आदरणीय प्रधानमत्री महोदय,
सबसे पहले मेरा सादर अभिनन्दन स्वीकार करें. मैं इस देश एक आम और बहुत ही मामूली आदमी हूँ. पर मेरे ख्याल से व्यक्ति का व्यक्तित्व कितना भी छोटा क्यों न हो उसमें अपने देश और अपनों के लिए तिनका भर ही सही प्रेम अवश्य होगा. आज उसी तिनके बराबर प्रेम से मजबूर होकर आपको ये ख़त लिखने बैठा हूँ. कुछ मुद्दे ऐसे है जो किसी को भी सोंचने पर मजबूर कर सकते है और सिर्फ सोंचने पर नहीं उनपर आवाज उठाने पर भी. पर हम आम आदमी की बहुत बड़ी कमजोरी है कि हम किसी भी मुद्दे पर सोंच तो लेते है, घर बैठ के बुरा-भला भी कह लेते है पर जब आवाज उठाने की बारी आती है तो खुद को आम आदमी कह कर, कुछ न कर पाने की मजबूरी जताते हुए चुपचाप चादर के नीचे सर छुपा का सो जाते है. यकीं मानिए मैं भी उन्ही लोगों में से हूँ. आज ये जो ख़त मैं आपको लिख रहा हूँ ये बस दिल से मजबूर होकर लिख रहा हूँ वरना दिमाग तो अभी भी समझा रहा है कि शाम के खाने की चिंता करो घर में गैस ख़त्म हो रखी है... पर क्या करूँ मेरी बचपन से यही एक कमजोरी रही है कि जब दिल हावी होता है तो दिमाग के हाथ से सारा कंट्रोल अपने हाथों में ले लेता है और मैं चाह कर भी चुपचाप नहीं रह पाता.
इस ख़त में हो सकता है कुछ त्रुटियाँ हो जायें, हो सकता है आपको मेरी किसी बात से ठेष पहुंचे... पर इस देश का नागरिक होने के नाते मैं समझता हूँ कि हर व्यक्ति को ये अधिकार होना चाहिए कि वो उन लोगों से सीधे-सीधे सवाल कर सके जिन्हें वो अपना अभिभावक चुनते है, जिन्हें अपना कर्ता-धर्ता बनाते है. घर में भी तो बच्चों को ये अधिकार होता है कि वो अपने माता-पिता से बात कर सके और यही सिखाया भी जाता है.
कल शाम घर वापस आकर न्यूज़ चैनल देख रहा था... वैसे तो देखता नहीं, गलती से चैनल लग गया था. कुछ गणमान्य नेता-गण संसद की गरिमा भंग होने को लेकर रोष प्रकट कर रहे थे. शायद किसी और बहु-चर्चित व्यक्ति ने हमारे नेताओं के खिलाफ अभद्र भाषा का प्रयोग किया था. मैं इसके बिलकुल खिलाफ हूँ, किसी को भी किसी के भी प्रति अभद्र भाषा का उपयोग नहीं करना चाहिए. पर मेरा आपसे बड़ा सीधा सा सवाल है कि क्या अगर किसी ने ऐसा कर भी दिया तो इतना रोष प्रकट करना जरूरी है? मुझे तो लगता है रोज ही लाखों-करोड़ों लोग ऐसी भाषा का उपयोग नेता-गण और अफसर-साही के लिए करते ही है. फिर उन पर हल्ला-बोल क्यों नहीं होता? कल एक अति-चर्चित ब्यक्ति ने चुनाव क्षेत्र में चुनाव प्रचार के समय आवाज उठा दी तो सबको तकलीफ हो गयी, कहीं ये अन्दर का डर तो नहीं था? और फिर हमारे नेता-गण उस समय हल्ला क्यों नहीं बोलते जब संसद के अन्दर ही गालियाँ-कुर्सियां-चप्पल-जूते चलने लगते है? उस वक़्त संसद की गरिमा क्यों भंग नहीं हुई जब बीच संसद में नोटों के गड्डियां लहराई गयी? उस वक़्त सब एक जुट क्यों नहीं होते जब स्पीकर महोदय/महोदया शान्ति की अपील करती रहती है? मैंने तो छोटे-छोटे बच्चों तक को देखा है जो क्लास में टीचर के कहने में चुप हो कर बैठ जाते है. फिर इतने सभ्य लोग ऐसा क्यों नहीं कर पाते?
ये एक सही सवाल है कि भ्रष्ट लोग हमारे संसद के अन्दर से कैसे निकले. ये देश के लिए जरूरी भी है. कल कोई नेता कह रहे थे कि इन्हें जनता चुन कर भेजती है. बिलकुल सही हम जनता ही इन्हें चुन कर भेजते है, पर अगर हमारे पास आप्शन ही यही रहे तो हम क्या करें? क्या ये राजनितिक पार्टियों की जिम्मेदारी नहीं बनती कि वो ऐसे लोगों को राजनीति से दूर रखे? हाँ ये भी सही है कि सिर्फ आरोपी को हम इनसे दूर नहीं कर सकते. क्योंकि अगर ये नियम बना दिए गए कि आरोपी को भी राजनीति से दूर रखा जाये तो फिर तो कोई भी संसद के अन्दर नहीं बचेगा. हर किसी पर कोई न कोई आरोप मढ़ता ही रहेगा. पर इसके निदान के लिए क्यों नहीं आप लोग (क्योंकि हम तो तय कर नहीं सकते, ये अधिकार हमारे पास नहीं है) ये तय करते है कि नेताओं या राजनितीं कार्यकर्ताओं पर लगे आरोपों को फास्ट-ट्रैक कोर्ट में जल्द निपटारे का प्रावधान हो? क्यों ऐसा होता है कि भ्रष्टाचार के केस भी सालों चले आ रहे है और तब तक तो भ्रस्टाचार का पैसा और सबूत दोनों मिटटी में दफन हो जायेंगे.
पिछले साल में भ्रष्टाचार मिटाने को लेकर लोगों को एक जुट होते हुए दुनिया ने देखा. और ऐसा आप सब भी चाहते होंगे. फिर एक अदद लोकपाल को पारित करने में इतनी देरी क्यों? आखिर अपने देश का पैसा दुसरे देश के बैंक से लाने में इतनी तकलीफ क्यों? क्या आप नहीं चाहते कि वो अरबों से भी ज्यादा का धन जो दुसरे देश के बैंक में पड़ा है इस देश के गरीबों के काम आये? दुनिया जानती है कि हमारे देश का बहुत बड़ा हिस्सा धन का काला हो चूका है. क्या फर्क पड़ता है ये किसने किया या किसने धन को काला करके विदेश पहुंचा दिया है? इसे बाद में भी पता लगाया जा सकता है (वैसे भी पता लागाने बैठे तो इस देश का इतिहास है कि किसी भी बात का हल निकलने में यहाँ सालों गुजर जाते है और इसका बहुत बड़ा सबूत हमारे सामने गुजरात दंगे, बाबरी काण्ड, भोपाल गैस त्रासदी, इत्यादि-इत्यादि है). मेरे ख्याल से तो पहले काला धन अपने देश ले आना चाहिए, दोषी का पता लगाने की जरूरत ही नहीं रह जाएगी वो ऐसे ही हार्ट-अटैक से मर जायेंगे (देश का बहुत समय बच जायेगा).
हर बार महंगाई बढती ही जा रही है. पेट्रोल के दाम बढ़ रहे है, गैस के दाम बढ़ रहे है और इन सबके कारण बाकी चीजों के दाम बढ़ रहे है. मैं सरकार की मजबूरी भी समझता हूँ कि सब्सिडी का बोझ सरकारी खजाने पर ज्यादा नहीं डाला जा सकता. पर जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ते ही तेल के दाम बढ़ जाते है वैसे ही घटने पर घटने भी चाहिए. और यहाँ भी अगर काला धन वापस आ जाये तो सरकारी खजाने में इतना पैसा होगा कि तेल की कीमत आधी भी हो जाये तो देश को अर्थ-व्यवस्था का नुक्सान नहीं होगा. या फिर मेरी माने तो एक बार ही पेट्रोल की कीमत बढा कर सौ रुपये कर दीजिये. ये साल में दो-दो रुपये बढ़ाने से तो अच्छा है. सौ रुपये कर दीजिये और हम जनता को भी अगले कम-से-कम पांच साल के लिए शान्ति से रहने का मौका दे दीजिये. ये बार-बार बजट बदलने के चक्कर से छुटकारा तो मिलेगा और गाड़ियों के कारण बढ़ने वाली प्रदुषण से भी बहुत हद तक मुक्ति मिलेगी. कई गाड़ियां वैसे ही सड़क से गायब हो जाएगी और हमारा देश ग्लोबल-वार्मिंग से भी बच जायेगा. खैर ये तो शायद मजाक की बात है. और आपके साथ मजाक करना मुझे शोभा नहीं देता.
अब कुछ बातें और भी है मेरे दिमाग में जो आपसे कहना चाहता हूँ या शायद सलाह देना चाहता हूँ. माफ़ कीजियेगा मुझे, सलाह देने का हक़ तो नहीं है पर बिना दिए रहा भी नहीं जा रहा. बुरा लगे तो कृपया बच्चा समझ कर माफ़ कर दीजियेगा.
१. जब हमें किसी ऑफिस का कर्मचारी भी बनना हो तो एक लिखित चयन प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, कम से कम दसवी पास होना पड़ता है. फिर जो सिर्फ एक ऑफिस नहीं बल्कि एक पूरा इलाका, जिला, राज्य चलाते है उनके लिए ये प्रक्रिया क्यों नहीं? मेरे ख्याल से राजनितिक उमीदवारी के लिए भी एक लिखित चयन प्रक्रिया होनी चाहिए और कम से कम स्नातक तो होना ही चाहिए.
२. हर कार्य-रत व्यक्ति के लिए एक तय उम्र-सीमा होती है. उतने उम्र का होने पर उस व्यक्ति को अपना पड़ छोड़ना पड़ता है. अभी हाल में ही इसी उम्र को लेकर एक गहरा विवाद भी उत्तपन हुआ था. फिर हमारे नेताओं के लिए रिटायरमेंट आयु तक क्यों नहीं है? मेरे ख्याल से उनके लिए भी तय उम्र सीमा होनी चाहिए.
३. इस बात से मैं भी सहमत हूँ और पहले इस बात की चर्चा कर भी चूका हूँ कि किसी व्यक्ति को सिर्फ आरोप के आधार पर राजनीति से दूर नहीं रखा जा सकता. उनके केस का निपटारा अति-तीव्र अदालात में करवाया जाए.
४. मान लीजिये कि किसी भी चुनाव में किसी क्षेत्र से १० उम्मीदवार चुनाव में खड़े होते है. उनमें से प्रत्येक को क्रमशः पैंतीस, बीस, पंद्रह, दस, आठ, चार, तीन, दो, दो और एक प्रतिशत वोट मिलते है. जीत पहले उमीदवार की होगी क्योंकि उसे सबसे ज्यादा पैंतीस प्रतिशत वोट मिले. पर क्या आपने सोंचा कि पैंसठ प्रतिशत जनता ने तो उसे मत नहीं दिया? मतलब आधी से ज्यादा (बहुमत) जनता उसके खिलाफ है फिर वो विजयी कैसे हो गया? मेरे ख्याल से जीत के लिए कम से कम पचास प्रतिशत वोट जरूरी हो जीत के लिए और जहाँ किसी भी उम्मीदवार को पचास प्रतिशत वोट न आये वहां टॉप दो या तीन उम्मीदवारों के बीच फिर से चुनाव कराया जाये.
५. चुनाव में एक आप्शन "इन में से कोई नहीं" का भी होना चैये. ताकि अगर किसी को उन में से किसी को भी न चुनना हो तो वो "इन में से कोई नहीं" का बटन दबा सके और मजबूर न हो किसी भी अनचाहे उम्मीदवार को वोट देने के लिए. और ये प्रावधान हो कि अगर पचास प्रतिशत जनता इन में से कोई नहीं का चुनाव करे तो उस चुनाव में खड़े उन उम्मीदवारों की उम्मीदवारी ख़त्म कर दी जाये.
६. ऑनलाइन वोटिंग का भी प्रावधान हो ताकि जो व्यक्ति अपने क्षेत्र से बाहर रहते है या किसी कारणवश वोट देने के लिए पहुँचने में अक्षम है वो भी अपने क्षेत्र के उम्मेदवार का चयन का रसके.
७. जिन्हें हमें चुनकर पांच साल के लिए भेजने का अधिकार है, उन्हें काम न करने या लोगों के विश्वास पर खरा न उतरने पर पांच साल से पहले वापस बुलाने का अधिकार भी हो.
८. अभी हाल के कुछ चुनावों में मैंने देखा है कि राजनितिक पार्टियां किसी राज्य से चुनाव लडती है पर अपना भावी मुख्य-मंत्री की घोषणा से चुनाव से पहले नहीं करती. मेरे ख्याल से पार्टियों को अपने नेता का नाम पहले घोषित करना चाहिए ताकि जनता अपना वोट सोंच-समझ कर दे सके और बाद में किसी अनचाहे चेहरे को अपना मुख्य-मंत्री मानने पर मजबूर न हो.
९. हमारे देश में तीन मुख्य स्तम्भ है, विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका... यहाँ मेरा ख्याल ये है कि या तो तीनो स्तम्भ स्वतंत्र रूप से काम करें या कार्यपालिका को न्यायपालिका के अंतर्गत रखा जाये ताकि निष्पक्ष रूप से कार्यपालिका अपना काम कर सके और कोई दबाव उस पर न हो. मतलब कि पुलिस तंत्र और सी.आई.डी या सी.बी.आई. सरकार के अन्दर न होकर या तो स्वतंत्र हो या फिर न्यायपालिका के अन्दर हो.
१०. एक आम आदमी को भी बिना किसी परेशानी के सीधे अपने जवाब जानने का हक़ हो.
११. सरकार जो भी खर्च करती है उसे सार्वजनिक रखा जाये ताकि लोगों को जानकारी रहे कि कहाँ क्या और कितना खर्च हो रहा है. इससे सबसे बड़ा फायदा भ्रष्टाचार की रोक-थाम में होगा.
१२. किसी भी सरकारी या गैर सरकारी काम की भी तय सीमा हो और उसे उस तय सीमा के अन्दर पूरा किया जाये.
१३. पुरे देश में एक समानता हो न कि हर अलग अलग राज्यों के अलग अलग नियम हो. जो नियम उत्तर के किसी राज्य में लागू हो वही नियम भारत के दक्षिण प्रांत में भी हो.
१४. देश में सिर्फ राष्ट्रीय पार्टी होने चाहिए जिससे कि लोगों में आप्शन सीमित हो और वो सही चुनाव कर सके.
बाकी लिखने के लिए तो मेरे पास बहुत कुछ है. क्या करूँ कहते है न खाली बैठे लोगों का दिमाग कुछ ज्यादा ही चलता है वही हाल मेरा भी है. पर क्या करूँ न मुझे संविधान का ज्ञान है न क़ानून का और न ही राजनीति का. मेरी नीति तो सिर्फ एक आम नागरिक की है जो सिर्फ भला सोंचता है. हो सकता है इस भले में कई सारी बुराई छिपी हो पर मेरा दिल तो इतना ही सोंच पाया.
प्रधानमन्त्री महोदय अगर आपको मेरी बात से ठेष पहुंचा हो या बुरी लगी हो तो कृपया मुझ नादाँ को माफ़ करने की कृपा करें.
इस देश का एक नादान सा आम आदमी
अभिषेक प्रसाद.