मैं कौन हूँ? ये एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब २७ सालों के बाद भी मैं नहीं ढूंढ़ पाया हूँ... पर यकीन मानिए रोज कोशिश करता हूँ इस जवाब को ढूंढने का. आखिर मेरा क्या अस्तित्व है... मैं कौन हूँ??? मैं रोज सुबह इसलिए नहीं जागना चाहता कि मुझे उठ कर ऑफिस जाना है, रात को इसलिए नहीं सोना चाहता कि सुबह ऑफिस जाने के लिए उठना है... मैं सोना चाहता हूँ खुद के लिए, जागना चाहता हूँ खुद के लिए... कुछ ऐसा करना चाहता जिससे मुझे ख़ुशी मिले, संतुष्टि मिले, जिस काम को कर मेरा दिल खुश हो... जिससे मुझे गर्व की अनुभूति हो...
मुझसे संपर्क साधना बहुत आसान है... ab8oct@gmail.com पर मेल कर सकते है, http://ab8oct.blogspot.com/, http://humarinayisubah.blogspot.com/ पर मेरे विचारों को पढ़ सकते है....
http://facebook.com/ab8oct या http://twitter.com/ab8oct जैसे सोसल साईट पर मुझसे जुड़ सकते है...
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बुधवार, 7 मार्च 2012

आप लोग जाओ और मनाओ उमंग से होली...


कल होली और भाई अपन होली में थोड़े ज्यादा ही बीजी होते है तो सोंचा आप सबको अपना सलाम आज ही कह दूँ... वो क्या है कि अपन होली वाले दिन मतलब पुरे दिन मस्ती में घर में बैठते है.... मटन-चिकन खाते है.... टीवी-सीवी देखते है और... घंटों फ़ोन पर लोगों को होली का बुरा न मानने की सलाह देते है... भाई और जब इन सबसे थोडा वक़्त बच जाये तो ज़रा देर के लिए शरीर और दिमाग का आराम का ख्याल करते हुए सो लेते है.... भैये क्या करें हम तो अपने हर पल का भरपूर मजा लेते है.... खाना, सोना और टीवी देखना... और भी कुछ है क्या जरूरी इस जिंदगी में... खामख्वाह में हम दूसरों को तंग नहीं करते... अब देखो भैया कल है होली... और जो हमने होली में रंग डाल किसी को तो बेकार में नाक-भौंह सिकोड़ लेगा... सामने तो लिहाज से देगा नहीं पर मन में कई गालियाँ देगा... अब भैया ये तो मनुष्य की प्रकृति है... स्वर्ग सब जाना चाहते है पर मरना कोई नहीं चाहता... वैसे ही होली सब खेलना चाहते है पर रंग लगा दो तो मान लेंगे बुरा... खैर मानने दो बुरा उन्हें... मुझे क्या पड़ी है... अपन तो ज्यादा वैल्यू देते नहीं किसी को... भाई खुद से समय नहीं दूसरों को कहाँ से दे... और वैसे भी क्यों दे... सबको चौबीस घंटे मिलते है, न एक सेकण्ड कम न ज्यादा फिर हम अपना समय क्यों दे... हम नहीं देंगे... जिनको देना है दें... थोडा हमें भी दें... अरे इन सबके बीच तो भूल ही गया कि कल होली है... लेकिन आखिर मुझे क्या है तो है... मेरा क्या... उफ्फ्फ इस भांग ने तो गजब का असर डाल दिया है... पता नहीं क्या बकवास कर रहा हूँ... क्या कहा आपने मैं बकवास कर रहा हूँ?... कर रहा हूँ तो कर रहा हूँ आपका क्या... पर खैर हम बुरा नहीं मानते... क्योंकि कहते है न कि बुरा न मानो होली है.... आप सभी बुरा न माने... और मेरे दिल से निकली होली की मुबारकबाद को कबूल करें.... अरे ये क्या मैंने दिल से अभी - अभी कुछ निकाला है क्या... उफ्फ्फ्फ़ न जाने क्या होगा मेरा.... आप लोग जाओ और मनाओ उमंग से होली... हैप्पी होली... मुबारक होली.... और हाँ हर बार की तरह इस बार भी चित्र चुराया गूगल देवता के दरबार से.... गूगल देव बुरा न माने होली है...

शनिवार, 3 मार्च 2012

स्व-केन्द्रित भाव से उपजी रचना...

आज तो बहुत ही बुरा अनुभव कर रहा हूँ मैं.... किसी ने आईना दिखा दिया है मुझे आज... खुद का चेहरा देखकर डर से मरा जा रहा हूँ... घबराहट है ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही... बात ये है कि मेरे एक शुभचिंतक ने मुझसे कहा कि मेरी सारी रचनाएँ स्व-केन्द्रित भाव से निकलती है.... बस तभी से अपनी लेखनी को देखकर घृणा के भाव उभर रहे है... स्व-केंद्र का क़त्ल करने का मन हो रहा है... पर डरता हूँ क़त्ल करने के बाद फांसी हो गयी तो.... फांसी हो भी जाये तो ठीक है पर कहीं राष्ट्रपति महोदया ने अफजल गुरु और कसाब की तरह मेरी फांसी को लटका दिया तो.... जेल के अँधेरे में जेट सुरक्षा के साथ, अच्छा भोजन करते हुए, मनोरंजन का मजा लेते हुए कौन कमबख्त हर पल मौत का इन्तेजार करना चाहेगा... भाई अपने से तो नहीं होगा ये सब.... इसलिए स्व-केंद्र का क़त्ल करने का इरादा कैंसल...

लेकिन समझ में नहीं आ रहा है कि मेरे उस शुभ-चिन्तक महोदय ने इतना बड़ा आरोप मुझपर क्यों लगाया.... क्या ऐसा मैं सच में करता हूँ???... इस बात को तो मैं भी मानता हूँ कि मैं जो टूटी-फूटी, बेअर्थ, बदसूरत-सी और शब्दों को उलटे-सीधे रूप से मिलाकर जो तथाकथित कवितायें लिखता हूँ वो स्व-केन्द्रित होती है... पर कभी-कभी अपने छोटे से दिमाग को ज्यादा चलाते हुए कोई आलेख लिखता हूँ वो तो मुझे स्व-केन्द्रित नहीं लगती.... पर खैर हर व्यक्ति स्वतंत्र है टिप्पणी करने के लिए... मैं कौन होता हूँ किसी को रोकने वाला.... 

खैर छोडो इन बातों को.... अरे हाँ एक बात और याद आया... कई दुसरे ब्लॉगर बंधुओं से जब भी व्यस्त समय से थोड़े से समय को चुरा कर (ऐसा मैं सिर्फ कहता हूँ.... बाकी समय ही समय है जीवन है) बात होती है तो सबकी एक शिकायत आती है कि "अभिषेक आप तो आज कल हमारे ब्लॉग पर नजर आते ही नहीं हो".... (जैसे लोगों ने अपने ब्लॉग पर कैमरा लगा रखा है या ऐसा कोई उपाय जिससे पता चल जाता हो कि अभिषेक आया था ब्लॉग पर या नहीं).... फिर दिमाग में आया कि ये जानने का तो सीधा सा तरीका है कि भाई अभिषेक की टिप्पणी नहीं है मतलब आया नहीं ब्लॉग पर.... मैंने भी सबसे कहा कि इसलिए लगता है आप लोग भी बदला चूका रहे हो, मेरे ब्लॉग पर भी बिना दर्शन दिए चले जा रहे हो.... (फेंक दिया मैंने भी नहले पर दहला... सब चुप).... सबके पास मेरे ही तरह एक ही बहाना है कि "अभिषेक समय नहीं मिल रहा आज-कल"... कोई घर पर व्यस्त है तो कोई ऑफिस में... पर बात सीधी सी है कि जमाना लेन-देन का है....

खैर इस बात को शायद मैं पहले भी बता चूका हूँ... मेरी टिप्पणियाँ नहीं होती किसी के ब्लॉग पर इसका मतलब ये नहीं कि मैंने ब्लॉग पढना छोड़ दिया है... जो व्यक्ति पढना छोड़ दे वो कभी लिख भी नहीं सकता है.... मैं रोज नियम से और गिनती से कम से कम दस पोस्ट जरूर पढता हूँ... हाँ टिप्पणी नहीं करता ये अलग बात है... उसके भी दो सीधे से कारण है.... पहला कि मैं अपने आप को टिपण्णी करने के लायक नहीं समझता... मैं लिखता हूँ पर खुद को अभी तक मैं ही स्वीकार नहीं कर पाया हूँ.... दूसरा कि किसी के भी पोस्ट पर क्या टिपण्णी करूँ ये भी समझ में नहीं आता है... हर रचना के लिए रटे-रटाये "बहुत खूब, अच्छा, इत्यादि-इत्यादि" लिखता रहूँ मुझसे बर्दास्त नहीं होता है....

तो अब तो आप लोग मेरी मजबूरी समझ गए होंगे और मेरी टिपण्णी नहीं आने पर भी मेरे पोस्टों पर टिप्पणियों की बौछार करते रहेंगे... चलो दोस्तों अब चलता हूँ.... मजाक-मजाक में एक और स्व-केन्द्रित पोस्ट लिख डाली.... 

शुक्रवार, 2 मार्च 2012

महिला-पुरुष बराबरी युग में इतना भेद-भाव क्यों???

कल रात फिर एक बार गलती कर गया. वैसे इस गलती में मेरा कोई कसूर नहीं है. वो क्या हुआ कि ऑफिस से वापसी में मैं चला गया अपने एक मित्र के घर और मेरे मित्र ने लगा रखी थी एक न्यूज़ चैनल. अब आप समझ गए होंगे कि क्या गलती हो गयी. उफ़ कल रात फिर न्यूज़ देख ली मैंने. हे भगवन! बचा ले मुझे इस पाप से.

हाँ तो बात ये है.... सॉरी सॉरी सॉरी न्यूज़ ये है कि कल किसी प्रदेश के किसी अदालत ने किसी व्यक्ति को दहेज़ प्रतारना आरोप से मुक्त कर दिया. भाई अच्छी बात है (कम-से-कम अदालत के चक्कर से मुक्ति तो मिली).... जिस लड़की ने ये आरोप लगाते हुए लगभग ९ साल पहले उस लड़के की बारात को घर से वापिस लौटा दिया था, उस लड़की को उस वक़्त हमारी देशी और विदेशी मीडिया ने काफी तवज्जो दी थी. कई संस्थाओं ने उसे आयरन-लेडी तक कहा और कई ने तो कितने ही पुरस्कार दे डाले. भाई देने भी चाहिए थे... आखिर बहुत बहादुरी का काम किया था उसने. (हमारे देश में लड़की ने आवाज उठाई यही बहुत बड़ी बहादुरी की बात है)... पर ९ साल के बाद अदालत ने उस लड़की को झूठा कैसे साबित कर दिया? आखिर ९ साल के बाद अदालत को ये बात पता चली जो उस वक़्त किसी को नहीं पता थी? कमाल है... खैर ये तो हमारे देश की अदालत का स्टायल है कि किसी भी बात का पता लगने में उसे सदियों लग जाते है.... 

पर मुद्दा ये नहीं है.... मुद्दा ये है कि लड़के को क्या मिला? बेइज्जती, जेल, बदनामी और बेगुनाह होते हुए भी सजा.... और लड़की को क्या मिला? पुरस्कार, नाम, सम्मान और गुनाहगार होते हुए भी इज्जत.... भाई यही तो है महिला होने के फायदे... इस देश में महिलाओं के लिए कई क़ानून है... जो जरूरी भी है पर उनका दुरुपयोग भी उसी स्तर पर होता रहा है... क्या अदालत के इस फैसले से उस लड़के के जिंदगी के वो नौ साल वापस मिल जायेंगे? लड़की की तो उस घटना के एक साल के बाद शादी हो गयी थी... मतलब पिछले आठ सालों से लड़की एक खुशहाल जीवन जी रही होगी (अगर उसने वहां भी कोई झूठ नहीं कहा होगा)... पर लड़के ने पिछले नौ सालों तक जिस मानसिक वेदना को जिया है उसका फल उसे कौन दिलाएगा? क्या उस झूठी लड़की को कड़ी सजा नहीं मिलनी चाहिए जिससे कि और ऐसी दूसरी लड़कियों को सबक मिल सके?

महिला क़ानून बहुत जरूरी है और इसका मैं पूरा समर्थक हूँ पर ऐसे भी उपाय होने चाहिए जिससे कि बेगुनाह न फंस सके इस क़ानून के जाल में. क्या हर बार एक लड़का ही गलत होता है? ऐसे कई वाकये मैंने सुने और देखे भी है जब किसी लड़की ने झूठे आरोप में लड़के को दहेज़ प्रतारना और यहाँ तक कि बलात्कार के केस तक में सजा दिलवाई है. क्या मानसिक वेदना सिर्फ एक पुरुष ही औरत को देता है? मैंने तो कई ऐसे घर-परिवार देखे है जहाँ महिला के कारण पुरुष मानसिक वेदना झेल रहा है... ऐसे में वो पुरुष कहाँ फ़रियाद करे? चलिए नीचे दो स्थितियां दे रहा हूँ और उसके दो परिणाम भी.... शायद कोई त्रुटी कर जाऊं अपने कम दिमाग से तो मुझे अवश्य सूचित कीजियेगा...

स्थिति एक: एक लड़का और एक लड़की एक दुसरे से दो साल से प्यार करते है. उनके बीच कुछ असामाजिक सम्बन्ध भी होते है. किसी कारणवश लड़का शादी से इन्कार करता है. लड़की को मानसिक वेदना से गुजरना पड़ता है.
परिणाम एक: लड़की लड़के के खिलाफ या उसे पाने के लिए फ़रियाद कर सकती है. लड़की उस पर दो साल तक उसे भावनात्मक रूप से बेवकूफ बना कर यौन-शोषण का आरोप लगा सकती है.

स्थिति एक: एक लड़का और एक लड़की एक दुसरे से दो साल से प्यार करते है. उनके बीच कुछ असामाजिक सम्बन्ध भी होते है. किसी कारणवश लड़की शादी से इन्कार करती है. लड़के को मानसिक वेदना से गुजरना पड़ता है.
परिणाम दो: लड़का परिणाम एक जैसा कुछ नहीं कर सकता.

क्या सिर्फ लड़कियों की भावनाएं होती है लडको की नहीं? आखिर आज के महिला-पुरुष बराबरी युग में इतना भेद-भाव क्यों???

मंगलवार, 28 फरवरी 2012

ज़रा सोंचिये....एक नया कदम...

आदरणीय प्रधानमत्री महोदय,

सबसे पहले मेरा सादर अभिनन्दन स्वीकार करें. मैं इस देश एक आम और बहुत ही मामूली आदमी हूँ. पर मेरे ख्याल से व्यक्ति का व्यक्तित्व कितना भी छोटा क्यों न हो उसमें अपने देश और अपनों के लिए तिनका भर ही सही प्रेम अवश्य होगा. आज उसी तिनके बराबर प्रेम से मजबूर होकर आपको ये ख़त लिखने बैठा हूँ. कुछ मुद्दे ऐसे है जो किसी को भी सोंचने पर मजबूर कर सकते है और सिर्फ सोंचने पर नहीं उनपर आवाज उठाने पर भी. पर हम आम आदमी की बहुत बड़ी कमजोरी है कि हम किसी भी मुद्दे पर सोंच तो लेते है, घर बैठ के बुरा-भला भी कह लेते है पर जब आवाज उठाने की बारी आती है तो खुद को आम आदमी कह कर, कुछ न कर पाने की मजबूरी जताते हुए चुपचाप चादर के नीचे सर छुपा का सो जाते है. यकीं मानिए मैं भी उन्ही लोगों में से हूँ. आज ये जो ख़त मैं आपको लिख रहा हूँ ये बस दिल से मजबूर होकर लिख रहा हूँ वरना दिमाग तो अभी भी समझा रहा है कि शाम के खाने की चिंता करो घर में गैस ख़त्म हो रखी है... पर क्या करूँ मेरी बचपन से यही एक कमजोरी रही है कि जब दिल हावी होता है तो दिमाग के हाथ से सारा कंट्रोल अपने हाथों में ले लेता है और मैं चाह कर भी चुपचाप नहीं रह पाता.

इस ख़त में हो सकता है कुछ त्रुटियाँ हो जायें, हो सकता है आपको मेरी किसी बात से ठेष पहुंचे... पर इस देश का नागरिक होने के नाते मैं समझता हूँ कि हर व्यक्ति को ये अधिकार होना चाहिए कि वो उन लोगों से सीधे-सीधे सवाल कर सके जिन्हें वो अपना अभिभावक चुनते है, जिन्हें अपना कर्ता-धर्ता बनाते है. घर में भी तो बच्चों को ये अधिकार होता है कि वो अपने माता-पिता से बात कर सके और यही सिखाया भी जाता है.

कल शाम घर वापस आकर न्यूज़ चैनल देख रहा था... वैसे तो देखता नहीं, गलती से चैनल लग गया था. कुछ गणमान्य नेता-गण संसद की गरिमा भंग होने को लेकर रोष प्रकट कर रहे थे. शायद किसी और बहु-चर्चित व्यक्ति ने हमारे नेताओं के खिलाफ अभद्र भाषा का प्रयोग किया था. मैं इसके बिलकुल खिलाफ हूँ, किसी को भी किसी के भी प्रति अभद्र भाषा का उपयोग नहीं करना चाहिए. पर मेरा आपसे बड़ा सीधा सा सवाल है कि क्या अगर किसी ने ऐसा कर भी दिया तो इतना रोष प्रकट करना जरूरी है? मुझे तो लगता है रोज ही लाखों-करोड़ों लोग ऐसी भाषा का उपयोग नेता-गण और अफसर-साही के लिए करते ही है. फिर उन पर हल्ला-बोल क्यों नहीं होता? कल एक अति-चर्चित ब्यक्ति ने चुनाव क्षेत्र में चुनाव प्रचार के समय आवाज उठा दी तो सबको तकलीफ हो गयी, कहीं ये अन्दर का डर तो नहीं था? और फिर हमारे नेता-गण उस समय हल्ला क्यों नहीं बोलते जब संसद के अन्दर ही गालियाँ-कुर्सियां-चप्पल-जूते चलने लगते है? उस वक़्त संसद की गरिमा क्यों भंग नहीं हुई जब बीच संसद में नोटों के गड्डियां लहराई गयी? उस वक़्त सब एक जुट क्यों नहीं होते जब स्पीकर महोदय/महोदया शान्ति की अपील करती रहती है? मैंने तो छोटे-छोटे बच्चों तक को देखा है जो क्लास में टीचर के कहने में चुप हो कर बैठ जाते है. फिर इतने सभ्य लोग ऐसा क्यों नहीं कर पाते?

ये एक सही सवाल है कि भ्रष्ट लोग हमारे संसद के अन्दर से कैसे निकले. ये देश के लिए जरूरी भी है. कल कोई नेता कह रहे थे कि इन्हें जनता चुन कर भेजती है. बिलकुल सही हम जनता ही इन्हें चुन कर भेजते है, पर अगर हमारे पास आप्शन ही यही रहे तो हम क्या करें? क्या ये राजनितिक पार्टियों की जिम्मेदारी नहीं बनती कि वो ऐसे लोगों को राजनीति से दूर रखे? हाँ ये भी सही है कि सिर्फ आरोपी को हम इनसे दूर नहीं कर सकते. क्योंकि अगर ये नियम बना दिए गए कि आरोपी को भी राजनीति से दूर रखा जाये तो फिर तो कोई भी संसद के अन्दर नहीं बचेगा. हर किसी पर कोई न कोई आरोप मढ़ता ही रहेगा. पर इसके निदान के लिए क्यों नहीं आप लोग (क्योंकि हम तो तय कर नहीं सकते, ये अधिकार हमारे पास नहीं है) ये तय करते है कि नेताओं या राजनितीं कार्यकर्ताओं पर लगे आरोपों को फास्ट-ट्रैक कोर्ट में जल्द निपटारे का प्रावधान हो? क्यों ऐसा होता है कि भ्रष्टाचार के केस भी सालों चले आ रहे है और तब तक तो भ्रस्टाचार का पैसा और सबूत दोनों मिटटी में दफन हो जायेंगे.

पिछले साल में भ्रष्टाचार मिटाने को लेकर लोगों को एक जुट होते हुए दुनिया ने देखा. और ऐसा आप सब भी चाहते होंगे. फिर एक अदद लोकपाल को पारित करने में इतनी देरी क्यों? आखिर अपने देश का पैसा दुसरे देश के बैंक से लाने में इतनी तकलीफ क्यों? क्या आप नहीं चाहते कि वो अरबों से भी ज्यादा का धन जो दुसरे देश के बैंक में पड़ा है इस देश के गरीबों के काम आये? दुनिया जानती है कि हमारे देश का बहुत बड़ा हिस्सा धन का काला हो चूका है. क्या फर्क पड़ता है ये किसने किया या किसने धन को काला करके विदेश पहुंचा दिया है? इसे बाद में भी पता लगाया जा सकता है (वैसे भी पता लागाने बैठे तो इस देश का इतिहास है कि किसी भी बात का हल निकलने में यहाँ सालों गुजर जाते है और इसका बहुत बड़ा सबूत हमारे सामने गुजरात दंगे, बाबरी काण्ड, भोपाल गैस त्रासदी, इत्यादि-इत्यादि है). मेरे ख्याल से तो पहले काला धन अपने देश ले आना चाहिए, दोषी का पता लगाने की जरूरत ही नहीं रह जाएगी वो ऐसे ही हार्ट-अटैक से मर जायेंगे (देश का बहुत समय बच जायेगा).

हर बार महंगाई बढती ही जा रही है. पेट्रोल के दाम बढ़ रहे है, गैस के दाम बढ़ रहे है और इन सबके कारण बाकी चीजों के दाम बढ़ रहे है. मैं सरकार की मजबूरी भी समझता हूँ कि सब्सिडी का बोझ सरकारी खजाने पर ज्यादा नहीं डाला जा सकता. पर जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ते ही तेल के दाम बढ़ जाते है वैसे ही घटने पर घटने भी चाहिए. और यहाँ भी अगर काला धन वापस आ जाये तो सरकारी खजाने में इतना पैसा होगा कि तेल की कीमत आधी भी हो जाये तो देश को अर्थ-व्यवस्था का नुक्सान नहीं होगा. या फिर मेरी माने तो एक बार ही पेट्रोल की कीमत बढा कर सौ रुपये कर दीजिये. ये साल में दो-दो रुपये बढ़ाने से तो अच्छा है. सौ रुपये कर दीजिये और हम जनता को भी अगले कम-से-कम पांच साल के लिए शान्ति से रहने का मौका दे दीजिये. ये बार-बार बजट बदलने के चक्कर से छुटकारा तो मिलेगा और गाड़ियों के कारण बढ़ने वाली प्रदुषण से भी बहुत हद तक मुक्ति मिलेगी. कई गाड़ियां वैसे ही सड़क से गायब हो जाएगी और हमारा देश ग्लोबल-वार्मिंग से भी बच जायेगा. खैर ये तो शायद मजाक की बात है. और आपके साथ मजाक करना मुझे शोभा नहीं देता.

अब कुछ बातें और भी है मेरे दिमाग में जो आपसे कहना चाहता हूँ या शायद सलाह देना चाहता हूँ. माफ़ कीजियेगा मुझे, सलाह देने का हक़ तो नहीं है पर बिना दिए रहा भी नहीं जा रहा. बुरा लगे तो कृपया बच्चा समझ कर माफ़ कर दीजियेगा.
१. जब हमें किसी ऑफिस का कर्मचारी भी बनना हो तो एक लिखित चयन प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, कम से कम दसवी पास होना पड़ता है. फिर जो सिर्फ एक ऑफिस नहीं बल्कि एक पूरा इलाका, जिला, राज्य चलाते है उनके लिए ये प्रक्रिया क्यों नहीं? मेरे ख्याल से राजनितिक उमीदवारी के लिए भी एक लिखित चयन प्रक्रिया होनी चाहिए और कम से कम स्नातक तो होना ही चाहिए.
२. हर कार्य-रत व्यक्ति के लिए एक तय उम्र-सीमा होती है. उतने उम्र का होने पर उस व्यक्ति को अपना पड़ छोड़ना पड़ता है. अभी हाल में ही इसी उम्र को लेकर एक गहरा विवाद भी उत्तपन हुआ था. फिर हमारे नेताओं के लिए रिटायरमेंट आयु तक क्यों नहीं है? मेरे ख्याल से उनके लिए भी तय उम्र सीमा होनी चाहिए.
३. इस बात से मैं भी सहमत हूँ और पहले इस बात की चर्चा कर भी चूका हूँ कि किसी व्यक्ति को सिर्फ आरोप के आधार पर राजनीति से दूर नहीं रखा जा सकता. उनके केस का निपटारा अति-तीव्र अदालात में करवाया जाए.
४. मान लीजिये कि किसी भी चुनाव में किसी क्षेत्र से १० उम्मीदवार चुनाव में खड़े होते है. उनमें से प्रत्येक को क्रमशः पैंतीस, बीस, पंद्रह, दस, आठ, चार, तीन, दो, दो और एक प्रतिशत वोट मिलते है. जीत पहले उमीदवार की होगी क्योंकि उसे सबसे ज्यादा पैंतीस प्रतिशत वोट मिले. पर क्या आपने सोंचा कि पैंसठ प्रतिशत जनता ने तो उसे मत नहीं दिया? मतलब आधी से ज्यादा (बहुमत) जनता उसके खिलाफ है फिर वो विजयी कैसे हो गया? मेरे ख्याल से जीत के लिए कम से कम पचास प्रतिशत वोट जरूरी हो जीत के लिए और जहाँ किसी भी उम्मीदवार को पचास प्रतिशत वोट न आये वहां टॉप दो या तीन उम्मीदवारों के बीच फिर से चुनाव कराया जाये.
५. चुनाव में एक आप्शन "इन में से कोई नहीं" का भी होना चैये. ताकि अगर किसी को उन में से किसी को भी न चुनना हो तो वो "इन में से कोई नहीं" का बटन दबा सके और मजबूर न हो किसी भी अनचाहे उम्मीदवार को वोट देने के लिए. और ये प्रावधान हो कि अगर पचास प्रतिशत जनता इन में से कोई नहीं का चुनाव करे तो उस चुनाव में खड़े उन उम्मीदवारों की उम्मीदवारी ख़त्म कर दी जाये.
६. ऑनलाइन वोटिंग का भी प्रावधान हो ताकि जो व्यक्ति अपने क्षेत्र से बाहर रहते है या किसी कारणवश वोट देने के लिए पहुँचने में अक्षम है वो भी अपने क्षेत्र के उम्मेदवार का चयन का रसके.
७. जिन्हें हमें चुनकर पांच साल के लिए भेजने का अधिकार है, उन्हें काम न करने या लोगों के विश्वास पर खरा न उतरने पर पांच साल से पहले वापस बुलाने का अधिकार भी हो.
८. अभी हाल के कुछ चुनावों में मैंने देखा है कि राजनितिक पार्टियां किसी राज्य से चुनाव लडती है पर अपना भावी मुख्य-मंत्री की घोषणा से चुनाव से पहले नहीं करती. मेरे ख्याल से पार्टियों को अपने नेता का नाम पहले घोषित करना चाहिए ताकि जनता अपना वोट सोंच-समझ कर दे सके और बाद में किसी अनचाहे चेहरे को अपना मुख्य-मंत्री मानने पर मजबूर न हो.
९. हमारे देश में तीन मुख्य स्तम्भ है, विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका... यहाँ मेरा ख्याल ये है कि या तो तीनो स्तम्भ स्वतंत्र रूप से काम करें या कार्यपालिका को न्यायपालिका के अंतर्गत रखा जाये ताकि निष्पक्ष रूप से कार्यपालिका अपना काम कर सके और कोई दबाव उस पर न हो. मतलब कि पुलिस तंत्र और सी.आई.डी या सी.बी.आई. सरकार के अन्दर न होकर या तो स्वतंत्र हो या फिर न्यायपालिका के अन्दर हो.
१०. एक आम आदमी को भी बिना किसी परेशानी के सीधे अपने जवाब जानने का हक़ हो.
११. सरकार जो भी खर्च करती है उसे सार्वजनिक रखा जाये ताकि लोगों को जानकारी रहे कि कहाँ क्या और कितना खर्च हो रहा है. इससे सबसे बड़ा फायदा भ्रष्टाचार की रोक-थाम में होगा.
१२. किसी भी सरकारी या गैर सरकारी काम की भी तय सीमा हो और उसे उस तय सीमा के अन्दर पूरा किया जाये.
१३. पुरे देश में एक समानता हो न कि हर अलग अलग राज्यों के अलग अलग नियम हो. जो नियम उत्तर के किसी राज्य में लागू हो वही नियम भारत के दक्षिण प्रांत में भी हो.
१४. देश में सिर्फ राष्ट्रीय पार्टी होने चाहिए जिससे कि लोगों में आप्शन सीमित हो और वो सही चुनाव कर सके.

बाकी लिखने के लिए तो मेरे पास बहुत कुछ है. क्या करूँ कहते है न खाली बैठे लोगों का दिमाग कुछ ज्यादा ही चलता है वही हाल मेरा भी है. पर क्या करूँ न मुझे संविधान का ज्ञान है न क़ानून का और न ही राजनीति का. मेरी नीति तो सिर्फ एक आम नागरिक की है जो सिर्फ भला सोंचता है. हो सकता है इस भले में कई सारी बुराई छिपी हो पर मेरा दिल तो इतना ही सोंच पाया.

प्रधानमन्त्री महोदय अगर आपको मेरी बात से ठेष पहुंचा हो या बुरी लगी हो तो कृपया मुझ नादाँ को माफ़ करने की कृपा करें.

इस देश का एक नादान सा आम आदमी
अभिषेक प्रसाद.

शनिवार, 18 फरवरी 2012

कराह और सिसकियाँ...



कल रात अचानक आँख खुल गयी...
हाँ कल रात...
वैसे तो ये रोज ही होता है
रोज ही न जाने कितनी ही बार मेरी नींद उचट जाती है
नींद... क्या मैंने अभी नींद कहा?
नींद आती ही कहाँ है... हाँ बस आँखें बंद होती है
वैसे ही जैसे किस्मत ने बंद कर रखी है अपनी आँखें
और वैसे ही जैसे उसने बंद कर लिए अपने दिल के दरवाजे...
रोज ही खुल जाती है आँखें मेरी... कई-कई बार
पर कल रात अचानक यूँ खुलना...
कुछ अटपटा नहीं था... फिर भी...
किसी के सिसकियों की आवाज कानों में पड़ रही थी...
कोई था जो लगातार जार-जार रो रहा था..
पर उस बंद कमरे मेरे और मेरी तन्हाई के अलावा और कोई तो नहीं था
फिर कौन रो रहा था?
क्या ये मैं था?
नहीं-नहीं मैं तो हरगिज़ नहीं हो सकता...
मेरे आन्हों ने तो कब का रोना छोड़ दिया है
फिर और कौन था?
अचानक रुदन की आवाज तेज हो गयी...
और साथ में किसी के कराहने की आवाज भी आने लगी...
अभी एक को ढूंढ़ भी नहीं पाया था कि दूसरा भी हाजिर हो गया...
अचानक किसी ने जोरों से चिल्लाना शुरू किया
शायद उन्ही दोनों को उलाहने दे रहा था
पर आखिर उस बंद कमरे कौन थे वो...
किसी भूत-प्रेत के चक्कर में तो नहीं पड़ गया मैं...
खिड़की से आती रौशनी में अपनी आँखों पर जोर डालते हुए
कोशिश की उन तीनो को ढूंढने की, देखने की
एक सिसकियाँ बढा रही थी तो दुसरे का कराहना
और तीसरे के उलाहने मेरे कानों के परदे फाड़े दे रहा था...
तभी अचानक मेरी आत्मा ठंडी पड़ गयी...
जब मैंने देखा कि सिसकियाँ मेरे डायरी के पन्नों की थी,
कराह मेरे कलम से निकल रही थी और उलाहने देने वाला...
कोई और नहीं खुद मेरा दिल था...

आखिरकार खुद को रोक नहीं पाया मैं... चाह के भी अपने हाथों को मन के शब्द कागज़ पर उतारने से रोक नहीं पाया मैं... न मालूम क्या हो जाता है मुझे कलम हाथ में लेते ही... सबसे पहले दिमाग काम करना बंद कर देता है और फिर दिल पुरे शरीर पर कब्ज़ा जमा लेता है... एक बाँध जो बाँधने की कोशिश कर रहा था मैं... आज विचारों के सैलाब में ढह गया...

बुधवार, 18 जनवरी 2012

कुछ भी नहीं

शुभ प्रभात मेरे सभी ब्लॉगर बंधुओं को.... जब से लिखना छोड़ा है सच बताऊँ बड़ा सुकून है मन में... कई लोगों के फ़ोन आये, कई ने मेल किया कुछ ने सीधे वार्तालाप किया... सबने कहा आखिर लिखना क्यों छोड़ दिया... मत छोडो लिखते रहो... अँधेरे से उजाले की ओर आने का सबसे सशक्त माध्यम है... वगैरह-वगैरह... उन सबके लिए एक छोटी सी बात... जहाँ तक मैं सोंचता हूँ किसी भी काम के लिए तीन चीजों का होना अति-आवश्यक है... इच्छा, उत्साह और वजह.... जब तीनों में से एक भी कम हो तो व्यक्ति किसी भी काम को अंजाम नहीं दे सकता... कला किसी बंधुआ मजदूरी की तरह नहीं होती कि आपको उसे जबरन करना ही पड़ेगा... उसके लिए इच्छा, उत्साह और वजह तीनों का बराबर सम्मिलन होना चाहिए... और मेरे पास तो अब एक भी नहीं है... बस इसलिए लिखने से तौबा कर ली मैंने... कयिओं ने पूछा कि आखिर ऐसा क्यों किया... तो इसका मेरे पास कोई ठोस कारण नहीं है... बस पिछले १६ महीनों के मजाक से थक गया था... जिंदगी और लोगों ने इतना बढ़िया मजाक किया मेरे साथ कि उस मजाक पे अब मेरे दर्द जिन्दगी भर खिलखिलायेंगे... मेरे आंसू मौत तक मुस्कुराएंगे... आप सबने मेरे बारे में सोंचा... मेरा साथ दिया इसके लिए मैं आप सबको तहे-दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ... कुछ टूटे-फूटे अल्फाजों और बिखरे हुए शब्दों को पसंद कर आप लोगों ने ही मेरे अन्दर एक कवि, एक लेखक होने का अहसास पैदा करा दिया था... पर सच तो ये है कि मैं कभी कुछ था ही नहीं और आज भी कुछ भी नहीं... आप सबका एक बार फिर से धन्यवाद...

शनिवार, 31 दिसम्बर 2011

Happy New Year...



सभी ब्लॉगर भाई-बहनों को मेरी और मेरे पुरे परिवार और दोस्तों की तरफ से नए साल की हार्दिक शुभकामनाएं... उम्मीद और दुआ करता हूँ कि आने वाला वर्ष आप सबके जीवन में खुशियाँ हजारों गुना बढ़कर आएँगी... हर सोंची हुई और देखा हुआ ख्वाब पूरा होगा...तरक्की की जिन सीढ़ियों को आप सबने कब का अपने क़दमों के नीचे कुचल डाला है उनसे कहीं ऊँची सीढियां आपको तरक्की के आसमान तक पहुंचाए... मिला जुला के शोर्ट में कहूँ तो आने वाला साल आपके लिए सुभ हो... Happy New Year...

अभिषेक प्रसाद
मोब: +91 9818314678

बुधवार, 7 दिसम्बर 2011

ख़ामोशी... बहुत कुछ कहती है...



आप सबने मेरी ख़ामोशी में बड़ी ख़ामोशी से साथ दिया है... मेरी खामोश हौसला-आफजाई की है... हमेशा खामोश मार्गदर्शन किया है... पर आज मैं अपनी सारी ख़ामोशी तोडना चाहता हूँ... हमेशा के लिए... हाँ, हमेशा-हमेशा के लिए... आज पहली बार मैं कुछ शोर करना चाहता हूँ... उम्मीद है मेरी कलम से अभी निकलने वाली आखिरी पंक्तियाँ आपको पसंद आएगी...

एक काली अँधेरी रात...
एक ऐसी रात जो ख़त्म होने का नाम ही न ले रही थी
अँधेरा पल-दर-पल बढ़ता जा रहा था
अँधेरा कुछ घंटों का नहीं सालों का
पर अचानक एक दिन कुछ अलग हो गया
कुछ ऐसा जिसकी उम्मीद मैंने कब की छोड़ दी थी
कुछ ऐसा जिसकी उम्मीद तो उम्मीद ने भी नहीं कि थी
पर हुआ, होना था और हुआ...
अँधेरा ख़त्म हो रहा था
दूर से एक रौशनी पास आती नजर आ रही थी
मेरी अँधेरी रात के बाद सहर आ रहा था
एक चमकीला, सुहाना, खुबसूरत सहर...
आँखें चुन्धियाँ रही थी इतने सालों के अँधेरे के बाद
विश्वास ही नहीं हो रहा था...
बार बार खुद को ही जगा रहा था...
पर ये तो हकीक़त था... कोई सपना नहीं...
एक हसीन हकीक़त... किसी खवाब से भी ज्यादा हसीन...
पहले सुनहला सवेरा... और फिर
समय-दर-समय बढ़ता जीवन का उजाला...
दुखों ने डर से पीछा छुड़ा लिया मुझसे...
और उजाले में खुशियाँ लिपट पड़ी मुझसे..
जिन आँखों ने आंसुओं की नमी महसूस कि थी
उन्होंने सपनो की बारिश में भीगना शुरू किया
जिस आत्मा ने अकेलेपन का बोझ उठाया था सदा
उसने प्यार की भीड़ में पाया खुद को...
हर पल के साथ जीने की उम्मीद बढती गयी...
चाहत बलवान होती गयी... वजह गहराती चली गयी...
जिंदगी से प्यार बढ़ता गया...
आगे और आगे बढ़ने को कदम मचलते रहे...
मन समुन्दर की असीम गहराई में ख़ामोशी पाता रहा...
रौशनी बढती रही... अँधेरा ख़त्म हो चूका था...
जिस रौशनी की चाहत की थी वो मेरे पास था..
पर अचानक फिर कुछ हुआ... कुछ ऐसा
जिसकी कल्पना नहीं कि थी इन आखों ने...
हाँ अँधेरा नहीं माँगा था मैंने...
हाँ जीवन भर का उजाला माँगा था मैंने...
पर जिस रौशनी को जिंदगी मान रहा था
वो तो काली अँधेरी रात से भी ज्यादा काली
और मौत से भी ज्यादा दर्दनाक निकली...
एक उजाला हमेशा के लिए मेरे साथ बाँध गयी...
उजाला दर्द का... उजाला आंसुओं का...
सहर मेरी मौत का...
सहर अकेलेपन का...
रौशनी मांगी थी मैंने... पर किस कीमत पर?
अपनी जिंदगी, खुशियों और आत्मा की कीमत पर तो बिलकुल भी नहीं...
उजाला रहे हमेसा पास मेरे... इसके लिए
उस रौशनी ने मेरी आत्मा को ही जला दिया...
धू-धू कर अल रही है आत्मा मेरी...
आग की लपटों से सच सब ओर उजाला है...
इतना उजाला की मेरी आँखें चुन्धियाँ रही है...
जैसे-जैसे आत्मा की आग तेज होती जा रही है
खुशियाँ मर रही हैं
जिंदगी साथ छोडती जा रही है...
और मैं चुपचाप खड़ा सिर्फ देख रहा हूँ...
क्योंकि कभी मैंने ही कहा था...
ख़ामोशी... बहुत कुछ कहती है...

मैं नहीं जानता कि मैंने अभी क्या लिखा है, मुझे नहीं पता मैंने कैसा लिखा है... पर जो भी लिखा है आखिरी बार लिखा है... जानता हूँ आप में से कुछ लोग मुझे लिखते रहने के लिए फिरसे प्रोत्साहित कीजियेगा... पर लिखने के लिए आत्मा की जरुरत होती है, जो अभी जल रही है राख होने के लिए... लिखने के लिए मन की जरुरत होती है जो मर चूका है अब... लिखने के लिए किसी वजह की जरुरत होती है जो ख़तम हो चुकी है अब... मैं जानता हूँ मैं बहुत कमजोर हूँ, मुझे पता है मैं कायर हूँ... आज के बाद मैंने न लिखने की कसम खायी है... हाँ, ये सच है कि मैं कमजोर हूँ पर यकीन मानिए मेरी कसम नहीं... आप सबने मेरा बहुत साथ दिया है.. उसके लिए आप सबका बहुत बहुत शुक्रिया... आप सबके जीवन की बेहतरीन कामना के साथ...

अभिषेक प्रसाद
मो. 9818314678

मंगलवार, 6 दिसम्बर 2011

एक पिता का दर्द....

कुछ ही देर पहले देखा इसे... न जाने क्यों इतने दिनों से महरूम था इससे मैं... किसी कवि का नहीं एक पिता का ह्रदय समाया है इसमें... आप सबके साथ बाँट रहा हूँ....


रविवार, 20 नवम्बर 2011

एक गर्दन की दास्ताँ...

आज हाजिर हूँ आप सबके सामने... रविवार का दिन है.. फुर्सत ही फुर्सत है... कुछ ही देर पहले सोकर उठा हूँ... रात १ बजे सोया था और ठीक आधे घंटे बाद एक बुरी खबर ने नींद उड़ दी... मेरे साथ ही काम करने वाले एक लड़के, विजय सिंह, का कल शाम ऑफिस से लौटते वक़्त एक्सिडेंट हो गया... हालात नाजुक तो नहीं है पर फिर भी चोटें ज्यादा है... दुआ करता हूँ कि जल्द पूर्ण रूप से स्वस्थ होकर वो हम सबके बीच होगा.... चलिए अब सबको एक दास्ताँ सुनाता हूँ... हाँ वही जिसकी घोषणा मैंने अपने पिछले पोस्ट में की थी.... एक गर्दन की दास्ताँ... पढकर आप लोग सेंटी मत होइएगा और न अपना और न मेरा गर्दन दबाईएगा...

उसी दिन की बात है, जिस दिन अपने टूटे हाथ पर ख़ुशी और दुसरे बचे हाथ के लिए दुःख मना रहा था... अचानक मेरी गर्दन तुनक गयी कि उसे मैंने क्यों अनदेखा किया... समझ में ही नहीं आया कि दो हाथों की कहानी के बीच ये मुई गर्दन की दास्ताँ कहाँ से आ गयी... बड़े प्यार से अपनी गर्दन को सहलाते हुए पूछा पर कमबख्त गर्ल-फ्रैंड से ज्यादा नखरे दिखा रही थी... इतनी खुशामद तो मैंने कभी किसी की नहीं की... आ गया गुस्सा मुझे, पकड़ ली गर्दन अपनी और जोर से दबाते हुए पूछा तब जाकर साली ने मिमियाते हुए जवाब दिया... 

गर्दन... "अभिषेक तुम्हे अपने बांये हाथ के आराम की ख़ुशी है, दाहिने हाथ के दुगने बोझ हो जाने का दुःख भी है... पर मेरा कौन सोंचेगा?"
मैं... "तुम्हारा??? तुम्हे क्या हुआ? तुम्हे कौन सी चोट लगी है?"
गर्दन... "मेरे अन्दर चोट लगी है..."
मैं... "पर मुझे तो इसका अहसास नहीं हुआ... ये साला दिमाग भी आज कल बंद पड़ गया है क्या..."
गर्दन... "अरे नहीं दिमाग भैया तो सही काम कर रहे है... दिल दीदी का ध्यान कहीं और है..."
मैं... "हाँ ये तो है... तुम्हारी दिल दीदी तो बस एक ही ख्वाब में डूबी रहती है, न किसी बात का पता है और न ही होश..."
गर्दन... "वो भी क्या करेगी बेचारी, उसकी गलती थोड़े ही है... ये तो आँखों का कसूर है जिन्होंने उसे इस काम में लगा दिया..."
गर्दन... "अभिषेक जी आपने सोंचा है कि आपके हाथ टूटने से सबसे ज्यादा तकलीफ मुझे होने वाली है..."
मैं... "वो कैसे?"
गर्दन... "ये आपका बिगड़ा-लाडला बांया हाथ लटका हुआ तो मुझसे ही रहेगा... एक तो पहले ही मेरे ऊपर भैंस से भी बड़े और भारी दिमाग भैया का बोझ है... और अब ये आधा किलो का हाथ और दो किलो का प्लास्टर का वजन... मेरी तो गर्दन... उफ़ मतलब मैं ही टूट जाउंगी..."
मैं... "अरे हाँ यार... ये तो मैंने सोंचा ही नहीं था..."
गर्दन... "एक तो गलती दिल दीदी की, ध्यान कहीं और था उनका... फिर पैर चाचा का जो संभल नहीं पाए... और उस पर से हाथ भाई, जो छोटी से बात पर टूट कर बैठ गए... फिर सबकी गलती की सजा मैं क्यों भुगतूं?"
मैं... "सब भाई बंधू है तुम्हारे... तुम नहीं देख-भाल करोगी तो और कौन करेगा...?"
गर्दन... "पर हर बार... जुबान बहन कुछ गलती करेगी और लोग मुझे पकड़ लेते है... आँखें गलती करें और लोग मुझे मरोड़ देते है..."
मैं... "अब जुबान और आँखें किसी के हाथ नहीं आते न इसलिए..."
गर्दन... "और हाथ और दिमाग भैया मिलकर कोई गलती करें तो तलवार मेरे ऊपर क्यों लटकती है?"
"......."
गर्दन... "कोई गुनाह हाथ करें और फांसी का फंदा मुझे मिलता है... "
"....."
गर्दन... "क्या हुआ जवाब नहीं है न? पार्टी में अच्छा दिखना हो टाई बाँध देते हो मुझे... कितना सफोकेसन होता है कभी महसूस किया है... चेहरे को सुन्दर बनने के लिए न जाने कितने क्रीम लगा लेते हो... बदन के लिए भी न जाने कितने सुगन्धित साबुन और इत्र हैं आपके पास... पर मेरे बारे में कभी सोंचा... नहीं न?"
मैं... "अब छोडो इन बातों को...."
गर्दन... "क्यों छोडूँ? आपके लाडले को सँभालने के लिए पट्टा मुझे लगा दिया... पट्टे की रगड़ से कितनी जलन होती है मुझे..."
मैं... "तुम तो मुझे शमिन्दा करने लगी अब..."
गर्दन... "क्यों न करूँ? मेरी तो औकात ही नहीं है आपकी नजर में... "
मैं... "औकात कैसे नहीं है... जिसे भी चाहता हूँ, जो भी अजीज है उसे पहले तुमसे ही तो मिलाता हूँ... गले लगा लेता हूँ.."
गर्दन... "बस इतना ही न... और?"
मैं... "एक मिनट रुको... आता हूँ... मेरा फ़ोन बज रहा है..."
गर्दन... "जवाब नहीं है तो फ़ोन का बहाना करके भाग लिए... अब आप ही लोग मेरे दुःख और दर्द का रास्ता बताइये..."

अब आप लोग ही बातों यार... मैं क्या करूँ? ये तो नाराज बैठी है मुझे... कहीं किसी दिन लचक गयी तो लेने के देने पड़ जायेंगे... उससे पहले प्लीज रास्ता बता देना...

बुधवार, 16 नवम्बर 2011

१२० करोड़ लोगों की सार्थक और सच्ची चिंता...

पता है जब तक दोनों हाथ सलामत थे कमबख्त लिखने को कुछ मिलता ही नहीं था... कुछ सूझता ही नहीं था.... और आज जब एक हाथ काम कर रहा है तो उसके लिए काम बढ़ाने के लिए दिमाग के पास कई विचार आ रहे है... सोंचा था नहीं लिखूंगा... पर इस कमबख्त दिमाग ने मजबूर कर दिया है.... दिमाग से ज्यादा न्यूज़ चैनल वालों ने मजबूर कर दिया है... कल थका हारा ऑफिस से घर आया था... सोंचा थोडा आराम करूँगा पर ये कमबख्त न्यूज़ चैनल वाले... शान्ति से बैठने ही नहीं देते है.... सबको पता है (ऐसा मेरा नहीं न्यूज़ चैनल वालों का विचार है, मेरा विचार कुछ और है) कि अभी भारत और वेस्ट-इंडीज के बीच दूसरा टेस्ट क्रिकेट मैच चल रहा है... सचिन जी कल शायद जल्द ही आउट हो गए थे... मैंने नहीं देखा (और इच्छा भी नहीं थी देखने की, वैसे इन्टरनेट पर भी पता कर सकता हूँ पर इतनी जहमत कौन करें फालतू के कामों के लिए)..... हाँ तो कल शायद सचिन जी जल्द आउट हो गए थे... समस्या यही से शुरू हो गयी... १२० करोड़ हिन्दुस्तानियों के दिल की उम्मीद टूट गयी (ऐसा एक न्यूज़ चैनल का हेड लाइन था)... अब मुझे ये समझ में नहीं आ रहा कि सबसे पहले तो मैं दुखी नहीं था, मेरे परिवार में भी किसी को अफ़सोस नहीं था.... मेरे दोस्तों को भी परेशानी नहीं थी, ऑफिस के लोगों को तो काम के अलावा पता ही नहीं था और कुछ....अब मिला जुला के लगभग ५० लोग तो ऐसे कम हो गए... 

अब चलिए संभावित रूप से लगभग ५ करोड़ तो छोटे बच्चे है जिन्हें शायद ही क्रिकेट समझ में आता होगा... देश हमारा अमीरों का है पर यहाँ लगभग २०  करोड़ तो जरूर अति गरीब लोग होंगे जिन्हें अपनी दाल-रोटी की चिंता से ज्यादा किसी और बात की चिंता नहीं होती... अब इतने बड़े देश में सभी स्वतंत्र है, सबकी अपनी राय है... मेरे ख्याल से १५-२० करोड़ लोग तो जरूर होंगे जिन्हें क्रिकेट नहीं पसंद होगा... ५ करोड़ लोग सचिन सर को पसंद नहीं करते होंगे... अब कुछ लड़कियां भी होंगी जिन्हें क्रिकेट की तो समझ नहीं होगी हाँ क्रिकेट प्लेयर्स पसंद हो सकते है... मतलब अगर सीधे सीधे कहें आधी जनसख्या भी नहीं होगी जिसे इस बात का अफ़सोस होगा... फिर ये मिडिया वाले किस १२० करोड़ की बात कर रहे थे???

अब एक और मुद्दा है मेरे पास... इन्ही न्यूज़ चैनल वालों ने दिमाग खराब कर रखा है मेरा... अमिताभ बहु, ऐश्वर्या राय, लड़की को जन्म देंगी या लड़के को (वैसे वो एक प्यारी सी बच्ची को जन्म दे चुकी है, मेरी मुबारकबाद है उनके साथ और दुआ उस बच्ची के साथ)... इस बात से किस १२० करोड़ लोगों को फर्क पड़ रहा था... क्या इससे मंहगाई कम होने वाली थी या फिर सरकार बदलने वाली थी... मैंने तो सुना कि करोड़ों अरबों रुपये लोगों ने सट्टा तक लगा रखा था... मैंने पहले ही कहा था न ये देश अमीरों का है, यहाँ किसे लड़की होगी या लड़का इस बात पर अरबों का सट्टा लग जाता है... और फिर भी विपक्षी दल मेरे भोले-भाले सरकार को दोष देती फिर रही है... सब विपक्षी दलों की साजिश है... भाई मेरा देश बहुत खुशहाल है... वरना न्यूज़ चैनल्स क्या समस्या, भ्रष्टाचारी यस जन चेतना जैसी खबरें नहीं दिखाती??? भाई कोई समस्या इस देश में हो तब न.... सबसे बड़ी समस्या जो मुझे कल ही समझ में आई कि मेरे सचिन सर ने १६ पारियों से एक शतक नहीं लगाया है... क्या हुआ जो और तीन खिलाड़ियों ने शतक लगा दिए... भाई देश की समस्या तो सचिन जी के शतक से ही ख़त्म होगी.... है न दोस्तों???

चैनल वालों मैं आपके साथ हूँ... आप ऐसी ही अच्छी अच्छी खबरें दिखाया करें और नाहक उल्टी पुल्टी खबरें दिखा कर देश को बदनाम न करें... इसी बीच सरकार ने एक छोटी सी भूल कर दी है... उनसे विनम्र निवेदन है कि अपनी त्रुटी को सुधार ले... गलती से उन्होंने 'पेट्रोल की कीमत २.२२ रुपये "घटी" कह दिया बढ़ी के बजाय... देशवाशियों कृपया मेरे भोले-भाले सर्कार को इस छोटी सी भूल के लिए माफ़ करें और अपनी सराफत के साथ पेट्रोल की कीमत बढा कर दें... इससे आपकी ही आदत बनी रहेगी...

अभी के लिए इतना ही.... भाई एक हाथ से कितना काम करवाओगे आप लोग... बाकी फिर मिलेंगे... जल्द ही... "एक गर्दन की दास्ताँ लेकर"....

सोमवार, 14 नवम्बर 2011

शुभ समाचार... कृपया पढ़ के आंसू न बहाना... मेरे साथ ख़ामोशी से मुस्कुराना....

अत्यंत ख़ुशी के साथ सबको सूचित करना चाहता हूँ कि पिछले ६ महीनों में दूसरी इसी शनिवार को मैंने अपना बांया हाथ तुडवा लिया है. पिछली बार की तरह इस बार भी बांयी कलाई की जोड़ ने साथ छोड़ दिया है. हुर्र्राआह.. अब एक महीने तक बांये हाथ को आराम... पर दाहिने हाथ के साथ मेरा भरपूर दुःख भी है... बेचारे को आराम नहीं मिलता कभी और अब दोहरा काम भी करना पड़ेगा.  आप लोगों को भी एक महीने के लिए अपने ब्लॉग से छुट्टी दे रहा हूँ... खूब मजे कीजिये... और मेरे ब्लॉग से जो टाइम बचेगा उसे किसी और ब्लॉगर को प्रोत्साहित करने में खर्च कीजिये... जल्द आप सबसे मिलने के लिए अभी अलविदा... 

आप सबका खामोश ब्लॉगर,
अभिषेक प्रसाद 
मो. +९१ ९८१८३१४६७८

बुधवार, 26 अक्तूबर 2011

शुभ दिवाली- लाभ दिवाली...





आज दिवाली है... आप सबको बहुत बहुत बधाई... पर पता नहीं क्यों ये दिवाली बिलकुल अमावस्या की रात की तरह काली और अँधेरी नजर आ रही है... बिलकुल अकेला और उदास... पर आपके लिए मेरी दुआ है कि आप सब खुशियों की रौशनी में भींगे रहे... अकेलेपन का अँधेरा आपके जीवन में कभी न आये... आब सबके जीवन में आज की अमावस रात आखिरी काली रात हो... जीवन में सिर्फ रौशनी ही रौशनी हो... 

खुशियाँ ही खुशियाँ हो...
अमावस की काली रात
पर अँधेरा बिलकुल भी नहीं
चाँद नहीं है तो क्या हुआ
मिटटी के दीयों का उजाला तो है साथ
एक चाँद की कमी
सैकड़ों दिए मिलकर कर देंगे...
आज की अमावस रात
किसी को चाँद की कमी नहीं खलेगी
हम अपने जीवन का अँधेरा
खुद भगा लेंगे
हमें नहीं जरूरत किसी और के वजूद के
हमारा वजूद खुद सबसे बड़ा है
आज की अमावस काली रात
हम अपने जीवन की आखिरी काली रात साबित करेंगे
हम अँधेरे ख़त्म करेंगे
और जीवन में खुशियों के कड़ोरों
दिए जला लेंगे
आज की अमावस काली रात
मेरी दुआ, आपकी ख़ुशी
हम मनाएंगे
शुभ दिवाली- लाभ दिवाली...

सोमवार, 24 अक्तूबर 2011

मेरी पहली कहानी प्रकाशित: वटवृक्ष



 कवितायें तो कई प्रकाशित हुई है... पहली बार मेरी लिखी कहानी वटवृक्ष में प्रकाशित हुई... पूरा श्रेया रश्मि प्रभा जी और रविन्द्र प्रभात जी को... वटवृक्ष की प्रति पाना चाहे तो ravindra.prabhat@gmail.com पर संपर्क कर सकते है...

मंगलवार, 18 अक्तूबर 2011

वो रात...



कल की काली अँधेरी रात...
किसी रौशन दिन से भी ज्यादा रौशन थे
वो सामने थी मेरे
कई महीनो बाद
और मैं बिलकुल उसके पास
इतने पास की मैं उसे महसूस कर सकता था
उस रात का हर एहसास अभी तक
मेरे रोम रोम में सिहरन पैदा कर रहा है
पहली बार उसे सीने से लगा कर
महसूस हुआ जैसे आज तक खाली था
और मेरा खालीपन उसी वक़्त पूरा हो चूका हो
जब उसे थाम रखा था बांहों में मैंने
लग रहा था जैसे पूरी जिन्दगी सिमट कर आ गयी हो मेरी बांहों में
उसके होंठो की पहली हलकी छुअन ने
जैसे सदियों की प्यास मिटा दी हो...
वो पल ऐसे थे जब पहली बार एहसास हुआ
की मैं सच में जी रहा हूँ
वरना आज तक खुद को मुर्दा ही समझता था मैं...
जब वहां से चलने का वक़्त हुआ
तो पैर जैसे जम गए थे धरती पर
जैसे वहां की हवा, जमीन, यहाँ तक की हर चीज
मुझे रोक रही हो...
और उसपर से उसका मेरे हाथों को पकड़ कर
दो बूँद आँखों में आ जाना
मैं एक कदम भी आगे बढ़ने में सक्षम नहीं था
पर मजबूरी हमेशा भारी पड़ती है इच्छाओं पर
और वही हुआ
आखिरकार मुझे जाना ही पड़ा उसे छोड़कर
छोड़कर तो मैं आया था उसे
पर अकेला मैं खुद हो गया था
उस रात मैंने अपनी पूरी जिंदगी जी ली थी
और यकीन मानिए मुझे और जीने की ललक पैदा हो गयी है
उसके साथ जीने की...
काश वो रात वही उसी पल हमेशा के लिए रुक गया होता...
तो आज मैं अकेला न होता
और न मैं उसकी याद में फिर आंसू बहा रहा होता...
वो रात...

शुक्रवार, 30 सितम्बर 2011

झूठे धार्मिक नियम या प्राकृतिक क्रिया... कौन है सही?

आज सुबह-सुबह एक बड़ी अनोखी बात मालूम पड़ी, सच बोल रहा हूँ पहली बार ही मालूम पड़ी है... इसके पहले कभी नहीं सुना था ऐसा... हमारे समाज के सभी संस्कारी, धार्मिक और भले मानवों से मैं पहले ही क्षमा मांग लेता हूँ... कोई बात अगर बुरी लगे तो इस अदना इंसान को माफ़ करेंगे... क्योंकि सभी जानते है मेरे बारे में कि मैं सीधी बात समझता हूँ... जो दिखाई देता है, जो सुनाई देता है, सीधा कहूँ तो जिसे मैं महसूस करता हूँ बस उसी पर विश्वास करता हूँ... और इसलिए मैं इंसानों द्वारा बनाये गए भगवान पर विश्वास नहीं करता...

तो चलिए सीधे मुद्दे पर आता हूँ... बुरा लगे तो माफ़ी के साथ बात शुरू करता हूँ... भाई सभी जानते होंगे कि नवरात्रे शुरू हो चुके है (कम से कम इस देश में रहने वाले लोगों को तो मालूम होगा ही)... नहीं मालूम तो बता देता हूँ आज नवरात्रे का तीसरा दिन है... सभी भाई-बंधू, माता-बहनें और वो लोग भी, जो बहने या माता नहीं है, भाई या बंधू नहीं है, पूजा-अर्चना में जुटे पड़े होंगे... मेरी भी एक दोस्त है जो बड़ी श्रधा से हर साल नवरात्रे का व्रत तक रखती थी... पर इस साल नहीं रखा... पहला आश्चर्य तो यही था मेरे लिए... पर उसने कहा उसकी तबियत ठीक नहीं है तो इस बार बस यूँ ही सिर्फ रोज पूजा कर लिया करेगी... मैं तो खुश ही था अच्छा है उसे भूखा नहीं रहना पड़ेगा...

यहाँ मेरा पहला सवाल: सिर्फ एक वक़्त हम भूखे रहे, कुछ न खाए तो हमारे माता-पिता को गहरी चिंता होने लगती है, वो उदास और परेशान हो जाते है फिर जगत के माता-पिता हमारे भूखे रहने से कैसे खुश होते है?

चलिए अब आगे की बात... दो दिन तो उसने पूजा की पर आज जब सुबह उससे पूछा कि पूजा कर ली तो मना कर दिया और कहा कि आज नहीं करेगी... झटका यहाँ लगा मुझे... मुझे लगा कहीं उसकी तबियत तो खराब नहीं... पर उसने कहा कि ठीक है... आवाज से भी तबियत ठीक ही लग रही थी... फिर क्या बात थी?... बहुत पूछा उससे पर बताया उसने कुछ नहीं... आखिरकार अपनी कसम देनी पड़ी (जो कि मैं हमेशा करता हूँ उससे बात निकलवाने के लिए... और मजे कि बात ये है कि हरबार सफल होता हूँ)... आज भी हुआ... जो कारण उसने बताया वो मेरे लिए अटपटा था... आप लगभग हर किसी को पता होगा कि महिलाओं को हर महीने माहवारी (Menstrual Cycle / Periods ) आती है... प्राकृतिक क्रिया है और एक हद तक... नहीं, नहीं... जरूरी भी... खैर मैं अभी इस पर कोई ज्ञान नहीं देने वाला, क्योंकि मैं कोई डॉक्टर या साइंस का विद्यार्थी तो हूँ नहीं जो इस पर लेक्चर दूँ... मेरी दोस्त के अनुसार इस दिन वो लोग पूजा या किसी शुभ काम से दूर रहते है...

यहाँ मेरा दूसरा सवाल: जिस भगवान/प्रकृति ने हमें बनाया, उसी ने हर शारीरिक चक्र का भी निर्माण किया... फिर उसी भगवान की पूजा से दूरी क्यों?...

ऐसा तो है नहीं कि महिलाएं ये चक्र अपनी इच्छा से अपने अनुसार लाती हैं... आपको नहीं लगता कि अगर कुछ संस्कारी लोगों ने ऐसे कुछ घटिया नियम बना रखे है तो हमें उन्हें बदलना चाहिए... सिर्फ इस कारण से महिलाओं/लड़कियों को पूजा-पाठ या किसी और शुभ काम से दूर रखा जाये क्या गलत नहीं है?... यही कारण है कि इन समय में लड़कियों में चिडचिडाहट और उदासी देखी जाती है... क्या उन्हें अलग और अकेला रख कर हम उनपर कुछ ज्यादती नहीं कर रहे... मेरी उसी दोस्त ने आज बताया कि माड़वाड़ी महिलाएं इन दिनों अपने किचन और यहाँ तक कि बिस्तर से भी दूर रहती है... जबकि जहाँ तक मैंने अभी अभी इसके बारे में इन्टरनेट के माध्यम से ही थोड़ी बहुत जानकारी हासिल की है उसके अनुसार ये सिर्फ एक प्राकृतिक और शारीरिक चक्र क्रिया है जिका कोई दुस्परिणाम नहीं होता... विज्ञान भी कहता है कि इससे न कोई हानि है और न ही ये किसी प्रकार से भी गलत है... फिर हम मनुष्य किस औकाद से प्रकृति के ऊपर नियम बाँध रखे है... वो भी ऐसे जो मेरी नजर से सरासर गलत है...

आप लोगों में से कोई भी अगर मेरी बात के विरुद्ध और समाज के इस नियम के पक्ष में है तो बिना कारण बताये टिपण्णी न करें... क्योंकि जब तक कोई ठोस कारण न हो मैं किसी की बात नहीं मान सकता...

रविवार, 25 सितम्बर 2011

मेरी भगनी... सिद्धीश्री

video
मेरी भगनी कपडे धो रही है... क्या करेगी आखिर माँ भी जॉब करती है और उसके पा भी... घर का काम तो उसे ही करना होगा न... 

बृहस्पतिवार, 8 सितम्बर 2011

छोटा कद पर बड़ा वजूद...

दिल्ली में रहने वाले या फिर वो लोग जो एक न एक बार दिल्ली जरूर आये है, उन्हें पता है कि यहाँ यात्रा करना किसी जंग लड़ने से कम नहीं है. मेट्रो की सवारी तो थोड़ी सुविधाजनक है, ऑटो या टैक्सी हर किसी के बस की नहीं है, पर बस की यात्रा का लुफ्त तो सबसे अलग है. जैसे मुंबई की ट्रेन वहां की जिंदगी है वैसे ही डी टी सी दिल्ली की जान है. दिल्ली में रहने वाले उत्तम नगर बस स्टॉप से भी भली भाँती परीचित होंगे. आज मैं वहीँ की बात बताने जा रहा हूँ.

बात कल सुबह की है. ऑफिस जाने के लिए उत्तम नगर की बस स्टॉप पर खड़ा था. तभी पास में एक महिला को देखा. कद सिर्फ लगभग दो फीट. हाँ जी, सिर्फ दो फीट. डी टी सी के लो फ्लोर बस के फ्लोर की ऊँचाई भी उसके लिए कहीं ज्यादा थी. पर उस महिला ने उस भीड़ में भी जगह बनाते हुए उस बस में चढ़ने में सफलता हासिल कर ही ली. बस में चढ़ने की जद्दोजहत, उसकी जिंदगी की जद्दोजहत के सामने कहीं छोटी थी. कई लोगों के आँखों में मैंने उस महिला के लिए मजाकिया मुस्कान देखा था. झूठ नहीं बोलूँगा पर मेरे मन में भी उसके लिए कुछ कुछ ऐसे ही भाव थे और थोड़ी सी सहानुभूति के साथ साथ दया और दुःख भी था. पर उस छोटी सी लडाई की जीत ने मेरे दिल में उसके लिए सिर्फ एक सम्मान ही पैदा नहीं किया बल्कि एक आत्मविश्वास का भाव भी जगा दिया.

बस में उसके चढ़ जाने के बाद बाहर से बस की खिड़की के मैंने उसे बस की सीट पर चढ़ने की कोशिश और सफलता देखी. पता नहीं क्यों पर मेरा मन एक ख़ुशी और संतुष्टि से भर गया. उस छोटी सी कद में भी इतना बड़ा वजूद छिपा था जिसे मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकता.

उस दो फीट के कद आगे भी मैं अपने आप को बहुत छोटा महसूस कर रहा था. अगर उनकी चर्चा मैं नहीं करता तो शायद अधुरा महसूस करता. उनके लिए मेरे दिल में एक सम्मान है, आदर है और उनकी हर सफलता के लिए ढेरों दुआ है...

शनिवार, 3 सितम्बर 2011

एक पत्र राष्ट्रपति के नाम...

आदरणीय महामहिम राष्ट्रपति महोदया,

कई दिनों से सोंच रहा था आपको एक पत्र लिखूं, पर शायद हिम्मत साथ नहीं दे रही थी. आज बहुत हिम्मत जुटा कर आया हूँ आपको ये पत्र लिखने... बातें बहुत सी है जो आपसे कहना चाहता हूँ. पर एक ही पत्र में इतनी सारी अगर बातें लिख दी तो आप बोर हो जाएँगी.... इसलिए सिर्फ एक मुद्दे को उठा रहा हूँ. शायद मेरी बात आपको बुरी न लगे.

मैं आज बात करना चाहता हूँ हमारे पुलिस डिपार्टमेंट की... मैम अगर आप देखे तो बहुत सी कमियाँ आपको नजर आएँगी हमारी पुलिस में. उनके काम करने का ढंग (जो वो कभी करते ही नहीं है), उनकी छवि, उनके व्यक्तित्व में बहुत सी कमियाँ है. पुलिस का काम होता है लोगों की रक्षा करना, एक भय-मुक्त समाज देना. पर आज सबसे ज्यादा भय आम आदमी को पुलिस से ही है. लोगों को अपनी रक्षा उनसे ही करनी है. हर चौराहे को पार करते वक़्त आम आदमी के मन में एक भय रहता है कि उसका सामना किसी पुलिस से न हो जाये. आज पुलिस गुंडों के ज्यादा विश्वासी नजर आते है.

सेना में सैनिकों की रिटायर्मेंट आयु शायद ३५ साल होती है, उन्हें कड़ी ट्रेनिंग दी जाती है, उन्हें चुस्त-दुरुस्त रखा जाता है देश के बाहरी दुश्मनों से लड़ने के लिए... फिर यही सब पुलिस के साथ क्यों नहीं होता क्योंकि पुलिस का काम भी तो दुश्मनों से लड़ने का ही है. मैं आज तक जहाँ भी गया हूँ कहीं के पुलिस को देखकर मेरे मन में श्रधा के भाव उत्तपन नहीं हुए है. गोल-मटोल, थुलथुले शरीर को देखकर अनायास ही मन में एक भय उत्तपन हो जाता है कि ये पुलिस हमारी रक्षा कैसे करेंगे... उम्र के हिसाब से उनका शरीर कमजोर पड़ता जाता है. क्यों नहीं पुलिस डिपार्टमेंट में भी रिटायर्मेंट आयु ३५ साल कर दी जाये... इससे दो फायदे होंगे एक तो चुस्त-दुरुस्त पुलिस हमें मिलेगी, जो हर परिस्थिति में दुश्मनों से लड़ने के लिए सक्षम रहेगी और कई नए रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे. नौजवान और युवा लोग डिपार्टमेंट में रहेंगे तो भ्रष्टाचार भी कम होगा और भयमुक्त समाज बनाने में उनकी उपयोगिता भी ज्यादा रहेगी...

हर नाके पर दो हवालदार आराम से देखे जा सकते है जो आने जाने वाले वाहनों से टोकन यानी १०-२० रुपये लेते हुए आसानी से इस देश में देखे जा सकते है. चाहे ट्रैफिक पुलिस हो या आम हवालदार ५० रुपये देकर आसानी से काम चलाया जा सकता है. मैं मानता हूँ कि घुस लेना उनकी मजबूरी है क्योंकि उन्हें भी ऊपर से दबाव रहता है. पर ये दबाव कम क्यों नहीं किया जाता? हमारी पुलिस को आधुनिक क्यों नहीं बनाया जाता?

महामहिम आपसे नम्र निवेदन कि ज़रा सा सोंचिये... आखिर भ्रष्टाचार का क्या कारण है? कैसे इस भ्रष्टाचार को ख़त्म किया जा सकता है? कैसे आम आदमी का भय मिटाया जा सकता है उनके ही रक्षकों से?

मैं आशा करता हूँ कि आप मेरी बातों पर जरूर गौर करेंगी. कोई बात अगर मैंने गलत लिखी हो तो माफ़ी की आशा करूँगा.

एक भारतीय,
अभिषेक प्रसाद 'अवि'

शुक्रवार, 2 सितम्बर 2011

एक पत्र दयनीय आदमी के नाम...

दयनीय आम आदमी,
        सादर प्रणाम.
आशा करता हूँ आप हमेशा की तरह दयनीय ही होंगे. मैं भी सकुशल दयनीय हूँ. मैंने आप लोगों को न ही प्रिय लिखा और न ही आदरणीय क्योंकि न ही आप लोग मुझे प्रिय है और न ही आदरणीय. मैंने नया शब्द दिया है "दयनीय" क्योंकि आप और हम सब दयनीय ही है.
 
मैं सबको पत्र लिखता हूँ, सोंचा एक पत्र आप लोगों को भी लिखूं... पर ये नहीं सोंचा कि क्या लिखूं. क्योंकि आप लोगों को लिखने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है... और अगर लिख भी दिया तो फायदा क्या होगा? कुछ भी नहीं. कि हम सब आम आदमी है, हमें किसी बात से कोई फर्क नहीं पड़ता.
 
सैकड़ों की भीड़ में कोई ख़ास आदमी किसी की इज्जत उतार देता है, हम देखते रहते है. फर्क ही नहीं पड़ता. हम करोड़ों लोगों पर कुछ ख़ास सैकड़े लोग शासन करते है और हमारा शोषण करते है, हम चुपचाप ख़ामोशी से सहते रहते है. फर्क ही नहीं पड़ता. कुछ हजार नेता मिलकर हमसे झूठे वाडे करते है, हमारा शोषण करते है, हमें ही बेच कर खाते है. हम कुछ नहीं करते, चुपचाप चादर तान कर  जाते है है. फर्क ही नहीं पड़ता.
 
कुछ हजार भ्रष्ट लोग हमारे ही काम के लिए हमसे ही घुस लेते है, हमारा दोहन करते है और हम ख़ामोशी रहते है, आवाज नहीं उठाते. क्या करें फर्क ही नहीं पड़ता. देश का तीसरा स्तम्भ रोज ख़बरों और भविष्यवाणी के नाम पर हमें डराता है. हम सिर्फ डरते है करते कुछ नहीं. कुछ गुंडे रोज हमें धमकाते है, हम चुपचाप सहते है. फर्क ही नहीं पड़ता.
 
हम करोड़ों लोगों के सामने किसी अबला की इज्जत उतार दी जाती है और हम गांधी के बन्दर बन जाते है. कुछ आतंकवादी, नक्सलवादी रोज हमें मारते है. हम चुपचाप मरते है करते कुछ नहीं. फर्क ही नहीं पड़ता. हम घर के अन्दर बैठ कर प्रशासन को, व्यवस्था को, सरकार को दोष दे सकते है कर कुछ नहीं सकते.
 
हम आम आदमी जन्म लेते है, करोड़ों-अरबों की भीड़ में धक्का-मुक्की करते हुए जीवन भर चलते है और एक दिन गुमनाम मौत मर जाते है पर करते कुछ नहीं. फर्क ही नहीं पड़ता. हम आम आदमी की भीड़ में से अगर कोई ख़ास बनने की कोशिश भी करता है तो हम आम आदमी उसके पैर पकड़ कर उसे गिरा देते है. हम आम आदमी है और अपने बीच से किसी को ख़ास बनते देखना हमें गवारा नहीं है. हम आम आदमी ही बने रहना चाहते है. एक दयनीय आम आदमी क्योंकि हमें कोई फर्क नहीं पड़ता.
 
आम आदमी से मैं बस एक नम्र निवेदन करना चाहूँगा कि वे आम आदमी ही बने रहे, दयनीय ही बने रहे. आदरणीय न बने. बेकार में दुसरे आम आदमियों को कष्ट होगा.
 
आप ही की तरह एक दयनीय
अभिषेक प्रसाद 'अवि'

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