कि आज फिर कुछ लिखना चाहता हूँ
पर न जाने क्यों लिखना संभव नहीं हो पा रहा है
कुछ तो है मन में जिसे पन्नो पे उतारना चाहता हूँ
कुछ तो है जिसे शब्दों में बांधना चाहता हूँ
पर न जाने क्यों बांधना संभव नहीं हो पा रहा है
बैठ तो गया हूँ कागज़-कलम लेकर अपनी
पर शब्द है पीछा छुड़ा के भाग रहे है मुझसे
छिप रहे है कोनो में, बच रहे है मेरे सामने आने से
मैं उन्हें पकड़ के अपनी सोंच में पिरोना चाहता हूँ
पर न जाने क्यों पिरोना संभव नहीं हो पा रहा है
तेरी तारीफ़ के लिए ढूंढ़ रहा हूँ कुछ फूल नए
तेरी चहक के लिए तलाश रहा हूँ कोई पंक्षी दीवानी
चंचलता तेरी नदियों को देना चाहता हूँ
तेरे सपनो को आज अपनी आँखों में सजाना चाहता हूँ
पर न जाने क्यों सजाना संभव नहीं हो पा रहा है
कि आज फिर कुछ लिखना चाहता हूँ
तेरी खूबसूरती के लिए नए रंग तलाशना चाहता हूँ
तुझसे आज मैं अपना बनाना चाहता हूँ
कि आज फिर बहुत कुछ लिखना चाहता हूँ...









5 कुछ आपकी खामोशी:
nice
बहुत सुंदर.....
भावों की अभिव्यक्ति कभी कभी बहुत मुश्किल हो जाती हैं.........
सादर.
अच्छा लिखते हैं आप..अच्छी लगी..
बहुत बेहतरीन रचना....
मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।
उम्दा व अच्छी रचना...
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