कल रात ही एक बात पता चली कि किसी भी बात को न जानने का अधिकार है और न ही कोई सवाल खड़ा कर सकता हूँ मैं. लोग मेरी जिंदगी का फैसला करते रहे और मुझसे यही अपेक्षा रही कि मैं हर बार उनकी बात मानता रहूँ... कोई मुझे दुनिया का सबसे बड़ा "स्टुपिड" कहता है, तो किसी के लिए पागल हूँ... किसी के लिए नालायक हूँ तो किसी के लिए सिर्फ एक मन बहलाने का मजाक... लेकिन इस बात से किसी को कोई मतलब नहीं कि दुनिया मेरे लिए क्या है...
अलग नजर से दुनिया को देखने की कोशिश करता हूँ शायद यही गुनाह है मेरा, इस व्यवहारिक दुनिया में सबसे इमानदारी और भानात्मक व्यवहार करता हूँ शायद ये मेरा दोष है, हर रिश्ते को पहले दिन से अपना मानता हूँ शायद ये मेरा कसूर है. दुनिया को सीधी नजर से देखता हूँ. जो नजर में आता है वही समझ में भी आता है, जो सुनता हूँ उतना ही दिमाग जान पाता है, जिसे महसूस करता हूँ वही दिल को भाता है... इससे ज्यादा न समझ में आया और न ही समझना चाहता हूँ. नदी, पहाड़, आकाश, सूर्य, चाँद, प्रकृति को देखता हूँ, हवा को महसूस करता हूँ उसी को मानता हूँ... जिसे लोग भगवान कहते है उसे न मैंने देखा, न सुना, न ही महसूस किया है इसलिए उसे भी नहीं मानता...
लोग जिंदगी में आते गए, सहारा बनाया अपना मुझे और फिर आगे बढ़ गए... इस बात से कोई तकलीफ नहीं बल्कि ख़ुशी है कि किसी के काम तो आया, मंजिल न सही रास्ता तो बन पाया. पर दुःख इस बात का है कि सबके साथ अच्छा सुलूक करने के बाद भी सिर्फ बुराई हाथ आई मेरे किस्मत के. किसी से गिला तक करने का अधिकार नहीं है मुझे, किसी से शिकायत करने का हक नहीं है, किसी से नफरत नहीं कर सकता, किसी से मोहब्बत नहीं कर सकता... प्यार करना हो तो दुसरे तय करते है कि किस्से करना है, दोस्ती करनी है तो दुसरे तय करते है किसे दोस्त बनाना है, किसी से नफरत करना है या नहीं ये भी दुसरे तय करते है... मुझे तो बस चुप-चाप सबकुछ करना है, वो सबकुछ जो सब लोग मुझसे चाहते है... कोई एक झटके में मेरी जिंदगी बिखेर दे मैं उससे नफरत नहीं कर सकता और लोगों के खिलाफ जा कर अगर नफरत कर भी ली तो उससे अपनी बर्बादी की शिकायत नहीं कर सकता... और अगर लोगों की बात मानकर चुप-चाप ऐसे लोगों से दूर होना चाहूँ तो वो भी नहीं हो सकता... लोग बताते है, समझाते है, सिखाते है कि "भूल जाओ जो हुआ... माफ़ कर दो उन्हें... वो हमारे ही रिश्तेदार है... वो हमारे ही अपने है... हमारा ही समाज है... जाने दो फिर ऐसा नहीं करेंगे... वगैरह-वगैरह"... और मैं चुप-चाप बैठ जाता हूँ, सरे खून के घूंट पी लेता हूँ... सोंचता हूँ चलो इस बार भूल जाता हूँ सब कह रहे है तो अगली बार माफ़ नहीं करूँगा... पर अगली बार फिर वही सब कुछ दोहराया जाता है, पहली बार चुप बैठने को मेरी कमजोरी समझ कर फिर मुझपर वार किया जाता है... और लोगों द्वारा फिर वही सीख मेरे कानों में डाली जाती है... मुझे समझ में नहीं आता कि आखिर ऐसा क्यों करता हूँ मैं, या मुझसे ऐसा क्यों करवाया जाता है... कैसे उन लोगों को अपने जिंदगी में शामिल रखा जा सकता है जिन्होंने हर-कदम पर चोट पहुंचाई हो... सिर्फ रिश्तों के नाम पर???
कोई रास्ते में जा रहा हो, और उसे कोई थप्पड़ मार दे तो क्या वो थप्पड़ का जवाब नहीं मांगेगा या फिर चुपचाप इस बात का इन्तेजार करेगा कि उसे अगला थप्पड़ पड़ेगा तब कुछ कहें और हर थप्पड़ के बाद अगले का इन्तजार करता रहेगा...
मैं ऐसा नहीं कर सकता पर करवाया जाता है... हमेशा... मन में कोई संदेह हो तो उसे नहीं जान सकता, कोई कुंठा हो तो बता नहीं सकता... कोई विचार है तो क्यों है, मुझे तो सोंचने का भी अधिकार नहीं है शायद... पर कमबख्त मैं सोंचना बंद ही नहीं करता... सोंचता हूँ, खूब सोंचता हूँ लेकिन अपनी सोंच को अपने अन्दर ही मार देता हूँ... कि कहीं मेरे अनचाहे अपनों को कोई ठेष न लगे... और अगर इस जहर को पीते-पीते मन में कुछ कडवाहट, कुछ चिडचिडापन आ जाये तो उसका भी अधिकार नहीं...
फिर आखिर मेरा हक क्या है???
फोटो हर बार की तरह गूगल से निकाल कर अपने ब्लॉग पे डाल लिया... जल्द ही अपनी बनायीं एक स्केच के साथ उपस्थित होउंगा...
























