मैं कौन हूँ? ये एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब २७ सालों के बाद भी मैं नहीं ढूंढ़ पाया हूँ... पर यकीन मानिए रोज कोशिश करता हूँ इस जवाब को ढूंढने का. आखिर मेरा क्या अस्तित्व है... मैं कौन हूँ??? मैं रोज सुबह इसलिए नहीं जागना चाहता कि मुझे उठ कर ऑफिस जाना है, रात को इसलिए नहीं सोना चाहता कि सुबह ऑफिस जाने के लिए उठना है... मैं सोना चाहता हूँ खुद के लिए, जागना चाहता हूँ खुद के लिए... कुछ ऐसा करना चाहता जिससे मुझे ख़ुशी मिले, संतुष्टि मिले, जिस काम को कर मेरा दिल खुश हो... जिससे मुझे गर्व की अनुभूति हो...
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बुधवार, 25 अप्रैल 2012

मैं तुमसे प्यार नहीं करती...

"मैं तुमसे प्यार नहीं करती."
"प्यार नहीं करती? फिर वो क्या था जो हमारे बीच पिछले चौदह महीनो से चल रहा था?"
".... कुछ नहीं."
"क्या मतलब है कुछ नहीं?"
"मैं बस मजाक कर रही थी."
"चौदह महीनो का मजाक? क्या तुम्हे एक बार भी नहीं लगा इस मजाक से मेरा क्या होगा? क्या बिगाड़ा था मैंने तुम्हारा जो तुम मेरे साथ ऐसा कर रही हो? किस गलती की सजा दे रही हो मुझे? सजा देने से पहले मेरा गुनाह तो बता दो..."
"मैं अब तुमसे बात नहीं कर सकती. मुझे भूल जाओ और किसी अच्छी लड़की से शादी कर लेना."
"तुम्हे भूल जाऊँ? पर कैसे? और किस अच्छी लड़की से? वो भी तुम्हारी तरह मजाक करने वाली निकली तो मेरा क्या होगा?"
"तुम्हे जरूर अच्छी लड़की मिल जाएगी. मुझसे भी ज्यादा अच्छी..."
"क्या गारंटी है कि मुझे अच्छी लड़की मिल जाएगी और मेरी जिंदगी फिर बर्बाद नहीं होगी? तुम ये गारंटी दोगी? दोगी मुझे लिखित गारंटी कि अगर भविष्य में मेरे साथ फिर बुरा हुआ तो उसकी जिम्मेदार तुम और तुम्हारे घर वाले होंगे? जाओ-जाओ सहर... मुक्त किया मैंने तुम्हे... तुम्हे मेरे जीवन की चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है. वैसे भी तुमलोगों को मुझे जितना बर्बाद करना था कर लिया, अब मेरी जिंदगी मुझपर छोड़ दो और रहने दो मुझे मेरे हाल पर. तुम्हारे मजाक का बहुत-बहुत शुक्रिया सहर, बहुत-बहुत शुक्रिया. दुआ करूँगा कि तुम कभी फिर किसी और से प्यार न करो... अगर मुझसे मजाक में भी एक पल के लिए भी प्यार किया हो तो उस प्यार की कसम किसी और के साथ मजाक करके उसकी जिंदगी बर्बाद न करना."


मैं जानता हूँ सहर तुम जो भी बोल रही थी वो झूठ बोल रही थी. मैं जानता हूँ तुम मजबूर हो. तुम्हारे हर शब्दों के पीछे छिपे दर्द को अपने दिल पर महसूस कर रहा था मैं. कल तक तो सब ठीक था हमारे बीच और आज अचानक दुनिया ने मिलकर हमारी दुनिया ही बिखेर दी. जानता हूँ मैं, अभी तुमसे काफी सख्ती से बात कर रहा था मैं. पर क्या करता, मैं भी मजबूर था. मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे दिल से भुला दो और कोई ऐसा तुम्हारे जीवन में जो तुमसे इतना प्यार करे कि मेरे नाम की लकीरें तक मिट जाये तुम्हारे जेहन से. लेकिन एक वादा है मेरा तुमसे मैं कभी तुम्हे भूल नहीं पाऊंगा. चाह के भी नहीं भूल सकता मैं तुम्हे. मैंने तुम्हे अपनी पत्नी स्वीकार चूका था मैं और एक पत्नी के होते हुए मैं दूसरी शादी कैसे कर सकता हूँ.... तुम मेरे साथ रहो या न रहो पर मेरी सहर हमेशा मेरी यादों में मेरे साथ, मेरी बाहों में रहेगी...

ये कोई कहानी नहीं बल्कि एक हकीक़त है. कल ऑफिस से लौटते वक़्त बस में अपने बगल में बैठे एक लड़के की बातचीत सुन रहा था... उधर की आवाज भी साफ़-साफ़ सुनाई दे रही थी... अंतिम के वाक्य उसके मन के ही वाक्य है... अब आप पूछेंगे कि मैंने उसके मन की बात कैसे जानी तो उसके बातचीत के बाद जब उसे रोता देखा तो खुद को रोक न सका और बात करने के लिए मजबूर हो गया... उसने कोई आप-बीती नहीं सुनाई बस यही कुछ वाक्य कह कर अगले ही बस-स्टॉप पर उतर गया... उसी के कहे शब्दों के आधार पर अपनी सोंच को घोल के लिख दिया.... उसके लिए सिवाय दुआ के कुछ भी नहीं मेरे पास... मुझे नहीं पता क्या हुआ उसके साथ... पर जो भी हुआ जरूर गलत हुआ... क्या मजबूरियाँ थी उस लड़की के साथ ये भी नहीं जानता पर इतना बड़ा फैसला लेने में उसे तकलीफ जरूर हुई होगी... पर उनकी इस बातचीत के आधार पर इतना तो कह सकता हूँ कि दोनों ने सच्चे दिल से एक दुसरे से प्यार किया है जो कि आज कल देखना थोडा मुश्किल सा है... लड़की का नाम "सहर" काल्पनिक है क्योंकि किसी की भावना का मजाक नहीं उडाना चाहता हूँ...

2 कुछ आपकी खामोशी:

रविकर फैजाबादी ने कहा…

मार्मिक ।

saurabh gupta ने कहा…

मार्मिक ।

मार्मिक ।

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