कल उनकी पहली शिकायत मिल गयी... कहा "सब पर कुछ न कुछ लिखते है... आज अपने दिल पर लिख डाला... मुझ पर कभी कुछ नहीं लिखा..." अब उनको कौन समझाए कि जो कल लिखा है वो अपने दिल पर नहीं उन्ही पर लिखा है. ये अलग बात है मुख्य किरदार अपने दिल को बना डाला पर केंद्र तो वही थी. अब कौन उनको समझाए कि अपने दिल को तो बलि का बकरा हमने यूँ ही बना दिया, मुद्दा तो उनके लिए बसे प्यार को जताने का था. माना कि हम सिर्फ उनके बारे में ही नहीं लिखते पर ये सरासर गलत आरोप है हम पर कि हम उनके बारे में बिलकुल नहीं लिखते. उनको हमारी जिंदगी में आये अभी कुछ ही वक़्त तो हुआ है... पहले ठीक से अपनी गिरती-संभलती, अँधेरे से उजाले की ओर निकलने की कोशिश करती इस जिंदगी को तो दुरुस्त कर ले... पहले इस कलम से निकलने वाले दर्द की स्याही को तो निकाल के बाहर फ़ेंक दूँ... पहले इस दिमाग से दुखों के सपनो को तो भूला सकूँ... पहले अपनी आँखों से आंसुओं के हर एक बूँद को तो सुखा सकूँ... फिर लिखूंगा उनके लिए, सिर्फ नहीं पर उनके भी लिए...
अभी क्या लिखूं उनके बारे में... क्या किसी शब्दों में बाँध पाऊंगा उनके वजूद को? क्या कोई शब्द उनकी खूबसूरती के साथ इन्साफ कर पायेगा? क्या कोई शब्द उनकी अच्छाई को दर्शा पायेगा? क्या कुछ शब्दों का समूह उनके बेशुमार प्यार को जाता पायेगा? फिर क्या लिखूं उनके बारे में...?
फिर भी सोंचा एक कोशिश तो कर ही लूँ... आखिर उन्होंने खुद कहा है कि उनके बारे में भी कभी लिखूं तो एक कोशिश तो बनती है... कल रात भर जागा रहा... कभी बंद कमरे में अपने बिस्तर पर आँखें मूँद के सोंचा... कभी छत पर खुले आसमान के नीचे तारों के बीच उनके लिए शब्दों को ढूंढा... कभी बालकोनी में खड़े होकर बहती ठंडी हवाओं से पूछा... तो कभी घर से सामने की सड़क पर टहलते हुए रात के वीरानों में तलाशा...
पर एक भी ऐसा शब्द नहीं मिला जो उसे साक्षात न सही कम से उसके रूप को दर्शा तो सकें. कल दिन के उजालों में भी चारों ओर नजरें दौडाई... सोंचा कुछ तो होगा इस धरती पर जो उसे परिभाषित कर सकें... गुलाब को देखा तो उसमें कांटें नजर आये... पहाड़ को देखा तो उसमें कठोरता नजर आई... समुन्दर की तरफ नजरें की तो एक वीराना नजर आया... हवाओं की तरफ देखा तो अस्थिर नजर आया... नदियों की तरफ देखा तो वो अपना वजूद खोती नजर आई... सूरज में सिर्फ जलन और तपन थी... तो चाँद में दाग के साथ उधार की रौशनी थी... तारें भीड़ में भी अकेले पड़े थे... रेगिस्तान में खालीपन भरा था... मंदिर गया तो दुआओं का असर भी कम लगा... मस्जिद की चौखट पे जो रखे कदम पर अजान के स्वर भी कम लगे... गिरजा भी गया और गुरुद्वारे भी पर कोई न मिला... ऊपर वाले की तरफ देखा तो वो भी दूर नजर आया...
आखिर कहाँ से ढुंढू उसे जो उसे परिभाषित कर सके... जो उसकी खूबसूरती के साथ न्याय कर सके... जो उसके वजूद को यथार्थ कर सके... अब तो उसी से पूछना चाहता हूँ कि क्या लिखूं उसके बारे में...










3 कुछ आपकी खामोशी:
हामारी खामोशी कुछ नहीम कह रही क्योंकि कुछ चीज़ें परिभाषा से परे होती हैं।
बहुत अच्छी प्रस्तुति!
बहुत सुन्दर प्रस्तुति...
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