मैं कौन हूँ? ये एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब २७ सालों के बाद भी मैं नहीं ढूंढ़ पाया हूँ... पर यकीन मानिए रोज कोशिश करता हूँ इस जवाब को ढूंढने का. आखिर मेरा क्या अस्तित्व है... मैं कौन हूँ??? मैं रोज सुबह इसलिए नहीं जागना चाहता कि मुझे उठ कर ऑफिस जाना है, रात को इसलिए नहीं सोना चाहता कि सुबह ऑफिस जाने के लिए उठना है... मैं सोना चाहता हूँ खुद के लिए, जागना चाहता हूँ खुद के लिए... कुछ ऐसा करना चाहता जिससे मुझे ख़ुशी मिले, संतुष्टि मिले, जिस काम को कर मेरा दिल खुश हो... जिससे मुझे गर्व की अनुभूति हो...
मुझसे संपर्क साधना बहुत आसान है... ab8oct@gmail.com पर मेल कर सकते है, http://ab8oct.blogspot.com/, http://humarinayisubah.blogspot.com/ पर मेरे विचारों को पढ़ सकते है....
http://facebook.com/ab8oct या http://twitter.com/ab8oct जैसे सोसल साईट पर मुझसे जुड़ सकते है...

शुक्रवार, 30 मार्च 2012

क्या है मेरा हक???


कल रात ही एक बात पता चली कि किसी भी बात को न जानने का अधिकार है और न ही कोई सवाल खड़ा कर सकता हूँ मैं. लोग मेरी जिंदगी का फैसला करते रहे और मुझसे यही अपेक्षा रही कि मैं हर बार उनकी बात मानता रहूँ... कोई मुझे दुनिया का सबसे बड़ा "स्टुपिड" कहता है, तो किसी के लिए पागल हूँ... किसी के लिए नालायक हूँ तो किसी के लिए सिर्फ एक मन बहलाने का मजाक... लेकिन इस बात से किसी को कोई मतलब नहीं कि दुनिया मेरे लिए क्या है...

अलग नजर से दुनिया को देखने की कोशिश करता हूँ शायद यही गुनाह है मेरा, इस व्यवहारिक दुनिया में सबसे इमानदारी और भानात्मक व्यवहार करता हूँ शायद ये मेरा दोष है, हर रिश्ते को पहले दिन से अपना मानता हूँ शायद ये मेरा कसूर है. दुनिया को सीधी नजर से देखता हूँ. जो नजर में आता है वही समझ में भी आता है, जो सुनता हूँ उतना ही दिमाग जान पाता है, जिसे महसूस करता हूँ वही दिल को भाता है... इससे ज्यादा न समझ में आया और न ही समझना चाहता हूँ. नदी, पहाड़, आकाश, सूर्य, चाँद, प्रकृति को देखता हूँ, हवा को महसूस करता हूँ उसी को मानता हूँ... जिसे लोग भगवान कहते है उसे न मैंने देखा, न सुना, न ही महसूस किया है इसलिए उसे भी नहीं मानता...

लोग जिंदगी में आते गए, सहारा बनाया अपना मुझे और फिर आगे बढ़ गए... इस बात से कोई तकलीफ नहीं बल्कि ख़ुशी है कि किसी के काम तो आया, मंजिल न सही रास्ता तो बन पाया. पर दुःख इस बात का है कि सबके साथ अच्छा सुलूक करने के बाद भी सिर्फ बुराई हाथ आई मेरे किस्मत के. किसी से गिला तक करने का अधिकार नहीं है मुझे, किसी से शिकायत करने का हक नहीं है, किसी से नफरत नहीं कर सकता, किसी से मोहब्बत नहीं कर सकता... प्यार करना हो तो दुसरे तय करते है कि किस्से करना है, दोस्ती करनी है तो दुसरे तय करते है किसे दोस्त बनाना है, किसी से नफरत करना है या नहीं ये भी दुसरे तय करते है... मुझे तो बस चुप-चाप सबकुछ करना है, वो सबकुछ जो सब लोग मुझसे चाहते है... कोई एक झटके में मेरी जिंदगी बिखेर दे मैं उससे नफरत नहीं कर सकता और लोगों के खिलाफ जा कर अगर नफरत कर भी ली तो उससे अपनी बर्बादी की शिकायत नहीं कर सकता... और अगर लोगों की बात मानकर चुप-चाप ऐसे लोगों से दूर होना चाहूँ तो वो भी नहीं हो सकता... लोग बताते है, समझाते है, सिखाते है कि "भूल जाओ जो हुआ... माफ़ कर दो उन्हें... वो हमारे ही रिश्तेदार है... वो हमारे ही अपने है... हमारा ही समाज है... जाने दो फिर ऐसा नहीं करेंगे... वगैरह-वगैरह"... और मैं चुप-चाप बैठ जाता हूँ, सरे खून के घूंट पी लेता हूँ... सोंचता हूँ चलो इस बार भूल जाता हूँ सब कह रहे है तो अगली बार माफ़ नहीं करूँगा... पर अगली बार फिर वही सब कुछ दोहराया जाता है, पहली बार चुप बैठने को मेरी कमजोरी समझ कर फिर मुझपर वार किया जाता है... और लोगों द्वारा फिर वही सीख मेरे कानों में डाली जाती है... मुझे समझ में नहीं आता कि आखिर ऐसा क्यों करता हूँ मैं, या मुझसे ऐसा क्यों करवाया जाता है... कैसे उन लोगों को अपने जिंदगी में शामिल रखा जा सकता है जिन्होंने हर-कदम पर चोट पहुंचाई हो... सिर्फ रिश्तों के नाम पर???

कोई रास्ते में जा रहा हो, और उसे कोई थप्पड़ मार दे तो क्या वो थप्पड़ का जवाब नहीं मांगेगा या फिर चुपचाप इस बात का इन्तेजार करेगा कि उसे अगला थप्पड़ पड़ेगा तब कुछ कहें और हर थप्पड़ के बाद अगले का इन्तजार करता रहेगा...

मैं ऐसा नहीं कर सकता पर करवाया जाता है... हमेशा... मन में कोई संदेह हो तो उसे नहीं जान सकता, कोई कुंठा हो तो बता नहीं सकता... कोई विचार है तो क्यों है, मुझे तो सोंचने का भी अधिकार नहीं है शायद... पर कमबख्त मैं सोंचना बंद ही नहीं करता... सोंचता हूँ, खूब सोंचता हूँ लेकिन अपनी सोंच को अपने अन्दर ही मार देता हूँ... कि कहीं मेरे अनचाहे अपनों को कोई ठेष न लगे... और अगर इस जहर को पीते-पीते मन में कुछ कडवाहट, कुछ चिडचिडापन आ जाये तो उसका भी अधिकार नहीं...

फिर आखिर मेरा हक क्या है???

फोटो हर बार की तरह गूगल से निकाल कर अपने ब्लॉग पे डाल लिया... जल्द ही अपनी बनायीं एक स्केच के साथ उपस्थित होउंगा...

बृहस्पतिवार, 22 मार्च 2012

क्योंकि हम सब इसी लायक है...

बजट आ गया... पेश हो गया... पारित भी... और हम पर लाद भी दिया जायेगा... हर बार की तरह सरकार ने अपना बोझ हम पर लाद दिया... पहले से ही देश की खराब अर्थ-व्यवस्था का बोझ हम अपने सिर पर उठा ही रहे है अब और बोझ लाद कर सरकार ने हमारी कमर तोड़ने का पूरा इंतजाम कर दिया है... सरकार की नियत का पता तो हमें पिछले पैंसठ सालों से है पर मुझे ये समझ में अभी तक नहीं आया कि हम लोगों की नियत को क्या हो गया है. पिछले पैंसठ सालों में क्या हमने दर्द, मजबूरी और बेइंसाफी को अपने अन्दर ढाल लिया है? १९४७ से पहले हमें कुछ बाहरी लुटते थे... आज उनसे कम संख्या में मौजूद हमारे ही अपने लुट रहे है. आजादी से पहले लुटेरों से लड़ने के लिए गांधी जी, सुभाष जी, भगत सिंह जी, चंद्रशेखर जी, लाला जी, नेहरु जी और न जाने कितने अनगिनत लोग थे और उनके पीछे सारा हिन्दुस्तान था... पर आज कोई एक भी नहीं आवाज उठाने के लिए... क्या हो गया है हमें?

पहले एक गाँधी, एक लालाजी देश के लिए चलते थे तो उनके पीछे पूरा एक कारवाँ चलता था... उस कारवाँ में देश-भक्त पैदा होते थे... और आज जब कोई जे.पी. अपने कदम उठाते है तो उनके कारवाँ से निकले लोगों को दुनिया जानती है.... आज जब कोई अन्ना हमारे लिए आवाज उठाते है, भूखे रहते है, अपनी जान की परवाह नहीं करते तो हम इसलिए घर से निकल नहीं पाते क्योंकि बाहर ठण्ड बहुत ज्यादा है... कोई घर बैठ के उनकी सराहना करता है तो कोई उन्हें पागल की उपाधि देता है... आज किसी अन्ना को अपना आन्दोलन इसलिए छोड़ना पड़ता है क्योंकि रातों-रात हमारी सरकार अपने फैसले सदन के एक भाग में तो पारित करवा लेती है पर अगले दिन उसे दूसरी सदन में लटका दिया जाता है.... मतलब न वो लोकपाल आये जो जनता की मांग है और न वो जो सरकार का दिखावा है... पर हम कुछ नहीं बोलते... कुछ सौ लोग उस सदन में बैठ हमें उल्लू बना रहे है हम बन रहे है... और वो भी आइस-क्रीम खाते हुए, टीवी देखते हुए और ठहाका लगाते हुए...

आज के युवा (मैं भी खुद को इसमें शामिल मानता हूँ) फेसबुक के अपडेसन से खुश है, हम ये देख के खुश है कि हमारे पोस्ट पर कितने कमेन्ट आये या फिर कितने लोगों ने इसे लाईक किया. पर खुद किसी के लाईक किये जाने के लायक नहीं है. आज लगभग हर दिन किसी न किसी भ्रष्टाचार की खबर मिलेगी, कहीं किसी को लुट लिया जायेगा, कहीं किसी लड़की की अस्मत को नीलाम कर दिया जायेगा... कभी भी कोई बम हमारे चिथडे उड़ा देगा, कभी भी हम भाइयों के बीच ही कोई मस्जिद-मंदिर के नाम पर दंगा करा देगा... कहीं कोई गैस काण्ड होगा और लोग सदियों तक इन्साफ के इन्तजार में मरते रहेंगे... कहीं कोई खेल होगा और लोग घोटालों का खेल खेलेंगे... कहीं नेता सदन में बैठ पौर्ण-मूवी देखेंगे... और हम ब्लॉग पर लिख कर - फेसबुक पर अपडेट करके ही खुश हो जायेंगे...

बचपन से सुना और पढ़ा है कि ये लोकतंत्र है... लोगों ने तो यहाँ तक कहा कि हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश है... पर इस लोकतंत्र को मैंने कभी महसूस नहीं किया... किस बात का लोकतंत्र है? किस बात की स्वतंत्रता है? कहने के लिए वोट तो डालते है पर नेता चुनने का अधिकार हमें नहीं है... राजनितिक दल लाख हल्ला मचाते है फिर किसी अपराधी को उम्मीदवार घोषित कर देते है... हम मजबूर है कि दस अपराधियों में से किसी एक को अपना लीडर चुन ले... ये है हमारी स्वतंत्रता? रातों-रात किसी घरेलु महिला को किसी राज्य का मुख्य-मंत्री बना दिया जाता है... ये है स्वतंत्रता? जिसे लोगों ने चुना तक नहीं उसे हमारे देश का प्रधान-मंत्री बना दिया जाता है... ये है स्वतंत्रता? और क्या यही हमारी लोकतांत्रिकता? मुझे तो लोकतंत्र कम और नेताओं का तंत्र-मन्त्र ज्यादा नजर आता है... हम कुछ जानना चाहेंगे पर जान नहीं सकते... हम अपने ही नेताओं से, प्रतिनिधियों से जवाब नहीं ले सकते... ज्यादा कोशिश किया तो हड्डियां तोड़ दी जाएँगी... हमेशा के लिए धरती के छः फुट नीचे या चिता के ऊपर लिटा दिया जायेगा.... यही है स्वतंत्रता? मुझे लगता है इससे ज्यादा स्वतंत्र तो हम १५ अगस्त १९४७ से पहले थे...

एक हमारी सत्ता पक्ष की पार्टी है... एक हमारे प्रधान-मंत्री है... देश में कुछ भी हो जाये वो कुछ न बोलते है और न करते ही है... हालिया घटना संक्षेप में बताऊंगा... हमारे अभी-अभी सत्ता से हटाये गए रेल-मंत्री साहब ने रेल बजट पेश किया... किराया बढा दिया... उन्ही कि पार्टी अध्यक्षा ने उनकी आलोचना की पर हमारे प्रधान मंत्री जी चुप रहे... शनिवार को रेल-मंत्री जी ने इस्तीफा दे दिया... रेल-मंत्री जी का कोई जवाब नहीं... एक छोटा सा सवाल कि आखिर दिनेश त्रिवेदी जी को रेल-मंत्री पड़ से क्यों इस्तीफा देना पड़ा? अगर रेल-बजट के कारण तो प्रधान मंत्री जी ने वो रेल-बजट वापस क्यों नहीं लिया??? रेल-मंत्री को खारिज किया तो उनके बनाए बजट को क्यों नहीं??? इसका सीधा सा मतलब है देश को बेवकूफ बनाया जा रहा है... और बेवकूफ बना भी कौन रहा है जो इस पुरे देश का लीडर है, अगुआ है... हमारा ऐसे लीडर जिसे हमने नहीं चुना था, एक ऐसे लीडर जो किसी भी सदन का सदस्य तक नहीं थे... एक ऐसे लीडर जिनके बारे में देश जनता है कि वो पंजाब प्रांत के निवासी है पर उन्हें पंद्रह सौ किलोमीटर से भी ज्यादा दूर असम प्रांत से राज्य-सभा का सदस्य बना दिया जाता है... एक ऐसा प्रांत जहाँ उन्होंने शायद ही अपने जीवन का कोई समय गुजारा हो...

एक हमारी विपक्ष है जिन्हें खुद लड़ने से फुर्सत नहीं मिलती... एक ऐसा विपक्ष जिसके सदस्यों को घर में समय नहीं मिल पाता तो सदन में बैठ कर पूर्ण-क्लिप देख लेटे है... एक ऐसा विपक्ष जो अपनी ही बातों पर कायम नहीं रह पाता... जो जनता के सामने अपनी बात सही रूप से नहीं रख पाता... हालिया घटना का उदाहरण देता हूँ जब लोकपाल पर घमासान छिड़ा हुआ था तो ये पार्टी अपनी बात तक खुल के नहीं बोल रही थी ताकि उसके ऑप्सन भी बचे रहे... इसे कहते है बेवकूफ बनाना... ये हमारे देश का एक ऐसा विपक्ष है जिसके पास दिखाने को एक चेहरा भी नहीं है... अभी-अभी उत्तर-प्रदेश में चुनाव हुए... पूरी चुनाव ख़त्म पर इन्हें खुद नहीं पाता था कि अगर गलती से ये जीत भी गए तो कौन इनका लीडर होगा... एक ऐसा विपक्ष है ये जिसकी बिहार में सहयोगी पार्टी (या शायद ये बिहार में सहयोगी पार्टी है) उत्तर-प्रदेश में इनके साथ खड़ी नहीं होती है... एक ऐसा विपक्ष जिसके उत्तराखंड के मुख्य-मंत्री चुनाव हार जाते है... ये ऐसा विपक्ष है जिसके नेता कर्नाटक में अपनी गद्दी के लिए लड़ते है... एक ऐसा विपक्ष जो भगवान का घर (भले वो किसी और धर्म का हो) तोड़ कर खुश होते है और गर्व करते है जैसे उन्होंने कोई बहुत बड़ा काम कर लिया था... मैं जानता हूँ ये भीड़ का काम था और भीड़ को सजा नहीं होती पर हमारे क़ानून को भीड़ के चेहरे को सजा देनी चाहिए थी... सबको पता है वो कार-सेवक किस पार्टी से सम्बन्ध रखते थे और उस पार्टी के मुखिया कि नैतिक जिम्मेदारी बनती थी उस पुरे प्रकरण की जिम्मेदारी लेनी की.... ये हमारे ऐसे विपक्ष है जो सालों तक एक अपराधी नेता का जमकर विरोध करते है, तब तक जब-तक वो दूसरी पार्टी में है... और जैसे उसने पार्टी छोड़ी उसे गले लगाकर स्वागत करते है ये कहते हुए कि उसकी छवि साफ़ है... कहाँ है नैतिकता?

जैसा कि मैंने अपने पिछले पोस्टों में भी कहा है, दो साल लगभग होने वाले है कॉमनवेल्थ खेल को और उसमें हुए घोटाले को... कौन जिम्मेदार है इन सबका? सरकार अपने ही पार्टी के मंत्री से पैसे वापस लेने के लिए कोई कदम क्यों नहीं उठाती? २जी घोटाले को उजागर हुए भी अब तो बहुत समय हो गया... हमारी ही अदालत ने इसके बनते लायसेंस को खारिज कर दिया... सरकार पैसे निकलवाने के लिए कोई कदम क्यों नहीं उठाती? देश की अर्थ-व्यवस्था खराब है, जनता पर बोझ डालना जरूरी है... फिर सरकार नेताओं पर भी बराबर बोझ क्यों नहीं डालती? नेताओं के खर्चों में, उनको मिलने वाली सुविधाओं में कटौती क्यों नहीं होती? देश की अर्थ-व्यवस्था का इतना ही बुरा हाल है तो चुनाव प्रचार के नाम पर करोडो का खर्च क्यों हो जाता है और जनता को बताया भी नहीं जाता कि वो पैसे आये कहाँ से... ये सारे वही काले धन है जो जनता से चुराए गए है... बड़ी आसानी से लोगों ने हमारे धन को काला कर लिया... देश की अर्थ-व्यवस्था भी चरमरा रही है... फिर उस काले धन को लाने के लिए सरकार कोई कदम क्यों नहीं उठाती?

और हम.. चुप-चाप अपनी बर्बादी का तमाशा देख रहे है... हमें तो मजा आता है अपने ही देश में विदेशी संस्कृति और भाषा का इस्तेमाल करने में... अपनी संस्कृत और अपने लोगों का मजाक उड़ाने में... हमें मजा आता है फैशन के नाम पर नंगा नाच नाचने में... हमें मजा आता है मनोरंजन के नाम पर अश्लीलता परोसने और देखने में... हमें मजा आता है चुपचाप लोगो पर अत्याचार होते देखने में और जब खुद पर अत्याचार हो तो दोष देने में... हमें मजा आता है शराब के नशे में सिगरेट के धुंए उड़ाने में... हमें मजा आता है सचिन के शतक में भले टीम हार जाये... हमें एक आई पी एल में करोड़ों खर्च करने में मजा आता है बजाय उस राशि का दस प्रतिशत भी देश विकास पर खर्च करने के... हमें तब मजा आता है जब कोई फिल्म-स्टार किसी क्रिकेट टीम को करोड़ों में खरीदता है पर बच्चों के लिए स्कूल और बीमारों के लिए अस्पताल नहीं खोल सकता.. हमें तब मजा आता है जब एक शो पर हमें अनजान से पोर्न-स्टार को दिखाया जाता है... हमें मजा आता है अपनी ही बर्बादी पर... और मुझे मजा आता है अपने देश की को बर्बाद होते हुए देखने में... क्योंकि हम सब इसी लायक है...

मंगलवार, 20 मार्च 2012

इक सपना जिसे देखा नहीं मैंने अब तक...



इक सपना हकीक़त बनने वाला है
मेरी अधूरी जिंदगी का...
इक सपना जिसे देखा नहीं मैंने अब तक...
इक सपना जिसे जाना नहीं मैंने अब तक...
वो सपना मेरी जिंदगी में आने वाला है...
वो सपना मेरी जिंदगी ही होने वाला है...
इस सपने को मैंने नहीं देखा...
बस मुझे कह दिया गया कि ये तुम्हारा सपना है...
सपने बुने किसी और ने...
सपने चुने किसी और ने...
और अचानक उसे मेरे नाम के साथ जोड़ दिया गया...
मैं ये नहीं कह सकता कि सपना बुरा है...
मैं ये भी नहीं कह सकता कि सपना अच्छा है...
वो तो ऐसा सपना है जिसे मैंने देखा ही नहीं अब तक...
शायद वो सपना हसीन होगा...
शायद वो सपना मेरे दिल के करीब होगा...
शायद वो मुझसे ज्यादा मेरे लिए अहमियत रखेगा...
पर अभी तो मैं कुछ नहीं कह सकता उस सपने के बारे में...
क्योंकि उस सपने को देखा नहीं है मैंने अब तक...
मेरी अधूरी जिंदगी का एक अनचाहा सपना है...
मेरी अँधेरी जिंदगी का इक सुहाना सपना है...
मैं तो सपने देखने की हालात में भी नहीं था...
मैं तो आधा सोया आधा जगा हुआ था...
सपने देखने की इच्छा अभी-अभी तो मरी थी मेरी...
अभी-अभी तो सपनो से दूर किया था खुद को...
बल्कि कोशिश ही कर रहा था दूर होने कि अपने सपनों से...
और अचानक नियति ने मेरी आँखों के लिए एक सपना बुन दिया...
इक ऐसा सपना चुन दिया मेरी आत्मा के लिए...
जिसे देखा नहीं मैंने अब तक...
इक सपना जिसे जाना नहीं मैंने अब तक...


फोटो हर बार की तरह गूगल देवता की कृपा से. इसी तरह कृपा बनाये रखे गूगल देव हम तुच्छ इंसानों पर.

सोमवार, 19 मार्च 2012

समय अब भी हमारे हाथ में है....

आदरणीय वित्त-मंत्री जी,

सबसे पहले तो सादर अभिनन्दन स्वीकार करें.

इतने बड़े लोकतान्त्रिक देश का वित्तीय विभाग संभालना अपने-आप में हिमालय अकेले तोड़ने के बराबर है और वो भी सामान हिस्सों में.... और इस कार्य के लिए मैं तहे दिल से आपको बधाई देना चाहता हूँ. इतने बड़े कार्य में मनुष्य से गलती होना स्वाभाविक है... हर टुकड़े को बिलकुल एक सामान रूप में काट पाना तो बड़े-से-बड़े कलाकार के लिए भी असंभव सा है... खैर ये सब तो और बातें है... पर महोदय इस बार के बजट को देखते हुए क्या आपको लगता है कि अब भी आम आदमी को चुप बैठना चाहिए (वो अलग बात है कि हम आम आदमी चुप ही बैठे है, बोल कर ही क्या कर लेंगे)... लेकिन फिर भी आप खुद ही बताइए क्या ये अब भी चुप बैठने का समय है??? नहीं न... देखा मुझे पता था आपका भी यही जवाब होगा... इस देश का कोई भी जिम्मेदार व्यक्ति यही जवाब देगा....

आपने हम गरीबो पर एक बड़ा उपकार किया है इनकम टैक्स में दो लाख तक की छुट देकर... पर क्या ये छुट हम गरीबों से ज्यादा अमीरों के लिए फायदे मंद नहीं है??? अगर पिछले टैक्स स्लैब से इस स्लैब की तुलना कर के देखी जाये तो उन लोगों को ज्यादा फायदा नजर होते दिखता है जो लोग आठ-नौ लाख से ऊपर हर साल वेतन पाते है. इतने बड़े देश के वित्त-मंत्री होने के नाते ये बात आपको भी नजर आई होगी... या हो सकता है कार्य-बोझ के कारण चुक गए हों... कोई बात नहीं होता है... जो भी थोडा बहुत फायदा हम गरीबो को है उससे ही मैं खुश हूँ... लेकिन जैसे ही मैं इस ख़ुशी के साथ आगे बढ़ता हूँ मेरी ख़ुशी ऐसे हवा हो गयी जैसे उसका सबसे बड़ा दुश्मन मैं हूँ... आखिर मेरी गलती क्या है अगर आपने सर्विस टैक्स में २ प्रतिशत का इजाफा कर दिया... मतलब अब हर सौ रुपये के लिए दो रुपये और ज्यादा देने होंगे... जबकि हम इनकम टैक्स तो देते ही है... मुझे एक बात आज तक समझ में नहीं आई, व्यापारी गण कहते है सर्विस टैक्स बढ़ने से उन्हें तकलीफ हो रही है... भैया तकलीफ तो हमें हो रही है... सर्विस टैक्स व्यापारी बंधू अपने घर से तो देते नहीं है... हर सर्विस के लिए टैक्स हमें ही भरना पड़ता है वो भी अपने इनकम की टैक्स अदा करने के बाद.... मतलब हम सरकार को कमाने के लिए भी टैक्स देते है और खर्च करने के लिए भी... कहीं चैन नहीं हमें.... 

पेट्रोल-गैस के दाम फिर बढ़ने वाले है... आपने तो यहाँ तक घोषणा कर दिया कि गैस पर सब्सिडी हटाई जा सकती है... मैं कहता हूँ बेशक हटा लीजिये... सरकार जितने भी सब्सिडी देती है सब हटा लीजिये... आखिर हम जनता पर इतना अहसान क्यों... आप सब्सिडी देना बंद करें और हम टैक्स देना बंद करते है... बात बराबर रहेगी... न आपको शिकवा न हमें गिला... ऐसा ही क्यों न करें कि इस देश से सरकार नाम का स्तम्भ ही उखाड़ फेंका जाये.... जब सब कुछ हमें ही झेलना है तो किसी सरकार की जरूरत क्या है... अपने अपने हिसाब से जी लेंगे सब...

आपका कहना है कि हालात देखते हुए ऐसा बजट जरूरी है... मैं कहता हूँ कि ऐसे हालात है ही क्यों??? इस देश का बच्चा-बच्चा जानता होगा कि भ्रष्टाचार हो रहा है.... हमारी अरबों-खरबों से भी कई गुना ज्यादा संपत्ति किसी स्वीस के किसी बैंक में पड़े-पड़े काले हो रहे है... फिर ये बातें आपको कैसे नहीं पता??? दुनिया ने देख लिया कैसे कुछ लोगों ने मिलकर २जी में अरबों का घपला कर लिया... क़ानून ने भी इस २जी को खारिज कर दिया.... तो आखिर इसका पैसा फिर गया कहाँ??? हमारे देश में आम-धन (commonwealth) के खेल हुए.... लोगों ने ख़ास रूप से धन बना लिए.... सबको पता चल गया... लेकिन आखिर वो पैसा कहाँ गया???... दो साल होने को आ रहे है पर पैसे का पता नहीं... ये दो उदाहरण तो मैंने इस लिए दिए कि हालिया घटना है आपको याद होंगे.... पीछे से गिनती शुरू करूँ तो बचपन में पापा ने जितनी भी गिनती मुझे सिखाई थी मैं यही-अभी भूल जाऊंगा.... आखिर क्या हुआ उन अरबों-खरबों का (इससे आगे क्या होता है मुझे पता नहीं... इसलिए इसी शब्द से काम चला रहा हूँ)... ???

जो भी सरकार आई उसने कहा हालात ऐसे है-वैसे है... किसी ने ये क्यों नहीं कहा कि हम उन काले धन को वापस लायेंगे और सफ़ेद कर के इस हालात को मिटायेंगे.... इस देश के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के सबसे मजबूत स्तम्भ की हर एक ईंट खोखली है... कोई ऐसा नजर नहीं आता जिसपर हम भरोषा कर सकें.... हाल ही में दक्षिण के सुपर-स्टार की एक फिल्म देखी थी... नाम था शिवाजी... उस फिल्म में काले धन को वापस लाकर भलाई के कार्यों में उस पैसे के इस्तेमाल को दिखाया गया था... हमारे बौलीवूड ने भी हाल ही में संजय दत्त साहब और इरफ़ान खान सहन को लेकर इसी काले धन पर एक फिल्म दिखाई थी... मैं जनता हूँ तीन घंटे की फिल्म की तेजी से हकीकत में ये नहीं हो सकता पर क्या इससे सीख लेटे हुए तीन महीनों में भी असंभव है??? कुछ दिनों पहले एक मेल बहुत ही प्रचलित था जिसमें बताया गया था कि अगर सारा काला-धन वापस आ जाये तो सदियों तक किसी भी नागरिक को कोई टैक्स देने की जरूरत नहीं पड़ेगी... और भी न जाने क्या-क्या... मैं सदियों की बात नहीं करता पर अगर उससे एक साल भी अगर ऐसा हुआ तो क्या हमारी अर्थ-व्यवस्था में सुधार नहीं आएगा??? मैं कोई अर्थ-शास्त्री नहीं... वित्तीय ज्ञान लगभग जीरो है पर इतना तो कोई बच्चा भी समझ सकता है... फिर आप लोगों को क्या परेशानी है अपने ही देश का पैसा बाहर से अपने घर में लाने में... मैं आपसे पूछता हूँ अगर आपको पता चले कि आपके घर के किसी भी सदस्य ने घर से रुपये चुरा का किसी जगह छिपा रखे है तो क्या आप उसे वापस लाने का प्रयास नहीं करेंगे? या फिर घरवालों के जीवको-पार्जन में ये कह-कर कमी कर देंगे कि पैसे तो कहीं और पड़े है और मेरे पास सबूत नहीं है???...

जो छोटी सी बात कोई छोटा सा बच्चा भी समझ सकता है उसे आप जैसे लोग क्यों नहीं समझ पा रहे है??? कुछ सौ-हजार लोग मिल कर सवा अरब लोगों का हक़ मार रहे है, क्या ये सही है?

रेल-मंत्री साहब ने किराया बढा दिया है... जरूरी भी है... नौ साल में मंहगाई बहुत बढ़ गयी है तो रेल किराए में बढ़ोतरी भी जरूरी है... पर क्या कभी रेल के डब्बों में झाँक कर देखा है कि वहां की हालात कैसी है? आपही गण-मान्य लोगों में से किसी ने एक बार कहा था कि रेल में सफ़र करने वाले कैटल-क्लास के है.... मैं कहता हूँ हालात उससे भी बदतर है... किराए बढ़ाइए पर साथ-साथ कम-से-कम इंसानों जैसी सुविधा भी तो मुहैया करवाइए... शर्म आती है अब तो दोस्तों को बताने में कि घर भारतीय रेल के स्लीपर-क्लास से जा रहा हूँ... 

आपसे विनम्र निवेदन है कि देश की रीढ़ की हड्डी इस कदर न तोडिये कि इस देश का कोई भी नागरिक खड़ा तक न हो सके... समय अब भी हमारे हाथ में है.... देर नहीं हुई है... कहीं ऐसा न हो कि पछताने का मौका तक न मिले....

कोई बात बुरी हो तो दिल से माफ़ी है...

इस देश का एक आम नागरिक....
अभिषेक प्रसाद

शनिवार, 17 मार्च 2012

एमटीवी रोडीज... रेड कारपेट प्रीव्यू...


इस पोस्ट को पढने के बाद आप लोगों को लगेगा कि 'आज अभिषेक को क्या हो गया है?'... हमेशा टीवी शोज के खिलाफ रहने वाला आज इस बारे में बात कर रहा है.... पर दोस्तों वो क्या है न मेरे अन्दर थोड़ी ईमानदारी बची हुई है अभी... अब जब खुद टीवी चैनल वालों ने फोन करके, मेल करके मुझे बुलाया तो उनके प्रति मेरा भी कुछ फर्ज बनता है... मैं बात करने वाला हूँ MTV ROADIES की. गुरूवार की शाम दिल्ली में इस शो का रेड कारपेट प्रीव्यू था. अब गलती से चैनल वालों ने मुझे भी आमंत्रित कर लिया था. आदतन निर्धारित समय से लगभग बीस मिनट लेट पहुंचा मैं. पर वहां पहुँच कर एक अच्छा अनुभव रहा. स्वागत के इन्तेजामात अच्छे थे. पुरे प्रीव्यू के दौरान आप बोर न हो इसके लिए कोल्ड-ड्रिंक और पॉप-कॉर्न के इंतजाम भी किये गए थे. लगभग पूरा हॉल भरा हुआ था (साथ से सत्तर प्रतिशत लोग होंगे वह जितने लोगों के लिए जगह थी उसमें से)... खैर ये तो हो गयी इधर उधर की बातें... अब इस शो के बारे में कुछ बात बता दूँ आप सबको...


ये एक गेम शो है जिसका प्रसारण एम्टीवी चैनल पर होता है और इस बार ये नौवां सीजन है इस गेम शो का... इसे होस्ट करते है रघु, राजीव और रणविजय... तीनो का अपना एक अलग अंदाज है... एक काफी शांत नजर आते है तो दूसरा हर वक़्त लड़ने-झगड़ने को तैयार नजर आते है तो... खैर यही तो शायद इस शो की सबसे बड़ी टी आर पी का राज है... कुल तेरह पार्टिसिपेंट्स के साथ इस गेम की शो की शुरुआत आज शाम ७ बजे से होगी और हर हफ्ते एक पार्टिसिपेंट्स बाहर होता जायेगा... अंत में बचने वाला विजेता होगा और विजय राशि और मान-सम्मान के साथ अपनी जिंदगी के आगे के सफ़र पर बढ़ जायेगा... आज शाम प्रसारित होने वाला पहला एपिसोड गुरूवार की शाम हमें सबसे पहले देखने को मिला.... और तेरहों पार्टिसिपेंट्स से मिलने का मौका भी मिला... हर पार्टिसिपेंट्स के छोटे से बनावटी परिचय के साथ शो की शुरुआत हुई... बनावटी इसलिए कह रहा हूँ कि किसी के भी चेहरे पर असलियत के भाव नजर नहीं आये... हाँ कुछ असली लगा तो "विनय"... खैर अभी तो इस गेम शो की शुरुआत ही हुई है और इसकी मंजिल बहुत दूर है... हर खिलाडी अपने दम-ख़म के हिसाब से खेल अपना शत-प्रतिशत ही देता है या कोशिश करता है... पर जिसका शत ज्यादा होगा दुसरे के शत से वही जीतेगा... इस शो की हेड-लाइन मुझे सबसे ज्यादा पसंद आई... "EVERYTHING OR NOTHING" ... सबकुछ या कुछ नहीं... और यही इस गेम शो का थीम भी है... जीतने पर आपको सबकुछ मिलता है और हारने पर या थोडा सा भी पीछे रहने पर आपको कुछ नहीं मिलेगा... मेरे हिसाब से इस गेम शो के इस बार चार मुख्य दावेदार होंगे... सबसे पहला नाम मैं विनय का लेना चाहुगा, फिर अभिषेक, मनाली और दियाली... लम्बी रेस के घोड़ों में अर्श, विकाश, खुशबु, प्रतिमा और कनक राजू नजर आते है...(अगर किसी के नाम के उच्चारण में गलती कर गया हूँ तो माफ़ करें)... हाँ इस बार किसी लड़की के जीतने की संभावना किसी लड़के की अपेक्षा ज्यादा होंगे... बाकी की बातें तो शो के साथ ही पता चलेंगी... अभी से कुछ नहीं कह सकता...
अंत में इस शो के थीम सोंग "मनमानी-मनमानी" का अनावरण भी हुआ जिसे अब्बास टायरवाला ने लिखे है, अग्नि बैंड ने तैयार किया है... आवाज का जादू के. मोहन के साथ-साथ इस शो के सबसे डेंजर माने जाने वाले होस्ट रघु ने भी बिखेरा है... गाने बोल अच्छे है पर गाने में एक जोश की कमी दिखती है... इस शो के हिसाब से गाने को और जोशीला होना चाहिए था जो सुनने वाले के रोंगटे खड़े करने के लिए काफी हो... पर भी मैं एक उत्तम गाने के लिए पूरी टीम को बधाई देना चाहूँगा...

इस शो की कामयाबी और हर पार्टिसिपेंट्स के लिए शुभ कामनाएं.... आप लोगों के लिए इस प्रीव्यू के कुछ फोटो और थीम सोंग को भी पोस्ट कर रहा हूँ....








फोटो साभार: एमटीवी रोडीज के फेसबुक पेज से...

बुधवार, 7 मार्च 2012

आप लोग जाओ और मनाओ उमंग से होली...


कल होली और भाई अपन होली में थोड़े ज्यादा ही बीजी होते है तो सोंचा आप सबको अपना सलाम आज ही कह दूँ... वो क्या है कि अपन होली वाले दिन मतलब पुरे दिन मस्ती में घर में बैठते है.... मटन-चिकन खाते है.... टीवी-सीवी देखते है और... घंटों फ़ोन पर लोगों को होली का बुरा न मानने की सलाह देते है... भाई और जब इन सबसे थोडा वक़्त बच जाये तो ज़रा देर के लिए शरीर और दिमाग का आराम का ख्याल करते हुए सो लेते है.... भैये क्या करें हम तो अपने हर पल का भरपूर मजा लेते है.... खाना, सोना और टीवी देखना... और भी कुछ है क्या जरूरी इस जिंदगी में... खामख्वाह में हम दूसरों को तंग नहीं करते... अब देखो भैया कल है होली... और जो हमने होली में रंग डाल किसी को तो बेकार में नाक-भौंह सिकोड़ लेगा... सामने तो लिहाज से देगा नहीं पर मन में कई गालियाँ देगा... अब भैया ये तो मनुष्य की प्रकृति है... स्वर्ग सब जाना चाहते है पर मरना कोई नहीं चाहता... वैसे ही होली सब खेलना चाहते है पर रंग लगा दो तो मान लेंगे बुरा... खैर मानने दो बुरा उन्हें... मुझे क्या पड़ी है... अपन तो ज्यादा वैल्यू देते नहीं किसी को... भाई खुद से समय नहीं दूसरों को कहाँ से दे... और वैसे भी क्यों दे... सबको चौबीस घंटे मिलते है, न एक सेकण्ड कम न ज्यादा फिर हम अपना समय क्यों दे... हम नहीं देंगे... जिनको देना है दें... थोडा हमें भी दें... अरे इन सबके बीच तो भूल ही गया कि कल होली है... लेकिन आखिर मुझे क्या है तो है... मेरा क्या... उफ्फ्फ इस भांग ने तो गजब का असर डाल दिया है... पता नहीं क्या बकवास कर रहा हूँ... क्या कहा आपने मैं बकवास कर रहा हूँ?... कर रहा हूँ तो कर रहा हूँ आपका क्या... पर खैर हम बुरा नहीं मानते... क्योंकि कहते है न कि बुरा न मानो होली है.... आप सभी बुरा न माने... और मेरे दिल से निकली होली की मुबारकबाद को कबूल करें.... अरे ये क्या मैंने दिल से अभी - अभी कुछ निकाला है क्या... उफ्फ्फ्फ़ न जाने क्या होगा मेरा.... आप लोग जाओ और मनाओ उमंग से होली... हैप्पी होली... मुबारक होली.... और हाँ हर बार की तरह इस बार भी चित्र चुराया गूगल देवता के दरबार से.... गूगल देव बुरा न माने होली है...

मंगलवार, 6 मार्च 2012

हकीक़त का है आलिंगन....


आज अपने कलम पर जोर दे रहा हूँ... कई दिनों से शब्दों ने अन्दर एक बेचैनी सी पैदा कर राखी थी, सोंचा आज अपनी छटपटाहट को ख़त्म कर लूँ... होली नजदीक है और मेरे पास आप लोगों के लिए यही कुछ रंग बचे पड़े है.... उम्मीद है मेरे ये शब्दों के बेमेल जोड़ आपको अच्छे लगेंगे... (चित्रों के लिए गूगल बाबा का सहारा)

उसकी अहसासों की छुअन
खामोश होती मेरी धड़कन
ये चंचल सा मेरा मन
उड़ने को चाहे खुले गगन
नदियों की स्थिरता
और ठहरा हुआ पवन
नयी उम्मीदों की तरंग
अँधेरे को करती वो रौशन
अनचाही डर की अगन
बढ़ाती मेरी तडपन
मेरे जीवन में उसका आगमन
कही भीतर एक सुखन
अब तक था एक अकेलापन
बदलता मेरा अब जीवन
न जाने कैसा होगा आने वाला क्षण
सपनो की दुनिया टूट चुकी कब की मेरी
अब तो बस हकीक़त का है आलिंगन....

सोमवार, 5 मार्च 2012

इमानदारी या मासूमियत...

चित्र यहाँ से चुराया है मैंने.....

सोंचा था सुबह सबसे पहले ऑफिस पहुँच कर एक पोस्ट डालूँगा अपने ब्लॉग पर फिर काम की शुरुआत होगी... पर जैसा कि आप सब भी जानते है, आज है सोमवार... और आज का दिन तो सोंचने की फुर्सत भी नहीं देता... पर खैर अभी समय निकाल ही लिया मैंने... ऑफिस के लोग अपने पेट भरने में लगे है और मैं अपने मन को भरने में... बात बड़ी छोटी सी है लेकिन मेरे लिए नहीं... एक ऐसी शख्शियत से आज आपका परिचय करवाना चाहता हूँ... ये शख्शियत ऐसी है जिनसे आपकी रोज मुलाक़ात होती होगी पर आपने कभी इन्हें अहमियत न दी होगी... वैसे यही हाल मेरा भी था पर शनिवार के शाम की छोटी सी घटना में उस बच्चे ने मेरे दिल को छू लिया...

हुआ यूँ कि शनिवार को ऑफिस का काम निपटा कर लगभग साढ़े छः बजे ऑफिस से निकला... हम कुल चार लोग एक साथ एक ही कार में सवार थे... एक चौराहे पर लाल-बत्ती पर हमारी गाडी रुकी और रोज की ही तरह एक हाथ हमारे सामने मांगने के लिए प्रकट हो गया... हर बार की तरह हमने हट-हट की आवाज लगायी और मुंह सिकोड़ते हुए उसे जाने का इशारा किया... किसी भी भिखारी को देखते ही अनायास ही मेरे मुंह से कुछ-न-कुछ अभद्र शब्द निकल ही जाते है... वही हुआ... उसकी उम्र बमुश्किल चार-पांच साल की होगी... हम जितना उसे भगाने के लिए हट-हट कर रहे थे उतना ही उसका भी हठ बढ़ता जा रहा था.... लाल-बत्ती भी हरी होने का नाम ले नहीं रही थी... खीझ कर आखिर मैंने जेब में हाथ डाला एक दो रुपये का सिक्का निकाल कर उसके हाथ में थमा दिया और कार का शीशा बंद करने लगा... पर तभी उसने इशारे से रोका और सिक्का लौटाने लगा... मैंने उससे पूछा, "ये क्या है? लौटा क्यों रहे हो?" उसने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया, "साहब! आपने दो रुपये का सिक्का दिया था एक रुपये वापस कर रहा हूँ"...

उसकी ये इमानदारी या फिर मासूमियत सच में मेरे दिल को छू गयी.... पर एक बात और है कि आज तो वो बच्चा है पर जैसे-जैसे वो बड़ा होता जायेगा उसकी ये इमानदारी और मासूमियत खोटी चली जाएगी और वो भी हमसब की तरह "आदमी" हो जायेगा...

इस पोस्ट को लिखते-लिखते अचानक बीच में छोड़ कर भागना पड़ा अपनी सीट को छोड़ कर... दिल्ली में तगड़े भूकंम्प के झटको ने सारी भावनाएं हिला दी... उस वक़्त तो मैंने बस यही सोंचा कि अभी तो भाग लो भैया, बचे रहेंगे तो और न जाने कितने ऐसे पोस्ट लिख डालेंगे और वरना अपनी ख़ामोशी की तरह हम भी खामोश हो जायेंगे फिर लोग यही कहेंगे... एक था जो चिल्ला-चिल्लाकर अपनी ख़ामोशी सुनाता था....

शनिवार, 3 मार्च 2012

स्व-केन्द्रित भाव से उपजी रचना...

आज तो बहुत ही बुरा अनुभव कर रहा हूँ मैं.... किसी ने आईना दिखा दिया है मुझे आज... खुद का चेहरा देखकर डर से मरा जा रहा हूँ... घबराहट है ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही... बात ये है कि मेरे एक शुभचिंतक ने मुझसे कहा कि मेरी सारी रचनाएँ स्व-केन्द्रित भाव से निकलती है.... बस तभी से अपनी लेखनी को देखकर घृणा के भाव उभर रहे है... स्व-केंद्र का क़त्ल करने का मन हो रहा है... पर डरता हूँ क़त्ल करने के बाद फांसी हो गयी तो.... फांसी हो भी जाये तो ठीक है पर कहीं राष्ट्रपति महोदया ने अफजल गुरु और कसाब की तरह मेरी फांसी को लटका दिया तो.... जेल के अँधेरे में जेट सुरक्षा के साथ, अच्छा भोजन करते हुए, मनोरंजन का मजा लेते हुए कौन कमबख्त हर पल मौत का इन्तेजार करना चाहेगा... भाई अपने से तो नहीं होगा ये सब.... इसलिए स्व-केंद्र का क़त्ल करने का इरादा कैंसल...

लेकिन समझ में नहीं आ रहा है कि मेरे उस शुभ-चिन्तक महोदय ने इतना बड़ा आरोप मुझपर क्यों लगाया.... क्या ऐसा मैं सच में करता हूँ???... इस बात को तो मैं भी मानता हूँ कि मैं जो टूटी-फूटी, बेअर्थ, बदसूरत-सी और शब्दों को उलटे-सीधे रूप से मिलाकर जो तथाकथित कवितायें लिखता हूँ वो स्व-केन्द्रित होती है... पर कभी-कभी अपने छोटे से दिमाग को ज्यादा चलाते हुए कोई आलेख लिखता हूँ वो तो मुझे स्व-केन्द्रित नहीं लगती.... पर खैर हर व्यक्ति स्वतंत्र है टिप्पणी करने के लिए... मैं कौन होता हूँ किसी को रोकने वाला.... 

खैर छोडो इन बातों को.... अरे हाँ एक बात और याद आया... कई दुसरे ब्लॉगर बंधुओं से जब भी व्यस्त समय से थोड़े से समय को चुरा कर (ऐसा मैं सिर्फ कहता हूँ.... बाकी समय ही समय है जीवन है) बात होती है तो सबकी एक शिकायत आती है कि "अभिषेक आप तो आज कल हमारे ब्लॉग पर नजर आते ही नहीं हो".... (जैसे लोगों ने अपने ब्लॉग पर कैमरा लगा रखा है या ऐसा कोई उपाय जिससे पता चल जाता हो कि अभिषेक आया था ब्लॉग पर या नहीं).... फिर दिमाग में आया कि ये जानने का तो सीधा सा तरीका है कि भाई अभिषेक की टिप्पणी नहीं है मतलब आया नहीं ब्लॉग पर.... मैंने भी सबसे कहा कि इसलिए लगता है आप लोग भी बदला चूका रहे हो, मेरे ब्लॉग पर भी बिना दर्शन दिए चले जा रहे हो.... (फेंक दिया मैंने भी नहले पर दहला... सब चुप).... सबके पास मेरे ही तरह एक ही बहाना है कि "अभिषेक समय नहीं मिल रहा आज-कल"... कोई घर पर व्यस्त है तो कोई ऑफिस में... पर बात सीधी सी है कि जमाना लेन-देन का है....

खैर इस बात को शायद मैं पहले भी बता चूका हूँ... मेरी टिप्पणियाँ नहीं होती किसी के ब्लॉग पर इसका मतलब ये नहीं कि मैंने ब्लॉग पढना छोड़ दिया है... जो व्यक्ति पढना छोड़ दे वो कभी लिख भी नहीं सकता है.... मैं रोज नियम से और गिनती से कम से कम दस पोस्ट जरूर पढता हूँ... हाँ टिप्पणी नहीं करता ये अलग बात है... उसके भी दो सीधे से कारण है.... पहला कि मैं अपने आप को टिपण्णी करने के लायक नहीं समझता... मैं लिखता हूँ पर खुद को अभी तक मैं ही स्वीकार नहीं कर पाया हूँ.... दूसरा कि किसी के भी पोस्ट पर क्या टिपण्णी करूँ ये भी समझ में नहीं आता है... हर रचना के लिए रटे-रटाये "बहुत खूब, अच्छा, इत्यादि-इत्यादि" लिखता रहूँ मुझसे बर्दास्त नहीं होता है....

तो अब तो आप लोग मेरी मजबूरी समझ गए होंगे और मेरी टिपण्णी नहीं आने पर भी मेरे पोस्टों पर टिप्पणियों की बौछार करते रहेंगे... चलो दोस्तों अब चलता हूँ.... मजाक-मजाक में एक और स्व-केन्द्रित पोस्ट लिख डाली.... 

शुक्रवार, 2 मार्च 2012

महिला-पुरुष बराबरी युग में इतना भेद-भाव क्यों???

कल रात फिर एक बार गलती कर गया. वैसे इस गलती में मेरा कोई कसूर नहीं है. वो क्या हुआ कि ऑफिस से वापसी में मैं चला गया अपने एक मित्र के घर और मेरे मित्र ने लगा रखी थी एक न्यूज़ चैनल. अब आप समझ गए होंगे कि क्या गलती हो गयी. उफ़ कल रात फिर न्यूज़ देख ली मैंने. हे भगवन! बचा ले मुझे इस पाप से.

हाँ तो बात ये है.... सॉरी सॉरी सॉरी न्यूज़ ये है कि कल किसी प्रदेश के किसी अदालत ने किसी व्यक्ति को दहेज़ प्रतारना आरोप से मुक्त कर दिया. भाई अच्छी बात है (कम-से-कम अदालत के चक्कर से मुक्ति तो मिली).... जिस लड़की ने ये आरोप लगाते हुए लगभग ९ साल पहले उस लड़के की बारात को घर से वापिस लौटा दिया था, उस लड़की को उस वक़्त हमारी देशी और विदेशी मीडिया ने काफी तवज्जो दी थी. कई संस्थाओं ने उसे आयरन-लेडी तक कहा और कई ने तो कितने ही पुरस्कार दे डाले. भाई देने भी चाहिए थे... आखिर बहुत बहादुरी का काम किया था उसने. (हमारे देश में लड़की ने आवाज उठाई यही बहुत बड़ी बहादुरी की बात है)... पर ९ साल के बाद अदालत ने उस लड़की को झूठा कैसे साबित कर दिया? आखिर ९ साल के बाद अदालत को ये बात पता चली जो उस वक़्त किसी को नहीं पता थी? कमाल है... खैर ये तो हमारे देश की अदालत का स्टायल है कि किसी भी बात का पता लगने में उसे सदियों लग जाते है.... 

पर मुद्दा ये नहीं है.... मुद्दा ये है कि लड़के को क्या मिला? बेइज्जती, जेल, बदनामी और बेगुनाह होते हुए भी सजा.... और लड़की को क्या मिला? पुरस्कार, नाम, सम्मान और गुनाहगार होते हुए भी इज्जत.... भाई यही तो है महिला होने के फायदे... इस देश में महिलाओं के लिए कई क़ानून है... जो जरूरी भी है पर उनका दुरुपयोग भी उसी स्तर पर होता रहा है... क्या अदालत के इस फैसले से उस लड़के के जिंदगी के वो नौ साल वापस मिल जायेंगे? लड़की की तो उस घटना के एक साल के बाद शादी हो गयी थी... मतलब पिछले आठ सालों से लड़की एक खुशहाल जीवन जी रही होगी (अगर उसने वहां भी कोई झूठ नहीं कहा होगा)... पर लड़के ने पिछले नौ सालों तक जिस मानसिक वेदना को जिया है उसका फल उसे कौन दिलाएगा? क्या उस झूठी लड़की को कड़ी सजा नहीं मिलनी चाहिए जिससे कि और ऐसी दूसरी लड़कियों को सबक मिल सके?

महिला क़ानून बहुत जरूरी है और इसका मैं पूरा समर्थक हूँ पर ऐसे भी उपाय होने चाहिए जिससे कि बेगुनाह न फंस सके इस क़ानून के जाल में. क्या हर बार एक लड़का ही गलत होता है? ऐसे कई वाकये मैंने सुने और देखे भी है जब किसी लड़की ने झूठे आरोप में लड़के को दहेज़ प्रतारना और यहाँ तक कि बलात्कार के केस तक में सजा दिलवाई है. क्या मानसिक वेदना सिर्फ एक पुरुष ही औरत को देता है? मैंने तो कई ऐसे घर-परिवार देखे है जहाँ महिला के कारण पुरुष मानसिक वेदना झेल रहा है... ऐसे में वो पुरुष कहाँ फ़रियाद करे? चलिए नीचे दो स्थितियां दे रहा हूँ और उसके दो परिणाम भी.... शायद कोई त्रुटी कर जाऊं अपने कम दिमाग से तो मुझे अवश्य सूचित कीजियेगा...

स्थिति एक: एक लड़का और एक लड़की एक दुसरे से दो साल से प्यार करते है. उनके बीच कुछ असामाजिक सम्बन्ध भी होते है. किसी कारणवश लड़का शादी से इन्कार करता है. लड़की को मानसिक वेदना से गुजरना पड़ता है.
परिणाम एक: लड़की लड़के के खिलाफ या उसे पाने के लिए फ़रियाद कर सकती है. लड़की उस पर दो साल तक उसे भावनात्मक रूप से बेवकूफ बना कर यौन-शोषण का आरोप लगा सकती है.

स्थिति एक: एक लड़का और एक लड़की एक दुसरे से दो साल से प्यार करते है. उनके बीच कुछ असामाजिक सम्बन्ध भी होते है. किसी कारणवश लड़की शादी से इन्कार करती है. लड़के को मानसिक वेदना से गुजरना पड़ता है.
परिणाम दो: लड़का परिणाम एक जैसा कुछ नहीं कर सकता.

क्या सिर्फ लड़कियों की भावनाएं होती है लडको की नहीं? आखिर आज के महिला-पुरुष बराबरी युग में इतना भेद-भाव क्यों???

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