मैं कौन हूँ? ये एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब २७ सालों के बाद भी मैं नहीं ढूंढ़ पाया हूँ... पर यकीन मानिए रोज कोशिश करता हूँ इस जवाब को ढूंढने का. आखिर मेरा क्या अस्तित्व है... मैं कौन हूँ??? मैं रोज सुबह इसलिए नहीं जागना चाहता कि मुझे उठ कर ऑफिस जाना है, रात को इसलिए नहीं सोना चाहता कि सुबह ऑफिस जाने के लिए उठना है... मैं सोना चाहता हूँ खुद के लिए, जागना चाहता हूँ खुद के लिए... कुछ ऐसा करना चाहता जिससे मुझे ख़ुशी मिले, संतुष्टि मिले, जिस काम को कर मेरा दिल खुश हो... जिससे मुझे गर्व की अनुभूति हो...
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मंगलवार, 15 मई 2012

कौन सही है मैं या मेरा नक्चढ़ा दिल...

कुछ दिनों पहले की बात है या शायद कुछ महीने पहले की बात है.... अब छोडो यार खुद डिसाइड कर लो आप लोग कि दिनों पहले की बात है या महीनों पहले की... जब की बात हो क्या फर्क पड़ता है, फर्क पड़ता है  बात से न कि समय से... हाँ तो बात उस समय कि है जब मेरा बांया हाथ दूसरी बार नाराज होकर चटक बैठा था. उस वक़्त मेरी गर्दन ने बहुत हो-हल्ला मचाया था... उसकी दास्ताँ मैं सुना चूका हूँ... कुछ दिनों से मेरे सीने में धड़कते दिल ने मेरे घर में कोहराम मचा रखा है... 

पूछने की बहुत कोशिश की पर कमबख्त सीधी तरीके से कुछ भी सुनता ही नहीं. आखिर सबसे जयादा दुलारा जो है मेरा इसलिए थोडा नक्चढ़ा हो गया है. कल काफी मिन्नत की उससे, घुटने टेके उसके सामने, कई जोक्स सुना डाले, गुदगुदी कर डाली... तब जाके कहीं माना और कोहराम का कारण बताना शुरू किया. (अब आप लोग ये मत पूछना कि कुछ दिन से परेशान कर रहा था तो कल ही इतनी मिन्नत क्यों कि, सीधा सा जवाब है कल रविवार की छुट्टी थी... अब बाकी दिन इतना समय नहीं मिलता है न)... हाँ तो दिल से जो मेरी बातचीत हुई उसका विवरण दे रहा हूँ... आप ही बताइयेगा कौन सही है मैं या मेरा नक्चढ़ा दिल...

मैं: "क्या हो गया मेरे जान क्यूँ नाराज बैठा है? क्यूँ इतना कोहराम मचा रखा है? आखिर ऐसा क्या कर दिया मैंने?"
दिल: "क्या किया है तुमने? यु स्टुपिड आदमी किता तंग कर रखा है तुमने मुझे, पता है तुम्हे?"
मैं: "पर मैंने किया क्या है मेरे प्यारे?"
दिल: "अब तुम मेरे दिमाग ताऊ को मत खराब करो, वैसेईच अपन का मूड थोडा बिग्ड़ेला है."
मैं: "पर क्यूँ? यही तो पूछ रहा हूँ. देखो अगर कोई गलती हो गयी है तो माफ़ कर दो. देखो कान पकड़ता हूँ अपने."
दिल: "ओये हेल्लो गलती करो तुम, और साला पकड़ो मेरे कान भाई को. नहीं चलेगा, साला ये बिलकुल नहीं चलेगा. एक चमाट लगवा डालूँगा हाथ भाई को बोल के फिर सोंच लियो अपना हाल."
मैं: "ठीक है यार. ये लो अपने घुटने टेकता हूँ तुम्हारे आगे. अब तो बता दो... प्लीज़......"
दिल: "फिर साला अपनी गलती की सजा मेरे दोस्त को दे रहा है... तुझे पता है न अपना कितना खासमखास है मेरा यार 'घुटना'... देख साला अपने दिमाग ताऊ वहीँ रहते हैं हमेशा... तो सोंच के कहियो कुछ भी..."
मैं: "अरे मेरे बाप... गलती हो गयी यार... बता भी दे... क्यूँ इतना भाव खा रहे है?"
दिल: "साले तू भी न बहुत तंग करता है मुझे... अच्छा एक बात बता.."
मैं: "क्या...?"
दिल: "गर्दन बहन की तकलीफ तो बड़ी तलीनता से सुनी तुने... और मुझसे पूछा तक नहीं एक बार भी..."
मैं: "अरे यार तो इतनी देर से मैं क्या कर रहा हूँ?"
दिल: "तू फिर अपन के साथ... मैं नहीं बता रहा अब"
मैं: "अच्छा यार सॉरी सॉरी सॉरी..."
दिल: "एक बात और बता..."
मैं: "पूछ..."
दिल: "मेरा काम आखिर क्या है?"
मैं: "मतलब????"
दिल: "मतलब क्या मतलब... हिंदी में पूछा है तुझसे... समझ में नहीं आता क्या... छोड़ तू भी क्या समझेगा... तेरी बुद्धि तो आज कल कहीं और घांस चरने गयी है... मेरा काम सीधा सा है तेरे शरीर में बहते खून को साफ़ करता हूँ और तेरे पुरे शरीर को उसकी सप्लाई कर देता हूँ..."
मैं: "हाँ... तो..."
दिल: "तो के बच्चे... आज कल इस काम के लिए तो बड़ा कम समय देता है और जो काम मेरा नहीं है वो करवाता रहता है..."
मैं: "मतलब?"
दिल: "तू भी न साला कुछ भी नहीं जानता... यार एक बात बता मैंने किसी को अपने घर रखने का ठेका लिया है?"
मैं: "मतलब  :(  "
दिल: "मतलब तुने जो उसको फ्री फंड में मेरे घर में बिठा रखा है उसके बारे में बात कर रहा हूँ... न घर का किराया तय किया न एडवांस दिया... बस मेरी छोटी बहन आँख के घर के रास्ते सबको धोखा देते हुए मेरे घर में घुसा दिया..."
मैं: "यार... अब तू भी न... तुझे पता है वो कौन है... अब देख मुझपर-तुझपर अब उसका ही तो हक़ है..."
दिल: "चल छोड़-छोड़.. दिमाग ताऊ का दही मत कर... तुझपर हक़ है ये तो समझा... पर मुझपर क्यों??? उसका दीदार किया आँख बहनों ने, उसने अंगूठी पहनाई अंगुली भाई को... फिर साला मैं क्यों उसके लिए परेशान रहूँ... जिस अंगुली भाई को उसने अंगूठी पहनाई वो तो मजे में सोने में खेल रहा है... सोने की अंगूठी पे इतर रहा है... सबको खुश हो-होकर खुद को दिखा रहा है... आँख बहनों ने भी उसकी खूबसूरती को खुद में बसा लिया... जब न तब उसकी तस्वीर को निहारने लगती है... फिर साला मैं क्यों फ्री-फंड में ओवर-ड्यूटी करूँ???"
मैं: "......."
दिल: "हो गया न चुप... एक तो चल पहले उसे मेरे घर में बसाया तो बसाया... अब उसकी यादों ने भी कब्ज़ा कर लिया है... उसकी बातें है कि हवाओं की तरह मेरे घर में इधर से उधर घुमती रहती है... साला मैं अपने काम पे कंसंट्रेट ही नहीं कर पता... पूरा दिन इन्हें संभालने में ही वक़्त गुजर जाता है... एक तो अपना काम भी करो और ऊपर से साला इनको भी संभालो... अपने से ये दोनों काम नहीं होने वाले..."
मैं: "यार... पर इसमें मेरी गलती कहाँ है... ???"
दिल: "तो मेरी गलती है? देख अभिषेक ! अपना दिमाग खराब न कर... मूड साला बहुत ख़राब है... सोंच के बता कौन सा काम करना है... या तो मैं अपना खून की सप्लाई वाला काम करूँ या फिर इनको संभालूं दिन भर... अब तू बता"
मैं: "भाई मेरे..."
दिल: "साला भाई नहीं बोलने का..."
मैं: "अच्छा यार... सॉरी... देख कुछ दिन की तो बात है... अभी थोडा ओवर-ड्यूटी, एक्स्ट्रा-वर्क कर ले... फिर हम दोनों मिल के संभालेंगे... यार देख तुझे पता है अभी वो मेरे पास, मेरे घर में नहीं है... अभी नहीं ला सकता न उसे... इसलिए तो तब तक तेरे घर में बसा रखा है... बाद में हम दोनों मिल के उसका ख्याल रखेंगे... वैसे एक सच बताऊँ?"
दिल: "क्या बोल... "
मैं: "उसे तेरे घर में न रखूं तो कहाँ रखूं? मैं तो पूरी जिंदगी उसे तेरे घर से नहीं निकाल सकता और निकालूँगा भी नहीं... तुझे दिक्कत हो रही है तो तू अपना खून सप्लाई का काम बंद कर दे पर उसे तकलीफ नहीं होनी चाहिए... रहेगी तो वो हमेशा तेरे ही घर... और एक बात बता..."
दिल: "क्या बोल यार..."
मैं: "आखिर तू उससे प्यार भी तो करता है..."
दिल: "...."
मैं: "अब तेरी चुप्पी आ गयी न... अब बता तू बोल क्या करना है... निकाल लूँ उसे तेरे घर से..."
दिल: "अब छोड़ यार अवि, तू भी न साला ईमोसनल कर देता है... चल कोई नहीं कर लूँगा यार एडजस्ट..."
मैं: "अरे... नहीं... तू क्यों एडजस्ट करे... मैं अभी निकाल देता हूँ न उसे..."
दिल: "नहीं.. नहीं..."
मैं: "क्यों अभी तो तू इतना हल्ला मचा रहा था..."
दिल: "अब छोड़ न यार... कितना तू बातों को पकड़ता है... रहने दे यार मेरे घर में उसे... मेरे घर में भी रौनक बनी हुई है... और पता है... उसकी यादें तो इतनी चंचल है न कि बस पुरे दिन भर मेरे घर से निकलने वाली नसों के रास्ते पुरे बदन में दौड़ती रहती है... और तो और दिमाग ताऊ पर भी कब्ज़ा कर लिया है... और उसने तो अपने व्यवहार और प्यार से आत्मा तक को अपना बना लिया है..."
मैं: "  :-)  "

अब आप सब गुणी-जन ही फैसला कीजिये और हो सके तो कुछ सलाह जरूर दीजियेगा...

5 कुछ आपकी खामोशी:

Sonal Rastogi ने कहा…

:-)

रविकर फैजाबादी ने कहा…

दिल तो लल्लू है सखे, सगी हैं दोनों आँख |
चले फिसलता हर घरी, बुद्धि सिखाये लाख |
बुद्धि सिखाये लाख, फफोले दिल के फोड़े |
बाहर करे गुबार, किन्तु ना उनको छोड़े |
रविकर कर विश्वास, हुआ है बड़ा निठल्लू |
पल्लू की ले आस, घुमाता दिल तो लल्लू ||

रविकर फैजाबादी ने कहा…

त्वरित टिप्पणी से सजा, मित्रों चर्चा-मंच |
छल-छंदी रविकर करे, फिर से नया प्रपंच ||

बुधवारीय चर्चा-मंच
charchamanch.blogspot.in

राजीव कुमार ने कहा…

यानी शिखा जी दिलोदमाग के शिखर पर विराजमान हो चुकी हैं... बढ़िया है...
सही ट्रैक पर चल रहे हैं साले साहब... इजहार ए मोहब्बत का तरीका भी क्या
खूब निकाला है।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सलाह की जरूरत नहीं .. बस ऐसे ही लगे रहो ... सही ट्रेक पे जा रहे हो ...

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