मैं कौन हूँ? ये एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब २७ सालों के बाद भी मैं नहीं ढूंढ़ पाया हूँ... पर यकीन मानिए रोज कोशिश करता हूँ इस जवाब को ढूंढने का. आखिर मेरा क्या अस्तित्व है... मैं कौन हूँ??? मैं रोज सुबह इसलिए नहीं जागना चाहता कि मुझे उठ कर ऑफिस जाना है, रात को इसलिए नहीं सोना चाहता कि सुबह ऑफिस जाने के लिए उठना है... मैं सोना चाहता हूँ खुद के लिए, जागना चाहता हूँ खुद के लिए... कुछ ऐसा करना चाहता जिससे मुझे ख़ुशी मिले, संतुष्टि मिले, जिस काम को कर मेरा दिल खुश हो... जिससे मुझे गर्व की अनुभूति हो...
मुझसे संपर्क साधना बहुत आसान है... ab8oct@gmail.com पर मेल कर सकते है, http://ab8oct.blogspot.com/, http://humarinayisubah.blogspot.com/ पर मेरे विचारों को पढ़ सकते है....
http://facebook.com/ab8oct या http://twitter.com/ab8oct जैसे सोसल साईट पर मुझसे जुड़ सकते है...
कहानी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कहानी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 8 अगस्त 2012

एक छोटी सी प्रेम-कहानी...

आज फिर बहुत दिनों के बाद लिखने की हिम्मत जुटा रहा हूँ. पर न आज कोई कविता लिखूंगा और न ही कोई आलेख, न किसी सामाजिक मुद्दे को उठाऊंगा और न ही कोई आप-बीती सुनाऊंगा. आज एक प्रेम कहानी सुनाऊंगा. एक छोटी सी प्रेम-कहानी...


"बेटा! ज़रा राजीव अंकल के पास चले जाना, उन्हें तुमसे कुछ काम है."
"माँ तुम जानती हो मैं वहां नहीं जाना चाहता. दो-चार दिनों की छुट्टी पे आया हूँ, आराम करने दो."
"तुम तो ऐसे बोल रहे हो जैसे तुम्हे मीलों दूर भेज रही हूँ. बगल वाली गली में उनका मकान है... चले जाओ."
"ठीक है... ठीक है... जा रहा हूँ"

शाम पूरी तरह ढला नहीं है. सर्दियों के मौसम बस गुजरने ही वाले है और गर्मियां शुरू होने वाली है पर मौसम में अभी भी हलकी ठंडक है. सामने राजीव अंकल का घर है. गेट के अन्दर हाथ डाला तो ताला लगा हुआ था. कॉल बेल बजाई तो एक अनजान सी लड़की गेट खोलने आई. बस एक ही झलक देखा उसे. प्यारा सा चेहरा और मासूमियत झलक रही थी. पर दो चार पलों से ज्यादा उसके चेहरे पर नजर नहीं टिका पाया. लड़की ने दुप्पट्टा नहीं लिया था और शायद ये बात वो भी समझ गयी थी इसलिए बिना अन्दर आने का इन्तेजार किये लगभग भाग के अन्दर चली गयी. वो अन्दर दाखिल हुआ और हॉल में सोफे पे चुपचाप बैठ गया. राजीव अंकल अन्दर कमरे में कुछ तलाश रहे थे उसे देने के लिए. आंटी उससे बात कर रही थी. वही कहीं पास में वो लड़की भी खड़ी थी पर उसने एक बार भी उसकी तरफ नहीं देखा. शायद संकोच था या शायद उस लड़की को uncomfortable feel नहीं करवाना चाहता था. खैर जो भी था वो जाने.

पर लड़की तो कुछ और सोंच रही थी. उसके दिमाग में कुछ और चल रहा था. उसे अजीब लग रहा था. जब आज के जमाने में हर लड़के सिर्फ लड़कियों को ताकते (घूरते) रहते है ऐसे में इस लड़का का न देखना उसे बड़ा अजीब लग रहा था. क्या आज के जमाने में भी कोई ऐसा हो सकता है??? अचानक उस लड़की ने मन-ही-मन में अपने भगवान से दुआ मांग ली कि उसकी शादी जब भी हो ऐसे ही किसी लड़के से हो.

लड़का वापस अपने घर आ गया.
"माँ! वो राजीव अंकल के यहाँ वो लड़की कौन थी?"
"वो उनकी कोई रिश्तेदार है. कुछ दिनों की छुट्टियों में आई है. क्यों, क्या हुआ?"
"कुछ नहीं. कुछ अजीब सी नहीं है? मैं गया तो बस गेट खोली और बिना कुछ पूछे अन्दर भाग गयी. इतनी गन्दी सी है... छि..."
"चुप करो. प्यारी सी तो है."
"तुमको माँ हर कोई प्यारी ही लगती है."

माँ से अपनी वो लड़का भले उस लड़की के बारे में उल्टा, और गलत बोल रहा था पर रात भर उसी एक झलक को याद कर रहा था. पूरी रात बीत गयी पर सो नहीं पाया. पता नहीं क्या था उस चेहरे में, जो सिर्फ एक झलक के बाद भी नहीं भुला पा रहा था वो? अगले सुबह उसके कदम अनायास ही राजीव अंकल के घर की तरफ बढ़ रहे थे पर आधे रास्ते से ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाया और अपने कदम किसी और तरफ मोड़ दिए. वो जानता था कि उसके कोई भी गलत कदम उसके पापा और राजीव अंकल की दोस्ती में दरार डाल सकते है. उसने भूल जाना उचित समझा. दो तीन दिनों के बाद वो वापस मुंबई चला गया.

समय बीतता गया, बीतता गया... और देखते-देखते चार साल गुजर गए. पर लड़का उस लड़की को भूल नहीं पाया. एक तरफ़ा प्यार में जीता चला गया. उसे तो ये तक पता नहीं था कि उस लड़की को याद भी होगा या नहीं. और सच ही था उस लड़की को उस लड़के की बिलकुल याद नहीं थी. वैसे भी उस लड़की ने उस जैसे किसी लड़के से शादी होने की दुआ मांगी थी न कि उस लड़के से.

लड़के की माँ हमेशा शादी कर लेने की बात करती पर लड़का हर बार मना कर देता. वो शादी नहीं करना चाहता था, शायद किसी और से शादी नहीं करना चाहता था और उस लड़की से उसकी शादी हो नहीं सकती थी. आखिर उस लड़की के बारे में जानता ही क्या था? उसका नाम तक तो पता नहीं था उसे. पर उसकी माँ की जिद बढती जा रही थी. और होती भी क्यों नहीं, एकलौता बेटा था. हर माँ के ख्वाब होते है. उनके भी थे. एक दिन हार कर उस लड़के को हाँ करनी ही पड़ी. लड़के की माँ ने बेटे से लड़की (जिससे उसकी शादी तय करना चाहती थी) उसे देख लेने की बात कही. पर लड़के के लिए ये शादी सिर्फ परिवार की ख़ुशी के लिए समझौता भर थी. लड़के ने अपनी माँ से कहा कि वो न देखना चाहता है और न मिलना, यहाँ तक कि नाम तक नहीं पूछा उसने उस लड़की का. माँ उसकी बस किसी तरह अपने बेटे की जिंदगी में ख़ुशी लाना चाहती थी. उन्होंने शादी तय कर दी.

शादी तय हो जाने के बाद लड़के ने अपनी माँ से अपनी होने वाली पत्नी के बारे में पूछा. और सुनते ही फ़ोन रख कर रोने लगा. क्योंकि ये वही लड़की थी. उसका चार साल का प्यार.

कुछ दिनों के बाद उनकी शादी हो गयी. शादी के बाद लड़की को उस लड़के के उसके लिए प्यार का पता चला. उसे भी उस दिन की याद आ गयी, अपनी दुआ की याद आ गयी. पर उसे अफ़सोस हो रहा था कि आखिर चार साल क्यों लग गए. लड़के के प्यार को जानने के बाद उसने तुरंत अपने भगवान से शिकायत की पर भगवान शायद सुनते कहाँ है. 

लेकिन ये प्रेम-कहानी शायद अनोखी थी. भगवान भी उस लड़की के सवाल का जवाब देने के लिए मजबूर हो गए.
"तुम मुझे बहुत प्यारी हो और तुम्हारी बात बिना पूरी किये कैसे रह सकता हूँ. चार साल तक सिर्फ मैंने तुम्हारे लिए ही तो मेहनत की. तुमने मुझसे इसके जैसे लड़के से शादी होने की बात कही थी. तीन सालों तक मैं इसके जैसे लड़के को ढूंढने की कोशिश करता रहा पर मैं ढूंढ़ नहीं पाया. उसके बाद मैं बहुत दिनों तक सोंचता रह गया तब मैंने सोंचा कि इसके जैसे लड़के को तुम्हारा पति बनाने से बेहतर क्यों न मैं इसे ही तुम्हारा पति बना दूँ."

ये एक ऐसी प्रेम कहानी थी जिस-पर शायद आपको यकीन न हो पर आज दोनों अपने ढेर सारे प्यार को असीम खुशियों के साथ एक-दुसरे के साथ जीवन-यापन कर रहे है. मेरी तरफ से उन दोनों को ढेर सारी खुशियों की दुआ...

सोमवार, 8 मार्च 2010

फुर्सत

"वहाँ कौन गिरा पड़ा है?"
"होगा कोई पियककर, हमें क्या करना है?"
"नहीं यार चल कर देखना चाहिए. हो सकता है उसे मदद की जरूरत हो..."
"देखो यार इतना टाइम नहीं है मेरे पास... और कौन इन फिजूल के चक्करों में पड़ता है? तुम इस शहर में नए आये हो. यहाँ किसी को किसी की खबर लेने की फुर्सत नहीं है."
"पर यार मुझे तो फुर्सत है. तुम ना जाना चाहो तो ना जाओ. पर मैं तो उस व्यक्ति के पास जा रहा हूँ."
"जैसी तुम्हारी मर्जी. मैं तो थक चूका हूँ. घर जा रहा हूँ. जब तुम्हे उस व्यक्ति की मदद करने से फुर्सत मिल जाये तो चले आना घर."

इतनी बदल गयी है दुनिया. लोगों को अब लोगों के लिए ही फुर्सत नहीं.
"कहाँ गिरे चले आ रहे हो? देख कर नहीं चल सकता क्या? पता नहीं कहाँ-कहाँ से मुंह उठाये चले आते है?"
"सॉरी... मैं कुछ सोंच रहा था इसलिए ध्यान नहीं दे पाया."
"ठीक है, ठीक है."

आज लोग कितने शौक से कुत्तों को गोद में उठाये घूमते है और सड़क पर गिरे इस व्यक्ति के लिए किसी को कोई हमदर्दी नहीं. पता नहीं कौन है... जिन्दा है भी या नहीं... नहीं, नहीं... सांसें तो चल रही है अभी... मुंह से शराब की बदबू भी नहीं आ रही... जरूर किसी गाडी वाले ने टक्कर मारी होगी... अब क्या करूँ... कोई मदद करने के लिए रुकने वाला भी नहीं... अकेले कैसे इसे लेता जाऊँ... क्या मैं भी इसे छोड़ कर चला जाऊँ... नहीं, नहीं... मुझसे ऐसा बिलकुल नहीं हो पायेगा.... कुछ तो करना ही पड़ेगा... पर क्या?

"हेल्लो, भारत हॉस्पिटल...."
"जी, बोलिए..."
"मैं अशोक राजपथ से बोल रहा हूँ... यहाँ एक इमरजेंसी है... कृपया अमबुलंस भिजवाने का प्रबंध करेंगे..."
"कृपया अपना सही लोकेशन बताइए... हम अभी अमबुलंस भिजवाते है."
"जी बहुत बहुत धन्यवाद...."

समय पर अस्पताल पहुँच जाने से उनकी जान बच गयी.... ट्रिन ट्रिन (मोबाइल की घंटी बजती है उसी वक्त)...
"हेल्लो"
"हेल्लो... अवि..."
"हाँ बोल राज...."
"यार प्लीज जल्दी घर आ जाओ"
"क्यों क्या हुआ?"
"पापा कल शाम से घर वापस नहीं आये है..."
"तो मैं क्या करूँ? कल रात तुमने ही मुझे सिखाया था, इस शहर में किसी को किसी की खबर लेने की फुर्सत नहीं है...."
"अवि... वो मेरे पापा है..."
"कल रात सड़क पर गिरे वो व्यक्ति तुम्हारे पापा ही थे....

wibiya widget