मैं कौन हूँ? ये एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब २७ सालों के बाद भी मैं नहीं ढूंढ़ पाया हूँ... पर यकीन मानिए रोज कोशिश करता हूँ इस जवाब को ढूंढने का. आखिर मेरा क्या अस्तित्व है... मैं कौन हूँ??? मैं रोज सुबह इसलिए नहीं जागना चाहता कि मुझे उठ कर ऑफिस जाना है, रात को इसलिए नहीं सोना चाहता कि सुबह ऑफिस जाने के लिए उठना है... मैं सोना चाहता हूँ खुद के लिए, जागना चाहता हूँ खुद के लिए... कुछ ऐसा करना चाहता जिससे मुझे ख़ुशी मिले, संतुष्टि मिले, जिस काम को कर मेरा दिल खुश हो... जिससे मुझे गर्व की अनुभूति हो...
मुझसे संपर्क साधना बहुत आसान है... ab8oct@gmail.com पर मेल कर सकते है, http://ab8oct.blogspot.com/, http://humarinayisubah.blogspot.com/ पर मेरे विचारों को पढ़ सकते है....
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सोमवार, 9 अप्रैल 2012

एक ब्लॉग पोस्ट पर मचा बवाल...


एक ब्लॉग पोस्ट, एक कविता पर मचा बवाल... दुःख भी हो रहा है और ख़ुशी भी. दुःख क्योंकि इस पोस्ट को बहाना बनाकर लोग निजी खुंदक या द्वेष निकालने में लगे है और ख़ुशी इस बात की है कि साहित्य बचाने को कई लोगों के हाथ नजर आ रहे है.

वंदना गुप्ता की एक कविता ने हमारे साहित्य जगत को झिंझोड़ कर रख दिया है. हर व्यक्ति घबराया हुआ सा नजर आ रहा है. सबको चिंता सताए जा रही है कि अब क्या होगा... अब तो ख़त्म हो गए सारे संस्कार... ख़त्म हो गयी हमारी हिंदी की मर्यादा... शनिवार का सुबह ही इस विवाद के साथ शुरू हुआ. मैंने देखा और शाम तक मैंने भी एक पोस्ट लगा डाली. पर ऐसा मैंने इसलिए नहीं किया था कि मैं वंदना जी को जानता हूँ या फिर मैं मर्यादा से बाहार आ कर लिखे गए इस कविता को समर्थन करता हूँ. मैंने सिर्फ एक कवियत्री की अभिव्यक्ति का समर्थन किया था और 'बेमतलब के विवाद' का विरोध. पर मुझे नहीं पता था कि विवाद इतना बढ़ जायेगा कि लोग एक दुसरे के जान के प्यासे बन जायेंगे.

कल रविवार की सुबह अविनाश जी के घर पर था तो जाहिर है इस विवाद पर भी चर्चा हुई होगी. सबके अपने विचार होते है. कोई बात अगर किसी को अच्छी लगती है तो दुसरे को बुरी लग सकती है. अच्छी बातें कह दे तो दिल खुश और बुरी बातें कही जाये तो पचाना मुश्किल. चलिए मानता हूँ अविनाश जी ने बहुत बड़ा गुनाह कर दिया पर क्या उस पर प्रतिक्रिया करना जरूरी था? सफाई देकर खुद को गलत साबित नहीं किया गया. कुछ व्यक्ति के विरोधाभास से कवियत्री को अपने अस्तित्व पर ही खतरा क्यों महसूस होने लगा. मेरे ख्याल से तो कवयित्री के विकाश में ये शब्द और सहयोग करते.

अब बात करते है इस विवाद की. कविता लिखी वंदना जी ने... फेसबुक पर इसका विरोध शायद शुरू किया अविनाश जी ने... और देखते-देखते ये विवाद युद्ध में बदल गया... खून-खराबे की नौबत आ गयी... धमकियां दी जाने लगी. लोग साहित्य को बचाने की हाय-तौबा में साहित्य को अपने पैरों तले कुचलते चले गए. बात करता हूँ महफूज अली जी की... कई सारी डिग्री धारक ये कवि-लेखक कई ब्लोग्स पर सक्रिय है. अच्छी पोस्ट, कवितायें लिखते है.... पर इनका हालिया विवाद पर लिखा गया पोस्ट मुझे इनकी भर्तसना करने से नहीं रोक सकता. कोई भी पढ़ा-लिखा इंसान जिसका पेशा व्यापार (जहाँ मधुरता ही सबसे पड़ी कुंजी होती है) और शिक्षा है उनके कलम और दिल से निकले शब्द पर तो आपत्ति मेरे ख्याल से वंदना जी को भी होगी जिनके लिए महफूज जी ने अविनाश जी को गालियाँ और धमकी तक दे डाली. महफूज जी से ही पूछना चाहूँगा कि किस साहित्य सेवा से जुड़े है आप जहाँ आपको इतने अच्छे शब्दों का प्रयोग सिखाया जाता है. अगर साहित्य इन शब्दों का नाम है तो मुझे शर्म खुद पर आती है कि मैं साहित्य से जुडा हुआ हूँ. महफूज जी ने अपने इस पोस्ट पर कमेन्ट क्यों बंद कर रखे है? जब आपने खुले मंच पर आकर ऐसी बात कही है तो लोगों की प्रतिक्रिया का भी सामना करना चाहिए था...

अब बात करता हूँ दुसरे हिंदी प्रेमी की जिनका नाम अलबेला खत्री... आज ही इनका पोस्ट देखा. अलबेला जी को वंदना जी की कविता से बहुत चोट पहुंची लगती है. काफी विरोध झलक रहा है पर अलबेला जी आपने जिन शब्दों का प्रयोग अपनी पोस्ट में किया है, वो सही है? एक-एक शब्दों से ऐसा लग रहा है जैसे न जाने हम किस समय में आ गए है. अलबेला जी ने वंदना जी की तो बहुत निंदा कर ली पर कभी अपने शब्दों पर गौर किया? सिर्फ इस पोस्ट की बात नहीं है, अलबेला जी को मैंने जब-न-तब साहित्य की सीमा लांघते हुए और शब्दों की मर्यादा तोड़ते हुए महसूस किया है. लेकिन उस वक तो कोई हल्ला नहीं मचता... क्यों? क्योंकि वो पुरुष है? अगर पुरुष होने के नाते ये सब लिखने का हमें अधिकार मिल जाता है और औरत होने के कारण ये अमर्यादित हो जाता है तो फिर मैं कहता हूँ कि ऐसा पुरुष न होने के सामान है.

अनु जी का भी ब्लॉग पोस्ट देखा. कम शब्दों में मर्यादित रूप से वंदना जी का समर्थन किया है. ये अच्छा लगा और इस पुरे विवाद में सुखद शान्ति सा महसूस हुआ. रचना जी के द्वारा लिखा गया पोस्ट नारी ब्लॉग पर पढ़ा. उनके शब्दों से भी शालीनता झलकती है. फिर हम सारे पुरुषों को क्या हो गया है?

किसी का विरोध गलत नहीं है, निंदा भी उचित है... पर क्या उसके लिए अपनी मर्यादा खो देना उचित है? जिस तरह से ये युद्ध चल रहा है उससे तो प्रतीत हो रहा जैसे बच्चों का खेल चल रहा हो या फिर गली-चौराहों में आवारा घुमने वाले लोगों द्वारा की गयी प्रतिक्रिया हो. ऐसा महसूस ही नहीं हो रहा कि ये विवाद आज मजबूत स्तम्भ के रूप में उभरते हुए ब्लॉग-जगत में चल रहा है... ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे किसी चाय की दूकान या पान की गुमठी पर हो रहा बकवास है...

वंदना जी की भी भ्रतर्सना करने से खुद को नहीं रोकूंगा. ऐसा महसूस हो रहा है कि मैंने वंदना जी की अभिव्यक्ति का समर्थन करके कोई बहुत बड़ी गलती कर दी. मैं इस विवाद को सही आयाम देना चाहता था न कि खुद एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाना. वंदना जी का कल लिखा गया पोस्ट देखा. पहली पंक्ति पढने के बाद लगा जैसे ये इस विवाद को शान्ति रूप से ख़त्म करना चाह रही है पर जैसे-जैसे पढता गया इसमें निजी द्वेष से ज्यादा कुछ नजर नहीं आया. सिर्फ एक-दुसरे पर आक्षेप चल रहे है. एक दुसरे को नीचा दिखाने की कोशिश की जा रही. इन सबके बीच जिस साहित्य के ख़त्म होने का डर सता रहा है, जिस साहित्य की मर्यादा पर बात आ गयी है वो कहाँ है? साहित्य से बढ़कर साहित्यकार हो गए है? वंदना जी को शिकायत है कि अविनाश जी उनसे बात कर सकते थे, तो वंदना जी मेरे ख्याल से उन्होंने अगर ऐसा नहीं किया तो आप तो कर सकती थी. लेकिन आप भी अपने अहम् में रही. और अहम् भी ऐसा जिसका कोई आधार नहीं.

कहते हुए दुःख होता है ऐसे लोग जिन्हें साहित्य की समझ भी नहीं, वो कुछ भी दो-चार पंक्तियाँ लिखकर या कोई इधर-उधर के पोस्ट लगाकर खुद को साहित्यकार घोषित कर लेते है. शायद मैं भी उन में से ही हूँ, पर मैंने कभी भी खुद को किसी के आगे नहीं थोपा. कभी खुद को मैंने साहित्यकार, लेखक या कवि नहीं माना. आज जब हिंदी अपना अस्तित्व खोने के कगार पर खड़ी है तो इसे बचाने की बजाय हम स्व-लाभ में लगे है. एक दुसरे का हाथ पकड़ आगे बढ़ने की बजाय एक दुसरे की टांग खींच रहे है. कैसे एक-दुसरे को नीचा दिखाया जाये इस पर विचार होती है पर हिंदी साहित्य को कैसे बढाया जाये इस पर कोई चर्चा नहीं होती.... मैंने कभी नहीं सुना किसी भी लेखक को इस तरह अपशब्दों का इस्तेमाल करते हुए, इस तरह लड़ते हुए... दुःख होता है मुझे, बहुत दुःख होता है...

छोटा मुंह और बड़ी बात होगी पर मैं सबसे एक विनम्र निवेदन करूँगा कि इस विवाद को ख़त्म करें. जैसे अपने कविताओं या पोस्ट के लिए वाह-वाही के मजे लुटते है वैसे ही निंदा की चाय भी स्वीकार करें. लोगों से अगर मर्यादा की अपेक्षा कर रहे है तो पहले खुद मर्यादित हो. ये बिलकुल ऐसा ही है कि किसी को गाली देने से हम मना कर रहे खुद उसे गाली देकर. जो काम आप दूसरों से अपेक्षा रखते है उसे पहले खुद करें. मैं किसी का समर्थन नहीं कर रहा बल्कि इन सारे तथाकथित "सभ्य" लोगों का विरोध कर रहा हूँ. मैं सबसे एक ही अपेक्षा करूँगा कि अपने-अपने अहम् से बाहर निकले और विवाद को ख़तम कर के अपने-अपने ब्लॉग पर जिस तरह से एक-दुसरे के खिलाफ आक्षेप किया है वैसे ही माफ़ी नामा जरूर लिखे.

शुरुआत मैं करता हूँ और आप सबसे माफ़ी मांगता हूँ अगर मैंने कुछ ज्यादा या अनुचित कह दिया हो.

चाहता तो था और लिखूं पर लगता इन सारे सभ्य लोगों के बीच कुछ भी कहना बेमानी होगा... मेरे लास्ट पोस्ट पर मिले राजेश उत्साही जी के कमेन्ट से बिलकुल सहमत हूँ... "अभिषेक जी की बात से मैं भी सहमत हूं। विरोध या समर्थन संयमित भाषा में ही होना चाहिए। असभ्‍य और अभ्रद भाषा का उपयोग क्‍योंकर वांछनीय है। अगर ऐसा सब चलता रहा तो कपिल सिब्‍बल साहब की इस बात से हर कोई सहमत हो जाएगा कि सोशल नेटवर्किंग पर लगाम कसने की जरूरत है।" सच में अगर ऐसा ही चलता रहा तो ब्लॉग, साहित्य या कोई भी खुला मंच हो उसपर भाषा नियत्रण का सबसे पहला पैरोकार मैं होऊंगा... 

3 कुछ आपकी खामोशी:

रविकर फैजाबादी ने कहा…

AABHAAR

Sakaraatmak Post

गारी गुप्ता ho रहा, जाल जगत पर आज ।
मूल विषय खोवे सकल, गिरे गजल पर गाज ।

गिरे गजल पर गाज, वंदना के स्वर रूठे ।
कौन यहाँ महफूज, मिटे सब दुष्ट अनूठे ।

भौतिकता धन धान्य, जला सकती चिंगारी ।
मन जीवन सम्मान, जलाती कटुता गारी ।।

Padm Singh ने कहा…

संयम दोनों तरफ से या कहें तो चारों तरफ से खोए गए हैं ...

सतीश सक्सेना ने कहा…

किसी को अगर कोई लेख विशेष या विषय पसंद नहीं आते तो वह न पढने के लिए स्वतंत्र है न कि उस लेख के कारण व्यक्ति विशेष का व्यक्तिगत अपमान किया जाए !

अपमान करने वाले को अपने मान की आशा भी नहीं रखनी चाहिए !

यह प्रकरण निंदनीय है !

शुभकामनायें ...

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