जनवरी 2010

अलविदा रायपुर...


अभी कुछ ही दिनों पहले तो आया था यहाँ... रायपुर... २५ दिसम्बर २००९. एक महीने से ज्यादा हो गया और पता भी न चला... दीदी और जीजाजी का अच्छा साथ जो मिला, कई नए दोस्त बने और एक रिश्ता भी... एक अनजाना रिश्ता...

जब आया था तो सब कुछ नया था... शहर नया, गलियाँ, दुकानें, लोग सब नए... बिलकुल अनजाने... एक दो दिन तो बहुत खाली खाली सा लगा... पर जल्द ही इस शहर ने मुझे अपना बना लिए... अवन्ती बाई चौक पर सिगरेट की दूकान, जहाँ मैं रोज सिगरेट पीता था, दूकान वाला अब पहचानने लगा है. मेरे पहुँचते ही बिना कुछ कहे Ultra Mild सिगरेट निकाल कर दे देता है. चौक के पास ही दाहिने वाली गली में स्वस्तिक कंप्यूटर, जहाँ मैं रोज अपने लगभग दो घंटे इन्टरनेट पर बिताता हूँ, वो भी मुझे जान गए है, दुसरे दिन ही उन्हें मेरा नाम याद हो गया था. मेरे पहुँचते ही तीन नंबर वाला केबिन मेरे लिए उपलब्ध हो जाता था... चौक पर की चाय दूकान, जहाँ मैं रोज सबेरे अपनी Morning Walk के साथ चाय पीता था. चाय वाले को याद हो चूका है कि मुझे कम चीनी और कड़क चाय पसंद है.
 
देखते देखते एक महिना बीत गया और बिलकुल पता नहीं चला... दीदी के ही ऑफिस में काम करने वाले शीतांशु जी (जो की दीदी के घर के बगल में ही रहते है) से मेरी रोज अच्छी बात-चीत होती है, बिलकुल किसी मित्र की तरह. दीदी के घर के बगल में ही रहने वाले एक दम्पति का लगभग डेढ़ साल का बेटा 'हर्ष' अब मुझसे बहुत घुल मिल गया है. उसे टल्ला (टीवी) देखना बहुत अच्छा लगता है. दीदी के मकान मालिक के कुत्ते को भी नहीं भूल सकता, जो रोज आते जाते समय भूंकता जरूर है (हाँ कभी कभी नहीं भी भूंकता है, चुप-चाप पड़ा रहता है).

करीबन दो साल के बाद अपने सबसे अच्छे दोस्त 'अभिषेक अनंत (रिंकू)' से भी मिला (फ़ोन पर तो लगभग हर हफ्ते बात होती है पर मेरे दिल्ली और उसके नागपुर में रहने के कारण मिलने का मौका नहीं मिल पता). दीदी और जीजाजी के बुलावे पर नागपुर से नव-वर्ष मनाने के लिए रायपुर आया था. १ जनवरी को हमने साथ में थ्री इडीयट्स भी देखी और रात का खाना नए बस स्टैंड के सामने वाले Resturant राजघराना में खाया.



२४ जनवरी को हुए ब्लॉगर मीट को भी नहीं भूल सकता, आखिर मेरे जीवन का पहला मौका था जब मैं किसी गोष्ठी में शामिल हुआ था, जहाँ मुझे कहने का, अपनी कविता सुनाने का मौका मिला. जहाँ मैं डॉक्टर महेश सिन्हा जी, अनिल पुसदकर जी, बी एस पाबला जी, ललित शर्मा जी, राजकुमार जी, संजीत त्रिपाठीजी , अंकुर गुप्ता जी, तोषी जी, सूर्यकांत जी एवं कई अन्य ब्लॉगर एवं पत्रकारों से मिला. अगले दिन कुछ अखबारों में इस ब्लॉगर मीट की चर्चा भी थी और मेरा नाम भी था उस में... पहली बार मेरा नाम किसी अखबार में छपा था... इतना गौरवान्वित और उत्साहित महसूस कर रहा था उस वक़्त जैसे मैंने कोई दुनिया जीत ली हो....


कल यहाँ से जा रहा हूँ, वापस दिल्ली... जिंदगी एक सफ़र है, किसी एक पड़ाव पर नहीं रूकती... कुछ विश्राम के बाद फिर आगे बढ़ जाती है... मुझे भी यहाँ से आगे बढ़ना है... ये एक महीने मेरे जीवन के सबसे अनमोल महीने है... इस में मैंने बहुत कुछ पाया है, यहाँ तक कि इसी एक महीने में मुझे मेरा प्यार भी मिला... इसी एक महीने में मेरा लिखने का जूनून भी वापस जागा... इसी एक महीने में मेरी सोंच में बहुत बदलाव आये... ये एक महिना मेरे जीवन का सबसे अनमोल महिना है... जिसे मैं शायद मरने के बाद भी न भूल सकूँ...


कहते है दुनिया गोल है... देखते है अगर ऐसा है तो फिर आऊंगा यहाँ एक दिन... जरूर आऊंगा... अपने रायपुर से मिलने... बिछड़ने का गम तो है पर साथ ही ख़ुशी भी है कि यहाँ से बहुत सी हसीं यादें ले जा रहा हूँ...


दीदी 'प्रज्ञा प्रसाद', जीजाजी 'राजीव कुमार', अपने लंगोटिया यार 'अभिषेक अनंत (रिंकू)' शीतांशु जी, हर्ष, डॉक्टर महेश सिन्हा जी एव, डॉक्टर नितिन मलिक  को दिल से धन्यवाद देना चाहूँगा, जिन्होंने मेरे इस महीने को यादगार बनाने में अहम् भूमिका निभाई...


अगली बार मिलने तक अलविदा रायपुर...

शुक्रवार, 22 जनवरी 2010

वो अजनबी कौन थे...



दिनांक १८ अक्टूबर, २००७... शाम के लगभग ८ बजे.... दिल्ली के पुष्प विहार इलाके में अकेला टहल रहा था. मन उदास था और अन्दर ही अन्दर रो भइ रहा था मैं. कुछ बूँद आंसुओं के आँखों में भी थे. नौकरी छोड़ी थी उसी दिन मैंने. नौकरी छोड़ने का दुःख नहीं था बल्कि उसके लिए तो संतुष्टि थी, उदास था मन क्योंकि पापा को नाराज हो गए थे मेरे नौकरी छोड़ने से.... अकेले ही सुनसान सड़क पर घूम रहा था. नजरें नीची थी और चेहरा भी झुका हुआ था... हाथ में सिगरेट भी थी....


अचानक किसी ने मुझे टोका "क्या हुआ बेटा? उदास क्यों हो?" नजर उठा कर देखा तो एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति था, चेहरे मैं गजब का आत्मविश्वास और एक अलग ढंग का तेज था. मैंने उनसे कहा नहीं ऐसी कोई बात नहीं बस थोड़ी तबियत ठीक नहीं लग रही.
"तबियत नहीं बेटा तुम्हारा मन खराब है... क्या हुआ जो इतना उदास हो? नौकरी गयी तो गयी."
"नहीं नौकरी की चिंता नहीं है उसे तो मैंने ही छोड़ा है. उसकी तो ख़ुशी है, संतुष्टि भी है और सुकून भी"
"अच्छा मतलब पिता की बात का बुरा मान गए, बेटा वो तुम्हारे पिता है. तुम्हारी उन्हें चिंता होती है इस लिए तो उन्होंने तुम्हे कहा. उनकी बात से क्या उदासी" उन्होंने कहा...
"पर मैंने उन्हें छोड़ने का कारण बताया भी तो था. फिर भी वो मुझे गलत ठहरा रहे है."
"ऐसा नहीं है वो तुम्हे गलत नहीं ठहरा रहे, बल्कि उन्हें तुम्हारे भविष्य की फिक्र है. और उदासी किस बात की... तुमने फैसला अपने दिल से लिया है. दिल से लिया गया फैसला कभी गलत नहीं हो सकता. बेटा हमेशा जब भी कोई उलझन हो दिल की ही सुनना... दिल हमेशा एक ही रास्ता दिखता है चाहे वो गलत हो या सही... पर सिर्फ एक रास्ता, दिमाग की तरह वो उलझन को और बढाता नहीं है. चलो अब उदासी छोडो और मुस्कुराओ..." मेरे चेहरे पर स्वतः ही एक मुस्कान आ गयी...
"अच्छा बेटा अब मैं चलता हूँ." कहकर वो चले गए.


उनके जाते ही दिमाग अचानक से चौंका... अरे उन्हें कैसे पाता कि मैंने नौकरी छोड़ दी है और मेरी पिता जी से कोई बात हुई है जबकि मैं तो उन्हें जानता तक नहीं... तत्काल मैंने पीछे मुड़कर देखा पर सुनसान रास्ते पर कोई नहीं था... दूर चौराहे पर कुछ गाड़ियों के आने जाने का क्रम जरूर नजर आ रहा था. उनके जाने और मेरे पीछे मुड़ने में ३० सेकेंड से ज्यादा का फर्क नहीं होगा, इतनी जल्दी कोई कहाँ जा सकता है... जबकि रास्ते के दोनों ओर बड़ी बड़ी दीवारें है और कोई गली या घर भी नहीं... एक अनजान डर ने मुझे तुरंत अपने कैद में ले लिया और मैं तुरंत वहां से लगभग भागता हुआ अपने घर पहुँच कर ही रुका.... न जाने वो अजनबी कौन थे...

बृहस्पतिवार, 21 जनवरी 2010

अपने वहम, संयोग या सत्य को थोडा और आगे बढाता हूँ...

अपने वहम, संयोग या सत्य को थोडा और आगे बढाता हूँ... 
मेरे पिछले पोस्ट पर "अजय कुमार जी" और "राजीव जी" ने कहा कमरा बदल लेने को... पर मैं इनकी इस बात से इत्तेफाक नहीं रखता... भागना मैंने सिखा नहीं... मैं तो और उसे जानना चाहता हूँ... डरता नहीं मैं इन सब चीजों से... आप लोगों के शब्दों में अगर कहूँ तो यदि भगवान ने इस श्रृष्टि की रचना की है तो उस साए की रचना भी भगवान द्वारा ही हुई होगी. फिर उससे खौफ खाने या भागने का क्या मतलब... अगर मैं मान भी लूँ कि वो आत्मा या साया बुराई को समर्थित है तो भी नहीं भागूँगा... ऐसे तो हम फिर कायर ही कहलायेंगे... आतंकवादी, क्रिमनल, गुंडे तो उस साए से भी खतरनाक है... फिर तो हमें उनसे भी छिप कर भागना चाहिए... पर कहाँ तक और कब तक???


खैर मैं अपने वहम को और थोडा विस्तार देता हूँ तथा कुछ और घटनाओं पर प्रकाश डालता हूँ...


उस साए को मैंने बहुत बार और भी महसूस किया है... कई बार उस साए ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश की है. सिर्फ मेरे फ्लैट के कमरे में ही नहीं... वरण छत पर (मुझे रोज रात खाना खाने के बाद छत पर टहलते हुए सिगरेट पिने की आदत है), बाज़ार में चलते वक़्त अचानक उसका दिखना वो भी दिन के लगभग ३ बजे, साकेत स्थित केंद्रीय विद्यालय के गेट के पास वाली चाई की दूकान पर, और भी अन्य जगहों पर... उसके उपस्थिति का कोई वक़्त नहीं होता. मतलब ऐसा रोज नहीं होता... अगर रोज होता तो मैं विज्ञान को मान लेता और खुद को मानसिक बिमारी का शिकार... पर उसकी उपस्तिथि कभी हफ्ते में एक बार तो कभी किसी महीने में नहीं भी होती थी. उस साए से एक बात तो पक्की हो चुकी है इतने दिनों में कि वो मेरा बुरा नहीं चाहती, बल्कि कुछ है जो बताना चाहती है... पर मैं उसे सुन नहीं पाता, उसे साफ़ साफ़ देख नहीं पाता... मैं जानना चाहता हूँ आखिर क्या है वो? कौन है वो? और क्यों वो मुझे दिखती है या दिखने की कोशिश करती है? पर सवाल अभी भी सवाल ही है... जवाब का इन्तेजार है, शायद जल्द मिल जाये...



थोडा अपनी जिन्दगी में पीछे चलता हूँ जहाँ दो और ऐसी ही घटनाएं मेरे साथ घट चुकी है. आज से लगभग ६ साल पहले वर्ष २००३, स्थान पटना का कुर्जी स्थित मेरा किराये का कमरा, महिना अगस्त का (दिनांक याद नहीं), समय रात के २ बजे (लगभग)... मैं नया नया ही अपने पैत्रिक घर पूर्णिया से पटना आया था अपनी होटल प्रबंधन की पढाई के लिए. कोलेज के पास ही कुर्जी में किराये के कमरे में रहता था. मेरे कमरे से लगा एक बड़ा सा बालकोनी भी था (पीछे की तरफ, बालकोनी के कारण ही उस एक छोटे से कमरे का किराया बाकी कमरों से २०० रुपये ज्यादा था). मुझे देर रात तक पढने की आदत थी (अब देर रात ही पढूंगा न, ९ बजे तो कमरे पर वापस ही आता था). कमरे में बालकोनी में जाने के लिए एक दरवाजा था और दरवाजे के दोनों ओर दो छोटी-छोटी खिड़कियाँ थी. एक खिड़की के समीप मैंने अपना बिस्तर लगा रखा था. गर्मी का ही मौसम था इसलिए बालकोनी की तरफ का दरवाजा और खिड़कियाँ खोल कर ही सोता था और बिस्तर पर अपना सर खिड़की की ओर रखता था. लगभग एक बजे मैं सो गया. कुछ ही देर बाद अचानक मेरी नींद खुली (वैसे मेरी नींद बहुत कड़ी है, और बीच में ढोल-नगाड़ों की आवाज से ही खुलती है). लगा जसे मेरी खिडकी से कोई मुझे देख रहा है. कमरे की बत्ती बंद थी. अँधेरे के अलावा और कुछ दिख तो रहा नहीं था. बाहार दूर से आती किसी रौशनी से हलके तौर पर चीजों को देख सकता था. एक बार तो डर गया कि कहीं कोई चोर तो नहीं. तेजी से उठ कर बैठा और सीधे हाथ स्वीच बोर्ड की ओर चले गए. खिड़की की ओर देखा तो कोई नजर नहीं आया. उठ कर बालकोनी में गया, जैसे ही दरवाजे से बाहर झाँका एक बार को तो मेरे प्राण सुख गए. कोने में एक साया खड़ा था. लगभग एक मिनट तक मैं उस साए को और वो साया मुझे देखता रहा. दिमाग और शरीर पर जोड़ डालने पर भी मैं हिल भी नहीं पा रहा था. जब बहुत जोड़ लगाने पर अपने कदम आगे बढ़ाये तो वो साया धीरे से मुस्कुराते हुए आँखों के सामने से गायब हो गया. मैंने इसकी चर्चा किसी से नहीं की. पर अगले ही दिन मैंने वो कमरा छोड़ दिया तथा अपने मामा के घर (अशोक नगर, कंकडबाग) में शिफ्ट हो गया. मामा का घर खाली ही था क्योंकि हाल ही में उनका ट्रान्सफर पटना से बेगुसराय हो गया था. निचले तल्ले में एक किरायेदार रहते थे. और ऊपर के तल्ले में मामा के घर में मैं रहने लगा (इससे एक फायदा तो हुआ था, किराये के जो ७०० रुपये लगते थे एक छोटे से कमरे के वो नहीं लगने वाले थे और घर भी बड़ा था. सुख सुविधाओं की हर वस्तुओं के साथ).



उस घटना के लगभग ६-७ महीने के बाद महिना शायद मार्च का था एक घटना और घटी. मामा के घर में आगे साइड से दो कमरे थे एक मेरा बेडरूम हो गया था और दूसरा उसके साथ लगा कमरा ड्राविंग रूम था. दोनों कमरे के साथ भी बालकोनी थी जो आगे की साइड में थी कमरे से लगी हुई पर दोनों कमरे की बालकोनी सेपरेट थी. देर रात पढने की आदत तो थी ही (वो जाने वाली भी नहीं थी.) मैं रोज ड्राविंग रूम में ही सोफे पर पढता था और कई बार सोफे पर ही सो भी जाता था. उस रात भी २ बजे तक पढने के बाद सोफे पर ही गया. थोड़ी ही देर में बंद आँखों से ही (नींद पूरी तरह से आई भी नहीं थी उस वक़्त तक) महसूस हुआ कि कोई ठीक मेरे सामने खड़ा है. आँख खोली तो लगभग २ साल का एक बहुत ही खुबसूरत बच्चा मुझे एकटक देख रहा है और धीमे-धीमे मुस्कुरा रहा है. पल भर को डर और बेचैनी से मेरी धडकनें इतनी तेज हो गयी कि लगा दिल बाहर आ जायेगा सीना चीड कर. शरीर बिलकुल कड़ा हो गया. २०-२५ सेकेंड के बाद वो बच्चा हँसता हुआ सीधे बालकोनी की तरफ भागा और गायब हो गया. घर के अन्दर आने का दरवाजा बंद था. सीधी की ग्रिल भी ताले से बंद थी. फिर वो किधर से आ गया. और भागा भी बालकोनी की तरफ. पहली मंजिल से वो कैसे भाग सकता है. रात भर फिर सो नहीं पाया. कुछ दोस्तों से इसकी चर्चा की तो उन्होंने वहम बताया. मैंने भी मान लिया कि सपना या वहम ही होगा... थका हुआ होऊंगा तो ऐसे ख्याल पनप गए होंगे... उसके बाद जब तक पटना में रहा (२००६ तक) फिर कोई घटना नहीं घटी, इससे पहले भी कभी ऐसा नहीं हुआ था.


सच है कि मैं भगवान (जिन्हें लोग कहते है) को नहीं मानता, भुत-प्रेत, आत्मा-परमात्मा, अगला या पिछला जन्म जैसी बातों पर विश्वास नहीं है मेरा... पर इन घटनाओं के बाद पूरी तरह से नकार भी नहीं पाता. बस दिल को तसल्ली दे देता हूँ कि "ALL IS WELL"....

मंगलवार, 1 दिसम्बर 2009

तीन दिनों की खोज...


आज मेरे पास सुनाने को हम दोस्तों का कोई संस्मरण नहीं है. जब दोस्त ही साथ न हो तो उनकी यादों का हम क्या करेंगे? बस यही कुछ हाल मेरा भी है. हम दोस्तों की लिस्ट बहुत लम्बी थी... या यूँ कहें सारे लोग ही हमारे दोस्त थे, चाहे वो चाय-वाला, गोलगप्पे-वाला, सिगरेट वाला, ऑटो-वाला, सब्जी वाला, रिक्शा वाला ही क्यों न हो. इसलिए तो हमें कभी दिक्कत नहीं हुआ करती थी. उन दिनों को इस नए अजनबी शहर में जरूर ढूंढने की कोशिश करती हूँ पर नाकामयाब ही रह जाती हूँ.

हाँ तो हजारों दोस्तों में हम १२ लोग ऐसे थे जो शायद एक-दुसरे के बिना नहीं जी सकते थे. किसी को छींक भी आती तो बाकी दवा खाने दौड़ पड़ते थे. मिनट भर में खबर पूरी दुनिया में फ़ैल जाता, ऐसा लगता जैसे आजतक और स्टार न्यूज़ वाले हमारे ही पीछे पड़े है.

हम १२ दोस्त... मैं (दीपिका कुमारी उर्फ़ दीप), अभिषेक प्रसाद (अवि), राघव सिंह, रश्मि सिन्हा (रैश), अनिकेत वर्मा (अनी), अमित कुमार सिन्हा, सोमा वर्मा, शशांक मल्लिक, अभिषेक अनंत (रिंकू), स्वाति सिन्हा (स्वात), कंचन सिन्हा (कांच) और आशीष कुमार. हम सबके अजीबोगरीब नाम हुआ करते थे, जिनका श्रेय अवि को जाता है. वो मुझे 'डिबिया', रश्मि को 'नानी', कंचन को 'सोना', स्वाति को 'झगडालू', रिंकू को 'चाचा', सोमा को 'सोती माँ', अनिकेत को 'धुंआ' और अमित को 'बोतल' कहा करता था. और हमसब उसे 'बाबूजी' कह कर बुलाते. हम सब के लिए बाबूजी ही था वो, हर बात में रोकना, टोकना... ऐसा मत करो, यहाँ मत जाओ, ये कपडे मत पहनो, देखो इस तरह मत बात करो, लोग क्या कहेंगे... यही उसकी आदत थी. इसलिए हम सबने उसका नाम ही रख दिया था 'बाबूजी'. हम १२ दोस्तों में ही एक हमारा 'पागल गधा' भी है. नाम नहीं बताउंगी क्योंकि  उसे अच्छा नहीं लगेगा.

हम सारे दोस्त बहुत मस्ती करते. शायद ही कोई ऐसा दिन होता जब हम न मिलते. हर शाम हमारी एक साथ गुजरती थी. चाहे कितना भी जरूरी काम क्यों न हो हम शाम खुद के लिए खाली रखते. अवि ने नियम बना रखे थे कि "अगर कोई भी किसी दिन नहीं आया तो उसे अगले ३ दिन के लिए महफ़िल में शामिल नहीं किया जायेगा. कोई अगर समय से लेट पहुँचता है तो उसे भी उस दिन शामिल नहीं होने दिया जायेगा परन्तु उसे सारे समय वहीँ पर बिताना है. वो घर भी लौट कर नहीं जा सकता है और अगर किसी ने ऐसा किया तो उसे ३ दिनों के लिए बेदखल कर दिया जायेगा." हम दोस्तों की महफ़िल शाम ४ बजे लगती थी. ४ से ६ बजे तक लड़के अपनी क्रिकेट की प्रक्टिस किया करते था और हम लडकियां बाहर बैठकर उन्हें खेलते देखती. ६ बजे से ८ बजे तक हमारे घुमने का समय होता था. और साढ़े ८ तक हम सब अपने अपने घरों को पहुँच जाते थे. उन दिनों को याद करती हूँ तो इक्षा होती है तुरंत दौड़ कर वापस उसी समय में पहुँच जाऊं. पर जानती हूँ अब न वो समय रहा और न ही वो दोस्ती.

अभिषेक के ही बनाये हुए नियम थे और एक दिन खुद वही नहीं आया. हम १२ दोस्तों में वो हम सबका सबसे चहेता था. उसकी बात को कोई टाल नहीं सकता था. वो हम सबका केंद्र बिंदु था. अगर कहूँ कि सिर्फ उसके कारण हम सब थे तो गलत नहीं होगा. और वही नहीं आया तो हम सब कुछ छुटा-छुटा सा महसूस कर रहे थे. फ़ोन लगाया, पूरा रिंग हुआ पर किसी ने नहीं उठाया. अगले दिन भी वो नहीं आया. अब तो हमें चिंता हो गयी. ऐसा कभी नहीं हुआ बिना बताये वो कहीं नहीं जाता. कम से कम फ़ोन तो जरूर किया होता उसने. कहीं वो पूर्णिया (उसका पैत्रिक घर) तो नहीं चला गया. हमने उसके घर पूर्णिया भी फ़ोन किया पर मालूम हुआ वो पूर्णिया नहीं आया, बल्कि दो दिनों से उसने वहां भी बात नहीं कि है. हद तो तब हो गयी जब वो तीसरे दिन भी नहीं आया. इन तीन दिनों में हमारा तो दिनचर्या ही बिगड़ गया थी. हम दोस्त मिलते तो थे पर वापस अपने-अपने घर को लौट जाते. रिंकू और अमित दो-तीन बार उसके घर भी गए थे पर वो वहां भी नहीं मिला. अगले दिन रविवार था और हम सब दोस्तों की छुट्टियां भी. हम सबने फैसला किया कि अगले दिन हम सुबह-सुबह ही उसके घर जायेंगे.


अगले दिन रविवार को सुबह ९ बजे मैं, रिंकू, अमित, अनिकेत और रश्मि उसके घर पहुँच चुके थे. पर आश्चर्य उसके घर पर ताला लटका हुआ था. हमें और ज्यादा घबराहट हो गयी. हमने उसके मकान में नीचे रहने वाले उसके किरायेदारों से उसके बारे में पूछा तो उन्होंने कहा वो तो सुबह-सुबह ही कहीं निकला है, और पटना में ही है. हाँ रोज रात को थोडा लेट आज-कल घर आ रहा है. अब तो और भी ज्यादा हम आश्चर्यचकित थे कि वो पटना में ही है और हमसे मिला तक नहीं. रोज कहीं सुबह जाता है और लेट रात वापस आता है. आखिर वो कर क्या रहा है? मैंने उसे अपने मोबाइल से उसके मोबाइल पर फिर कॉल किया. २ रिंग के बाद उसने फ़ोन उठाया.
"हेल्लो कहाँ हो तुम?" मैंने सीधे उससे सवाल किया.
"कहीं नहीं घर पर ही हूँ."
"झूट मत बोल. मैं तेरे घर के सामने खड़ी हूँ."
"इतनी सुबह वहां क्या कर रही हो? मैं बस बगल में ही हूँ. आता हूँ. वहीँ रुको." कहकर उसने फ़ोन काट दिया.

ठीक १३ मिनट के बाद अवि वहां पहुंचा. उसके पहुँचते ही हम लोगों के सवालों की बारिश उस पर शुरू हो गयी. और वो सिर्फ मुस्कुराता हुआ अपने घर का ताला खोला और अन्दर चला गया. हम हैरानी से उसे देखते ही रह गए. थोड़ी देर में उसने ही कहा, "तुम लोगों को अन्दर नहीं आना क्या?" हम सब उसके घर में दाखिल हुए. और फिर वही हमारे सवालों की बारिश शुरू. पर अवि कोई जवाब नहीं दे रहा था बल्कि चुप-चाप अपनी बालकोनी में बैठा हाथों में अखबार लिए पन्ने पलट रहा था. उसके इस तरह जवाब न देने से हम और भी ज्यादा गुस्सा हो रहे थे. जब उसने देखा हम कुछ ज्यादा ही शोर कर रहे है तो उसने धीरे से कहा, "रश्मि किचन में दूध रखा है जरा चाय बना दो सबके लिए. और तुम सब थोडा सांस ले लो फिर आगे हल्ला करना"
"ओह हम हल्ला कर रहे है. तुम तीन दिन आखिर थे कहाँ?" ये सवाल कंचन ने पूछ था जो अभी अभी राघव के साथ घर में दाखिल हो रही थी.
"कहीं नहीं बाबा, थोडा काम में व्यस्त था."
"ऐसा क्या काम था?"
"था मेरा कुछ पर्सोनल काम."
"पर्सोनल? हम दोस्तों में पर्सोनल कब से होने लगा" सवाल रश्मि का था.
"क्यों? नहीं हो सकता क्या?"
"नहीं..." हम सबका एक साथ जवाब था. "तुम तीन से गायब हो, तुमने अपने घर पर भी बात नहीं की है. कोई खबर नहीं तुम्हारा. ऐसा क्या काम था कि तुम्हे किसी चीज का होश नहीं?"
"यार तुम लोग तो पुलिस की तरह पीछे पड़ गए हो."
"जब तक नहीं बताओगे ऐसे ही पूछेंगे और ज्यादा नखरे दिखाओगे तो आज से रहो अपने पर्सोनल काम के साथ. हमसे बात करने की भी जरूरत नहीं." कंचन ने कहा और हम सब भी कंचन की बात से सहमत थे.
"बता मेरे भाई कहाँ था तीन दिन?" रिंकू ने सवाल किया.
"यार मैं किसी को ढूंढ़ रहा था."
"किसको....?"
"एक लड़की को"
"लड़की को और तू.... मजाक तो नहीं कर रहा. कौन है वो? मिली या नहीं? कैसी है? क्यों ढूंढ़ रहा है?" सवालों की बारिश दुबारा चालू हो चुकी थी. हम सब आश्चर्यचकित थे जान कर कि अवि किसी लड़की को ढूंढ़ रहा था. क्योंकि हमने कभी भी अवि को और लड़कों की तरह किसी लड़की के पीछे पागल होते नहीं देखा था.
"पता नहीं यार कौन है वो. मैंने तो उसे सिर्फ एक ही बार देखा है."
"कहाँ रहती है?"
"मालूम नहीं..."
"मालूम नहीं तो उसे ढूंढ़ कहाँ रहे थे?"
"वो मैंने उसे तीन दिनों पहले शाम में रोड नंबर ५ में देखा था. पर अचानक वो गायब हो गयी. फिर पता ही नहीं चला."
"तो तुम उसे रोड नंबर ५ में ढूंड रहे हो?"
"हाँ..." अवि ने बहुत धीरे से जवाब दिया. "कभी न कभी तो उस गली में वो दुबारा दिखेगी न?"
"पागल हो गये हो क्या? पुरे दिन उसी गली में बिता देते हो? तीन दिन से उसी गली में हो?" हम दोस्तों को उसका पागलपन समझ नहीं आ रहा था.
"हाँ..."
"और कह रहे हो हाँ.... नाम नहीं पता, घर नहीं पता, एक बार ही देखा है... और उसके लिए तीन दिन से वहीँ इन्तेजार कर रहे हो..."
अचानक अवि ने जोर से कहा, "हे यार मैंने अभी-अभी उसे देखा."
"कहाँ देखा? यहाँ बैठे बैठे तुम्हे वो कहाँ दिख गयी? सपने में हो अभी तक क्या?"
"नहीं दोस्तों सच में मैंने उसे देखा. सामने वाले घर की छत पर."
"क्या बात कर रहे हो? वो तो ............. घर है न?"
"हाँ यार.... धन्यवाद दोस्तों."
"धन्यवाद पर क्यों?"
"तुम लोग आज अगर नहीं आते तो मैं उसे अभी कैसे देखता? मैं तो उसी गली में उसे ढूंढ़ता रह जाता."
"हाँ ये तो है. पर सिर्फ धन्यवाद से काम नहीं चलेगा, पार्टी चाहिए हमें."
"जरूर मिलेगी... आज शाम में होगी..."

अवि को हँसते मुस्कुराते तो कई बार देखा था. पहली बार उस खुश देख रही थी. उसका ये पागलपन याद आता है तो आज भी हंसी छुट पड़ती है. कोई किसी को सिर्फ एक बार देखकर उसके लिए तीन दिनों तक एक ही जगह कैसे उसका इन्तेजार कर सकता है? शायद हम तो नहीं ही कर सकते थे.... सॉरी अवि... माफ़ करना... बुरा लगा हो तो ये पोस्ट डिलीट कर देना, वैसे भी तुम्हारा ही ब्लॉग है.

शनिवार, 28 नवम्बर 2009

वापस लौट आओ...


अपने पिछले पोस्ट में आप लोगों को मैंने अपने एक "पागल" दोस्त के बारे में बताया था. आज मैं आपको मेरी सबसे अच्छी दोस्त रश्मि के कुछ विचारों से अवगत कराउंगी. रश्मि हमें पटना में मिली थी. अकेली, उदास पर उन सबसे बढ़कर बहुत खुबसूरत. लेकिन उसकी खूबसूरती हमेशा उसकी उदासी के पीछे छिप जाती. बस इसी उदासी ने हमें उसकी ओर खिंच लिया.



कहते है न कुछ लोगों में समझदारी कुछ ज्यादा ही होती है बस ऐसा ही कुछ उसके साथ भी था. कभी-कभी तो उसकी बातों से मुझे गुस्सा आ जाता पर बाकी लोग उसकी तरफदारी कर देते, जिसके कारण मैं उसे कुछ कह नहीं पाती थी. रश्मि हमेशा से कुछ अलग करने के चक्कर में रहती. कभी किसी को तकलीफ में देखा नहीं कि बस लग गयी उसकी मदद करने. किसी गरीब को देखते ही उसमें दया का सागर उमड़ने लगता. उसके विचार हमेशा मुझमें एक खीझ पैदा करते. मैं हमेशा कहती कि इस दुनिया में ऐसा नहीं होता है. पर वो सिर्फ मुस्कुरा कर यही कहती "इसी दुनिया में वो ऐसा करके दिखाएगी." रश्मि हमेशा कहती कि एक दिन वो एक बच्चे को गोद लेगी और उसका पूरा पालन-पोषण करेगी. मैं उसे कहती कि ये सब सिर्फ फिल्मों में होता है. दुसरे के बच्चे को अपना कहना बहुत कठिन होता है.


"किसी नए को जन्म देने से तो बढ़िया है हम किसी मरते हुए को जिंदगी दे." रश्मि हमेशा कहती.


उसके विचार मुझे ही नहीं हम सब दोस्तों को हमेशा बचकाने लगते. पर हमें से एक ऐसा भी था जो उसके विचारों का पूरा समर्थक था. जो हमसे लड़ पड़ता था उसके विचारों को मनवाने के लिए. और वो था हमारा वही "पागल गधा". हम सारे दोस्त उन दोनों का बहुत मजाक उड़ाते, दोनों को हम लोग शायद पागल से ज्यादा नहीं समझते थे. हम सोंचते थे कि बचकाने विचार समय के साथ खुद ख़त्म हो जायेंगे. बस दिन इसी तरह गुजरते गए. एक वक़्त ऐसा आया जब हम सबको पटना छोड़ना था. हमें अपनी आगे की मंजिल तय करनी थी. रश्मि लन्दन चली गयी, कुछ दोस्त बंगलुरु, कुछ चेन्नई, कुछ पुणे शिफ्ट हो गए. मैं, राघव, कंचन और हमारा "पागल गधा" दिल्ली चले आये. लगभग ६ महीनो के बाद रश्मि वापस भारत आ गयी और चेन्नई में शिफ्ट हो गयी. पर शायद चेन्नई उसे रास नहीं आया. कुछ ही महीनो के बाद ३० दिसम्बर २००७ रश्मि एक एक्सिडेंट में हम सबको को हमेशा के लिए छोड़ गयी.


कुछ राज उसके मौत के बाद हमारे सामने आये. जैसे वो हमारे पागल दोस्त को चाहती थी, पर उसने इसलिए कभी नहीं बताया क्योंकि वो गधा तो किसी और को चाहता था. रश्मि ने एक २ साल की बच्ची को गोद ले रखा था. ये खबर हम सब के लिए बिलकुल ३३००० वोल्ट के झटके के बराबर था. क्योंकि उसने कभी भी किसी को इस बारे में नहीं बताया. हम तो सोंचा करते थे ये सब बस रश्मि के दिमाग का फितूर है, पर उस दिन हमने जाना था वो हम सबसे कहीं ज्यादा सम्जह्दार, जिम्मेदार, और ऊँची है. पर तकलीफ की शुरआत तब हुई जब रश्मि के घरवालों ने रश्मि की मौत के बाद उस बच्ची "नैना" को स्वीकारने से मना कर दिया. हम सबने मिलकर फैसला किया कि हम नैना को किसी अच्छे अनाथालय में दाल देंगे तथा सब मिलकर उसकी खर्च की जिम्मेदारी उठाएंगे. पर उसी समय हमारे पागल दोस्त ने हम सबको चौंका दिया ये कहकर कि वो नैना को किसी अनाथालय नहीं भेजेगा, बल्कि वो उसकी परवरिश करेगा. हमने उसे समझाने की बहुत कोशिश की पर वो नहीं माना.


आज २ सालों से हमारा पागल दोस्त नैना को अकेले पाल रहा है. दोनों दिल्ली में रहते थे. नैना अब ४ साल की हो चुकी है और उसे डैडी कहती है. स्कूल भी जाती है. दोनों बहुत खुश है. हाँ मैंने उसे तब चिंतित देखा है जब नैना उससे अपनी माँ के बारे में पूछती है. एक चुप्पी और कुछ झूठ के अलावा उसके पास और कुछ है भी तो नहीं.


हमारे पागल दोस्त ने हमें गलत साबित कर दिया. उसने प्रमाणित कर दिया कि गधा वो नहीं हम है. उसने हम सबको दिखा दिया कि वो हम सबसे कहीं ज्यादा जिम्मेदार और समझदार है. पर किसी भी अच्छे काम में सबसे बड़ा रोड़ा समाज होता है. हमारे दोस्त को भी इसका सामना करना पड़ा. हर तरफ से उससे सवालों की बारिश होती. हर लोग उसे उसकी बेटी से अलग करने की कोशिश करते रहे. २ सालों तक उसने नैना को अपने घर से भी छिपा कर रखा पर आखिरकार २ महीनों पहले उसके घर पर सब मालूम पड़ गया. उसे उसकी बेटी को छोड़ने का दवाब बनने लगा. पर उस गधे ने फिर पागलों जैसा काम कर दिया. उसने अपनी नौकरी छोड़ दी, दिल्ली में उसका जो भी सामान था बेच दिया, अपने परिवार-दोस्तों को छोड़ दिया और किसी को बिना बताये अपनी बेटी के साथ कहीं चला गया.


"गधे तू इतना कमजोर कबसे हो गया रे. हम पर नहीं खुद पर तो तुझे विश्वास था. घर छोड़ना समझदारी की निशानी नहीं है. एक बार तो अपने परिवार के बारे में सोंचो कि वो कितना परेशान है. हम है तुम्हारे साथ... कोई तकलीफ थी तो हमसे बात कि होती. अच्छे काम में तो लाख रुकावटें आएँगी इसका मतलब ये तो नहीं कि तुम उसे छोड़ कर ही भाग जाओगे. प्लीज वापस चले आओ. हम सब मिलकर तुम्हारे घर पर बात करेंगे. हम सब दोस्त तुम्हारे साथ है, हम तुमसे तुम्हारी बेटी को अलग नहीं होने देंगे. लेकिन तुम लौट आओ. अपने लिए नहीं हमारे लिए लौट आओ."

बुधवार, 25 नवम्बर 2009

नंगे पाँव धुप में ४ किलोमीटर

पिछले पोस्ट में मैंने हम ४ दोस्तों के बारे में बताया था. वैसे हम दोस्तों की संख्या बहुत ज्यादा है. रश्मि कहती थी "आप जब जन्म लेते है तो सारे रिश्ते आपको बने-बनाए मिलते है. सिर्फ दोती एक ऐसा रिश्ता है जिसे हम खुद बनाते है." बस इस लिए हमने कभी दोस्त बनाने में कंजूसी नहीं की. हम सब दोस्तों की अपनी अलग-अलग क्वालिटी और हरकतें थी. कोई बहुत मजाकिया था तो किसी को मजाक समझ ही नहीं आता था. इस लिए हम सब दोस्तों ने एक-दुसरे के नामकरण भी कर रखे थे. हम अपने एक दोस्त को "पागल गधा" भी कहते थे. मैं उस दोस्त का नाम नहीं लुंगी, क्योंकि मैं नहीं चाहती कि उसे बुरा लगे. पागल हम उसे इसलिए कहते कि कोई सा भी समय हो हमने उसे कभी सिरियस नहीं देखा था. हमेशा मजाक, मस्ती और फन. वो खुद कहता था कि वो मुर्दे को भी हंसा सकता है. और हम जानते थे वो ऐसा कर सकता था. हम उसे गधा कहते क्योंकि उसकी आदत ही बेवकूफों जैसी थी. उसके लिए उसके परिवार और दोस्त सब कुछ थे. जिन्हें वो अपना एक बार मान लेता उसके लिए कुछ भी कर-गुजरता कभी ये नहीं सोंचता कि किसी काम का क्या अंजाम होगा. उसकी एक प्यार भी थी जिसे वो पागलों की तरह चाहता था. जिसके लिए वो कुछ भी कर सकता था. इस लिए तो हम उसे कहते थे पागल गधा.


अभी कुछ महीनों पहले की ही बात है. मई २००८ की... हमने एक छोटी सी पार्टी राखी थी. रविवार की दोपहर थी. लगभग २ बज रहे होंगे. हम सारे दोस्त पहुँच चुके थे सिर्फ उसे छोड़ कर. कुछ देर बाद हमने उसे आते हुए देखा. हम सबने उसे डांटना शुरू कर दिया. "कहाँ थे इतनी देर? पता है हम आधे घंटे से तुम्हारा इन्तेजार कर रहे है?"

और वो चुप-चाप हमारी डांट सुन रहा था. उसकी आँखों से दो बूंद आंसू ढुलक पड़े. हमें लगा हमने कुछ ज्यादा ही उसे डांट दिया. हम उसे सॉरी कह रहे थे पर उसने कहा..."Don't be sorry. मैं तुम लोगों की डांट के कारण नहीं रो रहा बल्कि दर्द और जलन से आँखों में आंसू है."
"दर्द और जलन? कहाँ?" हमने एक साथ सवाल किया. तभी मेरी नजर उसके पैरों पर पड़ी. वो नंगे पाँव था. उसके पैरों से खून रिस रहा था. तुरंत मैंने उसे बगल राखी बेंच पर बैठने को कहा और उसके पैरों को साफ़ करने लगी. मैंने उससे पूछा.."ये कैसे हुआ? तुम्हारे जूते, चप्पल कहाँ गए? नंगे पाँव क्यों हो?"
"जूते-चप्पल तो घर पर है." उसने मासूमियत से जवाब दिया. उसकी मासूमियत देख कोई भी उस समय उस पर फ़िदा हो सकता था.
"जूते घर पर है? और तुम खाली पैर हो? पागल हो गए हो क्या?" अमित ने उससे पूछा.
""वो मैं देखना चाहता था कि खाली पैर इस गर्मी में चलने पर कितना दर्द होता है..."
"पर क्यों? तुम्हे क्या experiment करने की सूझी?" मैंने तुरंत उससे सवाल किया. इतनी देर में राज दवाइयां और पट्टियां ले आया था.
"कल कोलेज से आते वक़्त उसे (जिसे वो चाहता है) नंगे पैर आना पड़ा था. वो कोलेज से लौट रही थी तो उसकी सैंडल टूट गयी थी. इस गर्मी में वो नंगे पाँव घर चल कर गयी थी कल. रात जब उससे मेरी फ़ोन पर बात हुई थी तो उसने मुझे बताया कि उसके पैरों में बहुत दर्द है और छाले हो गए है." बहुत ही धीरे से उसने हमें उसके नंगे पाँव चलने का कारण बताया.
"और सिर्फ इसलिए तुम भी नंगे पाँव चले आये?" राज ने कहा.
"हाँ, घर से पैदल ही आया हूँ."
"घर से!!!! तुम्हारा घर यहाँ से ४ किलोमीटर दूर है... वहां से तुम पैदल नंगे पाँव?" मैं आश्चर्य से चीख पड़ी.
"सिर्फ चार किलोमीटर. मैं तो और भी चल सकता हूँ अभी."
"अपने पैरों की हालत देखी है तुमने. अगले १० दिन तो अब तुम्हे नंगे पाँव रहने ही होंगे क्योंकि अब तुम जूते तो नहीं ही पहन सकते." मैंने कहा.
"एक बात पूछूं?" अमित ने उससे कहा.
"हाँ-हाँ. दो पूछो."
"तुम उससे इतना प्यार क्यों करते हो?"
"अबे ये क्या पूछ दिया. इसका जवाब तो मेरे पास भी नहीं. पर कोई बात नहीं जिस दिन जवाब मिलेगा सबसे पहले तुझे बताऊंगा. पक्का वादा..."

उसके पैरों में बड़े बड़े छाले हो चुके थे. जगह जगह से खून रिस रहा था उसके बावजूद वो "पागल गधा" सिर्फ मुस्कुरा रहा था. उसे छोड़ कर हम सबके आँखों में आंसू थे.

रविवार, 22 नवम्बर 2009

जीवन के कुछ यादगार पल...

दोस्त शिकायत करते है की मैं ब्लॉग पर कुछ लिखती क्यों नहीं. क्या करूँ एक तो समय नहीं मिलता और दूसरा कोई अच्छी रचना भी इधर बन नहीं पा रही. अपने लास्ट पोस्ट में भी मैंने अभिषेक जी की कविता लिख दी थी, अपनी लिखी कोइ अच्छी कविता मिली ही नहीं थी. आज मैं कोई कविता नहीं लिखूंगी, बल्कि अपने जीवन के अच्छे पलों को याद करुँगी.

हम चार दोस्त थे, मैं, अभिषेक, राघव और रश्मि. हम रोज शाम को एक-दुसरे से मिलते. जैसे शाम को मिलना हमारी जिंदगी का सबसे जरूरी दिनचर्या हो. हम चारो के घर पास पास ही थे. सबसे पहले अभिषेक मेरे घर आता, फिर हम वहां से राघव के घर जाते और तब हम सबसे अंत में रश्मि   को उसके घर से लेते. हम चारो एक साथ फिर टहलने को निकलते. हमारे घर के पास ही एक बाज़ार है, पर हम अपने मोहल्ले की गलियों में ही घुमा करते. मेरी इक्षा होती थी की हम घूमते-घूमते बाज़ार की तरफ भी जाये पर बाकी के तीनो सर्व-सम्मति से उसे ठुकरा दिया करते.

शाम के टहलने के क्रम में ही मुझे याद है कितने ही नए लोगों से हमारी मुलाकातें हुई. कोई किसी का घर ढूंढ़ रहा होता था, किसी को कोई और मदद चाहिए होती थी. मैं इन सबसे परेशान हो जाया करती थी. सोंचती थी लोग कितना तंग करते है. पर बाकी के तीनो ने तो जैसे पूरी दुनिया की मदद करने का ठेका उठा रखा था. हाँ एक चीज और थी, हमें मोहल्ले के सारे लोग पहचानने लगे थे, नाम से तो नहीं पर चेहरे से. हम चारो में हम २ लडकियां थीं और २ लड़के जिसके कारण कोई हमें अच्छी नजर से तो नहीं ही देखता था. ज्यादातर या यूँ कहूँ की लगभग सभी हमें २ प्रेमी जोड़े समझा करते थे. कई लोगों ने तो हमें टोक तक दिया था की ये सब मोहल्ले में नहीं चलेगा. चुकि हम पटना में अकेले रहते थे इसलिए खुल कर मैं उन लोगों का विरोध नहीं कर पाती थी. हाँ उन्हें समझाने की कोशिश जरूर करती थी की हम सिर्फ अच्छे दोस्त है. पर एक बात तो जान गयी थी की उन्हें समझा पाना मुश्किल नहीं असंभव था.

पर हमने कभी भी अपनी दिनचर्या किसी के कहने से नहीं बदली. कभी कभी डर लगता था पर अभिषेक कहता कि डरने की जरूरत नहीं. किसी कहने से कुछ नहीं होता. लोगों को जो सोंचना है उन्हें सोंचने दो. हम जानते है कि हम सही है फिर डर किस बात का. किसी के बाप का न रोड है और न मोहल्ला.

हमारे मोहल्ले के बहार ही एक पानी-पूरी (गोलगप्पे) वाला अपनी दूकान लगाया करता था. रोज टहलने के बाद हम वहां पानी-पूरी खाने जरूर जाते. पानी-पूरी वाले को भी पता था कोई आये या न आये हम जरूर आयेंगे. उसे ये भी याद हो गया था कि मुझे तीखा, अभिषेक को खट्टा, राघव को सुखा और रश्मि को बिना मसाले वाले पानी-पूरी अच्छे लगते है. पानी-पूरी खाने के बाद अभिषेक और राघव का गंतव्य होता बगल का पान-दूकान, क्योंकि उनके अनुसार, अगर घुमने के बाद उन्होंने सिगरेट नहीं पी तो मतलब घूमना व्यर्थ हो गया. अभिषेक और राघव दोनों के अपने अपने फिक्स सिगरेट ब्रांड थे, जो मुझे लगता है कि पटना के आधे से ज्यादा पान-दूकान वालों को याद होगा. क्योंकि मैंने आज तक अभिषेक या राघव को कभी भी दूकान पर जा कर मागते हुए नहीं देखा. वो दूकान पर जाते और दूकान वाला खुद उन दोनों को उनके ब्रांड निकाल कर दे देता.

जब तक दोनों के सिगरेट ख़त्म नहीं हो जाते थे हम थोड़ी देर और टहलते, फिर दोनों मुझे और रश्मि को हमारे घर छोड़ देते और बाज़ार की तरफ निकल जाते एक-एक और सिगरेट पीने के लिए...

मोमेंट्स और भी है... अगली बार...

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