मैं कौन हूँ? ये एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब २७ सालों के बाद भी मैं नहीं ढूंढ़ पाया हूँ... पर यकीन मानिए रोज कोशिश करता हूँ इस जवाब को ढूंढने का. आखिर मेरा क्या अस्तित्व है... मैं कौन हूँ??? मैं रोज सुबह इसलिए नहीं जागना चाहता कि मुझे उठ कर ऑफिस जाना है, रात को इसलिए नहीं सोना चाहता कि सुबह ऑफिस जाने के लिए उठना है... मैं सोना चाहता हूँ खुद के लिए, जागना चाहता हूँ खुद के लिए... कुछ ऐसा करना चाहता जिससे मुझे ख़ुशी मिले, संतुष्टि मिले, जिस काम को कर मेरा दिल खुश हो... जिससे मुझे गर्व की अनुभूति हो...
मुझसे संपर्क साधना बहुत आसान है... ab8oct@gmail.com पर मेल कर सकते है, http://ab8oct.blogspot.com/, http://humarinayisubah.blogspot.com/ पर मेरे विचारों को पढ़ सकते है....
http://facebook.com/ab8oct या http://twitter.com/ab8oct जैसे सोसल साईट पर मुझसे जुड़ सकते है...
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रविवार, 12 सितम्बर 2010

Vacuum मतलब 'बाप की ट्रेन'

Vacuum मतलब 'बाप की ट्रेन'... सुनकर थोड़ा अजीब लग रहा है न? आप और हम इससे पहले यही जानते थे न कि Vacuum (वैक्युम) का हिंदी होता है निर्वात, जहां कुछ भी नहीं हो। निर्वात की स्थिति में गैसीय दाब, वायुमंडलीय दाब की तुलना में न के बराबर होता है। लेकिन वैक्युम का ये मतलब भी सही है, सोच में पड़ गए न!  चलिए जनाब दिमाग पर ज्यादा जोर मत डालिए, सस्पेंस यहीं खत्म करता हूं और बतात हूं कि कैसे होता है वैक्युम मतलब 'बाप की ट्रेन'।
बिहार के कई हिस्सों खास कर जमुई से बख्तियारपुर और गया-जहानाबाद रूट के बच्चे से लेकर बूढे तक कमोबेश वैक्युम का यही मतलब जानते हैं। इनमें से कई लोगों ने तो स्कूल का मुंह तक नहीं देखा है और ना ही अंग्रेजी का A B C ही जानते हैं... लेकिन Vacuum मतलब बखुबी समझते हैं हां ये दीगर बात है कि इसका मतलब उनके लिए थोड़ा जुदा है। इनमें से कई लोग तो काफी पढ़े लिखे भी हैं लेकिन वो भी किताबों में लिखे अर्थ को भूल गए हैं और नए अर्थ को अपना लिया है। हां उच्चारण थोड़ा अपभ्रंशित होकर वैक्युम से वैकम हो गया है। अब नहीं समझे आप...?
अजी इन लोगों के लिए ट्रेन किसी टॉय ट्रेन जैसी चिज है... जहां मन चाहे रोक लो.... गाड़ी चाहे कोई भी हो लोकल, एक्सप्रेस, मेल या सुपरफास्ट लेकिन इन रूटों पर ये चलती है बैलगाड़ी सरीखी। कोई हॉल्ट आया और ट्रेन के वैक्युम सिस्टम में छेड़छाड़ कर गाड़ी को रोक देना इनके लिए बच्चों के खेल जैसा है। ड्राइवर करे भी तो क्या... और मजाल है जो ट्रेन में सवार स्क्वॉड इनके खिलाफ कोई एक्शन ले ले! चाहे तो इनकी मनमानी सहो या फिर कभी किसी ने रोकने की हिमाकत की तो बस मत पुछो... अगले ही दिन तोड़फोड़ और न जाने कितना फसाद! पहले तो ऐसे लोग जबरदस्ती आरक्षित कोचों में घुस आते हैं फिर आपके ही बर्थ पर टांग फैलाकर कहेंगे एमएसटी हैं रोज का आनाजाना है थोड़ी देर चलेंगे...और दिन में बर्थ पर सोना कैसा....(एक तो चोरी ऊपर से सीनाजोरी वाली कहावत तो आपने सुनी ही होगी) ऐसे ऐसे महानुभाव हर स्टेशन पर इतने आएंगे की आपका सफर यूं ही बतियाते-गपियाते कट जाएगा। इनहीं में से चंद लोग दो डब्बों को जोड़ने वाली जगहों पर बैठते हैं ताकि ट्रेन के वैक्युम पाइप से छेड़छाड़ कर ट्रेन को रोका जा सके।
इन लोगों की हरकत से उन्हें थोड़ा फायदा होता है और वे थोड़ी जल्दी घर पहुंच जाते हैं, लेकिन उनकी ऐसी हरकतों से रेलवे को तो नुकसान होता ही है साथ ही उसका खामियाजा हजारों मुसाफिरों को भी भुगतना पड़ता है। खैर उन्हें क्या उनके लिए तो एक ही आदर्श वाक्य है कि 'दुनिया जाए तेल लेने, ऐश तू कर'।

शनिवार, 8 मई 2010

मौत को दावत!

नक्सल प्रभावित जिलों के वाशिदें खौफ में जी रहे हैं तो बगैर संसाधनों के जवान वैसे इलाकों में बेमौत मरने को मजबूर हैं। नक्सली कभी भी कहीं भी कायराना हरकत को अंजाम देते हैं और हमारे खुफिया तंत्र को नेताओं के इशारों पर उनके प्रतिद्वंदियों की बखिया उधेड़ने से फुर्सत नहीं है। शनिवार को बिहार के तीन जिलों में नक्सलियों ने हमला किया तो छत्तीसगढ़ के बीजापुर में धमाका कर 8 जवानों की जान ले ली। इस वारदात में दो आम नागरिक भी घायल हुए हैं।
नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ के बीजापुर में बारूदी सुरंग विस्फोट कर सीआरपीएफ के वाहन के परखच्चे उड़ दिए, इस घटना में 8 जवान शहीद हो गए और दो आम नागरिक भी घायल हुए हैं। सीआरपीएफ के 168वीं बटालियन के जवान बंकर वाहन में सवार होकर बासागुड़ा आवापल्ली से बीजापुर जिला मुख्यालय रवाना हुए थे और पेद्दाकोडेपाल गांव के पास पहुंचने पर नक्सलियों ने बारूदी सुरंग में विस्फोट कर दिया। बताया जा रहा है कि इसके बाद नक्सलियों ने घायल जवानों पर फायरिंग भी की। उधर, बिहार के सीतामढ़ी में पुलिस कैंप पर हमला कर पुलिस जीप में आग लगा दी और पुलिसकर्मियों को बंधक बनाकर उत्पात मचाया। वैशाली में भी उन्होंने एक ट्रक फूंक कर दहशत फैलाने की कोशिश की। इसके अलावा कटिहार के पास केन बम के विस्फोट से रेलवे ट्रैक उड़ा दिया। इस घटना से करीब 6 मिनट पहले पहले नार्थ इस्ट एक्सप्रेस गुजरी थी, जिसमें बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी और पथ निर्माण मंत्री प्रेम कुमार थे। यूं कह लें कि शायद नक्सलियों का निशाना वही थे और किसी चूक की वजह से वो बाल बाल बच गए।
जिन इलाकों में पग-पग पर मौत बिछी हो, हर जंगल नक्सलियों की मौजूदगी की वजह से किसी दोजख से कम नहीं हो, वैसे इलाकों में बिना पर्याप्त सुविधा और संसाधनों के अभाव में केवल हौसले से नहीं लड़ा जा सकता। जवानों को इन इलाकों में अत्याधुनिक हथियारों, इलाके की हर भौगोलिक जानकारी और खुफिया तंत्र की सूचनाओं के बगैर भेजना मौत को दावत देने से कम नहीं है। एसी चैंबर में बैठकर योजनाएं बनाने वाले जाने ये कम समझेंगें और तब तक शायद हम इसी तरह शहीदों की संख्या गिनते रहेंगे।

बुधवार, 7 अप्रैल 2010

खामोश हो गई सांसे


एक हजार नक्सली... पुरानी रणनीति... और 76 जवान बने शिकार। हमले की निंदा हुई... बैठक हुई... बयानबाजी हुई.. बयान आया चूक हो गई। इन सबके बीच सबने कुछ कुछ जरूर कहा... लेकिन बयानों से क्या हमारे वीर वापस लौट आएंगे। केंद्र और राज्य सरकार क्या जबाव देगी उन मांओं को जिनके घर का चिराग बुझ गया... क्या जवाब देगी उन बहनों को जिनकी राखियां कलाइयों को तरसेगी... विधवाओं की सूनी मांग चीख-चीख कर सवाल करेगी... बच्चों की मायूस निगाहें कई खामोश सवालात करेगी?  सवाल सिर्फ सरकार से नहीं उन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं से भी किया जाएगा जो नक्सलियों के पैरवीकार हैं। महज एक दिन पहले ही देश के गृहमंत्री ने दावा किया था कि 2-3 साल में नक्सलियों का नामोंनिशां तक मिटा देंगे... और बस एक दिन बाद ही ये बयान देना पड़ा कि सॉरी, कहीं कहीं चूक हुई हैचूक किसी की भी हो लेकिन कब तक चलेगा ये सब ? सरकार बैठक, समीक्षा और महज बयानबाजी कर अपनी जिम्मेवारियों से नहीं बच सकती। आखिर क्या वजह है कि नक्सली इतनी बड़ी संख्या में योजनाबद्ध तरिके से चक्रव्यूह रचते हैं और जवान उसमें आसानी से फंस जाते हैं। सरकार की खूफियां एंजेसियों और सुरक्षा व्यवस्था में जुटे लोगों को आईपीएल और सानिया-शोएब की शादी से शायद फुर्सत मिल रही हो, तभी तो एक हजार नक्सली नाक के नीचे देश की सबसे बड़ी वारदात को अंजाम देकर बच जाते हैं और नेताओं को शहीदों के शव पर  सियासत का एक और सुनहरा मौका मिल जाता है। कई दशक बीत गए, नक्सली लगातार वारदात करते रहे और संसद के गलियारों तक पहुंचने वाले लोग अपनी-अपनी रोटियां सेकते रहे। चीन और पाकिस्तान से लोहा लेने का दावा करने वाली सरकार मुट्ठी भर नक्सलियों के आगे घुटने टेक देती है... ऐसे में हम अपनी सुरक्षा को लेकर कितनी उम्मीद रख सकते हैं। तमाम संसाधनों के होते हुए भी नक्सलियों के फन को नहीं कुचलना सरकार की लाचारी को बता रही है... या तो सरकार इस मुद्दे पर संजीदा नहीं है या फिर वो इस मुद्दे को खत्म नहीं होने देना चाहती ताकि इसी बहाने वो सियासत करते रहें। लेकिन सवाल उन जिंदगियों का है जो लाल जंग की भेंट चढ़ गए... सवाल उन परिवारों का है जो शहीदों के भरोसे थे और सवाल आपकी-हमारी हिफाजत का है... कई सुलगते सवाल मन को सुलगा रहे हैं... लेकिन जवाब कुछ नहीं मिल रहा? दिल अब भी ये मानने को तैयार नहीं है कि हमने 76 जवानों को खो दिया है... छत्तीसगढ़ लहूलुहान हो गया है और हमारा मन भी।

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

'बेगाने' की शादी में अबदुल्ला दीवाना

सानिया मिर्जा और पाकिस्तान के क्रिकेटर शोएब मलिक के निकाह बात तो आप जानते ही होंगे। जानेंग कैसे नहीं... आखिर अखबारों के पन्ने और न्यूज चैनल्स सानिया को सनसनी जो बनाए हुए हैं। देशभर में कई अहम ख़बरें हैं मसलन जनगणना-2011 की शुरुआत और पढ़ाई का हक कानून का लागू होना... लेकिन इसमें मसाला नहीं है... और टीआरपी के लिए मसाला तो जरूरी है... लिहाजा वो सबकुछ दिखाइए जिसे देखकर लोगों को चटपटा लगे। न्यूज चैनलों में तो सानिया की शादी... दावत.. यहां तक की हनीमून तक की सरगर्मी चल रही है। इस बात को भी चटखारे लगाकर परोसा जा रहा है कि लाहौर में निकाह के बाद वो वापस हैदराबाद लौटेंगी या हनीमून के लिए मॉरीशस या सेशेल्स रवाना होंगी? इधर हिंदी फिल्मों की तरह 'वो' फैक्ट की भी एंट्री हो चुकी है। भावी मियां-बीवी के बीच एक और आ गई है और अपना दावा जता रही है... तो चैनलों पर इस बात की बहस भी है कि तथाकथित निकाह वैध है भी या नहीं। आयशा और शोएब की मुलाकात 2001 में दुबई में एक रेस्तरां में हुई थी और बाद में चैटिंग के जरिए प्यार परवान चढ़ा... और फोन पर ही निकाह हो गया। लेकिन गड़बड़ी तब हो गई जब शोएब को ये पता चला कि जिसे समझकर ये सबकुछ हुआ... वास्तव में वो लड़की कोई और थी। इधर, भविष्य में सानिया के भारत या पाकिस्तान से खेलने पर भी खूब हो हल्ला हो रहा है। तो बहू की छोटी स्कर्ट पर होनेवाली सास की नाराजगी भी मसाला साबित हो रही है। यानि चैनलों को मसाले की दरकार थी तो हो लिए 'बेगाने' की शादी में अबदुल्ला दीवाना.. क्यों आप क्या कहते हैं?

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