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| संभलकर, विषय सचमुच "बोल्ड" है |
यहाँ जो चित्र दे रहा हूँ उसे देख कर पता नहीं आपलोगों का क्या रियेक्सन होगा... ये चित्र हमारे बीच की ही एक उम्दा और सुपरिचित कवयित्री के ब्लॉग से लिया है... नाम है उनका वंदना गुप्ता... आप सब परीचित होंगे उनसे... उनके हाल के पोस्ट के बाद और भी ज्यादा... और अगर वो परीचित न भी थी तो कुछ लोगों ने उन्हें विख्यात कर दिया... पर आखिर ऐसा क्या है उस पोस्ट में?
एक कविता है... कविता, एक ऐसे विषय पर जो इस तथाकथित 'सभ्य' समाज के लिए नागवार है. कविता एक ऐसे विषय पर लिख दी गयी वंदना जी के द्वारा जिसे हम सभ्य लोग पचा नहीं पा रहे. सुबह-सुबह जब "फेकबुक"... (माफ़ कीजियेगा) फेसबुक खोला तो हमारे अन्ना स्वामी का इसी के ऊपर बड़ा उत्तम और विनम्र कुठाराघात देखा. अन्ना भाई को लगता है बहुत गहरी चोट लग गयी है उनके दिल-ऑ-दिमाग पर. कई लोग लग गए अन्ना जी को सांत्वना देने, लोग खुले दिल से उनका साथ निभाने लगे. और जिन्होंने ने भी अन्ना भाई की खिलाफत करने की कोशिश की बस नाराज हो गए हमारे अन्ना भाई.
अन्ना भाई ने एक बड़ा अच्छा शब्द यूज किया 'नंगई'... समझ में नहीं आया ऐसा क्या है इस कविता में. कवयित्री ने आपनी भावना को जिन शब्दों में उतारा है उन शब्दों का निर्माण किन्होने किया? पढने में तो हिंदी के ही शब्द लग रहे थे. खैर इस बात को छोडिये कि किसने इन शब्दों का निर्माण किया. चाह कर भी ढूंढ़ नहीं पायेंगे हूँ. पुरुष समाज को कितनी पीड़ा होनी शुरू हो गयी जब एक महिला ने साहस दिखा दिया समाज के बनाये हदों से ज्यादा लिखने का, सोंचने का. वंदना जी ने हिम्मत दिखाई उस सत्य को लिखने की, कहने की जो हर व्यक्ति अपनी जिंदगी में महसूस करता है. क्या गलत किया? ब्लॉग जगत पर हमने इसे पढ़ा और हम परेशान हो गए. नग्नता क्या उन कहानियों में नहीं जिनमें खुले रूप से सेक्स संबंधों को हर प्रक्रिया के साथ उजागर किया जाता है? आज के दौर में किस उपन्यास में इस विषय को खाने के साथ अचार के रूप में उपयोग नहीं किया जाता? अगर हिंदी के उपन्यासों की ही बात करूँ तो कई नाम है जिन्हें मैं खुद गिना सकता हूँ, और वो नाम किसी पहचान के मोहताज भी नहीं है.
लोगों को इस बात से परेशानी है कि हम इस कविता का पाठ अपने परिवार के बीच कर सकते है या नहीं. मैं उन सब लोगों से पूछना चाहता हूँ जब सब मिलकर एक साथ बैठ कर टीवी देखते है तो उनमें सारी चीजें सभ्य नजर आती है? किसी भी डियो का प्रचार उठाकर देख लीजिये, लड़के ने डियो छिड़क लिया और लड़कियों का झुण्ड पीछे भाग रहा है... वो क्या है? बाथरूम फीटिंग हो या किसी गुठके या शराब की ही प्रचार क्यों न हो लड़कियों को एक मॉडल की तरह दिखा दिया जाता है... वो क्या है? फिल्में उठा कर देख लीजिये सेक्स को खाना पचाने के लिए पाचक की तरह यूज किया जाता है.
चलिए इन बातों को भी छोड़ देता हूँ. और पुनः लौट कर आता हूँ सिर्फ वंदना जी के कविता की ओर. मुझे उस कविता में एक भी अश्लील शब्दों का उपयोग नजर नहीं आया. वैसे शब्द जो हम रोज बोल-चाल में उपयोग करते है और न जाने कितनों की माँ और बहन की इज्जत बिना कुछ किये लुट लेते है. उस वक़्त हमें क्या हो जाता है?
खैर ये एक ऐसा विषय है जिसपर जितना बहस करें कम होगा. हाँ इस बात को मैं स्वीकार करता हूँ कि अभी भी हमारा "हिंदी" समाज इस स्तर पर नहीं पहुंचा है कि इस पर हम चर्चा कर ले वो भी किसी महिला के साथ, भले अपने दोस्तों के बीच अभद्र टिपण्णी कर ले किसी भी महिला के लिए. मैं वंदना जी को इस साहसिक कदम के लिए धन्यवाद देता हूँ. और दुसरे संभ्य लोगों से इस बात का आग्रह करता हूँ कि अपने संस्कारों को इतना कमजोर क्यों समझते हो कि एक हलके से पवन के झोंके से भी उसके गिरने का डर सताने लगे...











20 कुछ आपकी खामोशी:
अभिषेक भाई !! सच कहा आपने!! छोटी मुह बड़ी बात होगी.. पर जिस तरह से वंदना जी के लिए अपशब्द इस्तेमाल किये जा रहे हैं.. या जिस तरह से उन्हें टार्गेट किया जा रहा है, मैं भर्त्सना करता हूँ!
मुकेश की बात से मैं भी सहमत हूँ ......अब वंदना को टारगेट करके बहुत कुछ बेकार का लिखा जा रहा हैं ......जो सच में निंदनीय हैं ...जहाँ एक औरत का सम्मान होना चाहिए था वहाँ उसके लिए भद्दे शब्दों को इस्तेमाल हो रहा हैं .....शर्म आ रही हैं कुछ ब्लोग्गेर्स पर ...जो सम्मानीय भाषा नहीं लिख रहे ....
भाई मैंने तो अपनी टिपण्णी पोस्ट ही नहीं की |
यहाँ कर देता हूँ --
गरम गरम तासीर, बदन में आग लगाईं --
विषय बोल्ड है --
खरा गोल्ड है ।।
टिप्पणी जो बोल्ड विषय पर करने से
डर गया रविकर -
दुबारा गौर करने पर निरर्थक लगी यह टिप्पणी ।
कहीं भी दुबारा पंगा नहीं लेना था ।।
गौर फरमाएं--
पाका पहली मर्तबा, लेकर दूध-पनीर ।
चमचे ने धोखा दिया, गिरी हीर पर खीर ।
Kheer - The World's Yummiest One!. Photo by Chef #1131126
गिरी हीर पर खीर, नहीं गाढ़ी हो पाई ।
गरम गरम तासीर, बदन में आग लगाईं ।
तेरा भी कुछ दोष, चमकता रहा बुलाका ।
था दिन भर अफ़सोस, दुबारा बढ़िया पाका ।।
link-dcgpthravikar.blogspot.com
Vandana Gupta
वंदना ; ये तुम्हारे लिये :
http://apnokasath.blogspot.in/2012/04/blog-post_07.html?spref=fb
http://apnokasath.blogspot.in/2012/04/blog-post_07.html?spref=fb
http://indianwomanhasarrived.blogspot.in/2012/04/blog-post_07.html
हम सभी मित्र आपके साथ है . आप तो बस लिखते रहिये . जीवन चलते ही रहता है , इसकी गतिशीलता पर कोई फर्क नहीं पड़ता है . कुछ लोग अगर आपके खिलाफ है तो बहुत से ज्यादा लोग आपके साथ भी है . और यही सबसे बड़ी बात है . लोग आपकी पोस्ट में मौजूद समस्या को छोड़कर उसकी भाषा और प्रस्तुति के पीछे पढ़ गए है . और सबसे बड़ी मूल समस्या इस देश की यही है . हम सभी मित्र आपके साथ है !!
यकीन जनिएगा जितनी भी पोस्टे इस विवाद से जुड़ी हुयी आई है वो सब एक तरफ और फेसबूक पर मचाई जा रही छीछालेदर एक तरफ ... मुझे यकीन है फेसबूक पर जो भी हो रहा है केवल निजी द्वेष के कारण किया जा रहा है ... बाकी जितनी भी बड़ी बड़ी बातें वहाँ की... गयी है केवल दिखावा है ! नए लोग बहुत प्रभावित होंगे उनके इस कारनामे से ... पर ब्लोगिंग के इन 3 सालों मे मैं बखूब जान गया हूँ कौन कितने पानी मे है ! इन जैसे लोगो को सिर्फ प्रचार चाहिए ... जैसे भी मिले ! वंदना जी की पोस्ट का विरोध करने वाले यह अलबेला जी की पोस्ट का समर्थन करते है ... मज़े की बात यह उनको 'नंगई' से दिक्कत है जो फेसबूक पर खुद अपनी नंगी फोटो चिपका कर लोगो की राय पूछते है ! बहुत हुआ ... सुधार जाओ ... GET WELL SOON !
@रविकर फैजाबादी
आपका यह कमेंट आपकी पोस्ट पर देख लिया था ... गनीमत है इस से पहले आपकी पोस्ट पर कोई धमाल होता ... आपने वहाँ लगाया चित्र बदल लिया !
मुझे नहीं लगता की इसमें कोई अश्लीलता हैं ...एक कवित्री ने अपने एहसास पिरोकर सच्चाई व्यक्त की हैं जिस सच्चाई से हम सब परिचित हैं तो इसमें नग्नता कहा से आ गई -- और जब पहले ही लिखा जा चूका हैं की "विषय बोल्ड हैं" तो उन तथाकथित शरीफों को पढना ही नहीं था ...हा, यह बात अलग हैं की वो खुद ऐसे विषयों को खोजते फिरते हो ...सॉरी .ऐसे मानसिकता वाले लोगो की कथनी और करनी से मुझे एतराज हैं .. वंदना जी को एक बार फिर धन्यवाद !
अविनाश जी की भाषा पर बहुत ही आश्चर्य हो रहा है ये वही अविनाश जी है ना जिन की एक पोस्ट पर मैंने ये पोस्ट लिखी थी |
http://mangopeople-anshu.blogspot.in/2010/11/mangopeople_29.html
http://avinash.nukkadh.com/2010/11/blog-post_28.html
शायद अविनाश जी वो पोस्ट भूल गये है और ये भी भूल गये है की आप अपना विरोध किसी शालीन तरीके से भी रख सकते है | कोई फेस बुक पर उन्हें ये लिंक भेज दे मै वहा उनकी फ्रेंड लिस्ट में नहीं हूं |
आपकी बातों से सहमत हूं।
मैं भी भर्त्सना क्रता हूं, वंदना जी के ऊपर व्यक्तिगत रूप से आक्षेप करने वालों का।
वंदना जी की उक्त कविता में कुछ शब्दों से तो एतराज़ हो सकता है किन्तु कविता का कथ्य तो गंभीर और शाश्वत था. किन्तु कुछ लोग स्वयं को हिंदी ब्लॉग्गिंग को अपनी जागीर और ज़मीदारी समझते हैं...उन्हें एतराज़ है... फेसबुक पर तो जिस तरह से इस मसले को उठाया गया वह तो वाकई निन्दनीय है... किसी को रचना से एतराज़ हो सकता है किन्तु व्यक्तिगत रूप से अपमानित करने का अधिकार नहीं है... वंदनाजी से अनुरोध है कि वे अपने लेखन को इतना ऊँचा उठायें कि आलोचना पत्थर के नीचे सूखे हुई दूब हो जाये...
http://indianwomanhasarrived.blogspot.in/2012/04/blog-post_07.html
saahitya ko samjhnae kae liyae saahitya kaa gyaan honaa bhi jaruri haen
http://chitthacharcha.blogspot.in/2009/12/blog-post_31.html
yae hindi blog jagat mae pehli baar nahin ho rahaa haen
par is baar galat kaa pratikaar bhi saath saath chal rahaa haen daekh kar bahut khushi hui haen
"यकीन जनिएगा जितनी भी पोस्टे इस विवाद से जुड़ी हुयी आई है वो सब एक तरफ और फेसबूक पर मचाई जा रही छीछालेदर एक तरफ ... मुझे यकीन है फेसबूक पर जो भी हो रहा है केवल निजी द्वेष के कारण किया जा रहा है ..."
शिवम मिश्रा जी के इस कथन पर एक लाईक फेसबुकिया अंदाज में मेरी तरफ से तो बनता ही है. जो कुछ भी वहाँ हो रहा है उस पर मेरा भी यही मानना है.
aap sab kee bhavna ka aadar karta hun. har baat ke baad do baat hoti hai... ek positive aur ek negetive... har vyakti ke alag sonch hote hai... kisi ko achhi lagti hai kisi ko buri... achhi baaton ko hum saharsh sweekarte hai to burayi ko bhi pachane kee kshamta honi chahiye...
Mahfooj ji ka blog dekha... unse bilkul bhi sahmat nahi hun.. ek sahitykaar aise shabdon ka prayog karein to atpata sa lagta hai... mahfooj ji ko apni post ke liye comments kholne chahiye... unhe logon kee pratikriya se darr kyon lag raha hai... vandana ji ka support maine bhi kiya hai par is tarah se gaaliyon ka, dhamkiyon ka prayog to vandana ji khud bhi nahi pasand karengi... ek padhe-likhe vyakti par ye shobha nahi deta... baaki apne naye post par milta hun... wahan iski vistaar se charcha karunga...
अभिषेक जी की बात से मैं भी सहमत हूं। विरोध या समर्थन संयमित भाषा में ही होना चाहिए। असभ्य और अभ्रद भाषा का उपयोग क्योंकर वांछनीय है। अगर ऐसा सब चलता रहा तो कपिल सिब्बल साहब की इस बात से हर कोई सहमत हो जाएगा कि सोशल नेटवर्किंग पर लगाम कसने की जरूरत है।
arun jee ke baato se sahmat... haam aam jindagi se jude hue log, koi professional kavi to hain nahi... apni soch ko likhte hain bas.. kisi ko post pe aitraaj ho sakta hai.. to post ke liye likhe na ... naki post karne wale ki chhichhaledaar kare...! ham sab ki apni niji jindagi me ek ijjat hai, ... kisi me itti kuwwat nahi ki koi hamare par personal comment kare.. agar karta hai to ham bloggers me hi itni unity honi chahiye ki usko nikal bahar karen...!!
मैं मानता हूँ कि जिस तरह इसका (कविता से ज्यादा कवयित्री का) विरोध हुआ वो गलत था. विरोध किसी विचार का हो सकता है व्यक्ति का नहीं. जैसा मैंने पहले भी कहा है हर व्यक्ति की अपनी सोंच और विचार होते है. विचार से अगर मर्यादा उलंघन होने का खतरा मंडरा रहा था तो उस विचार का विरोध होना चाहिए था मगर शांत और मर्यादित तरीके से. और अगर इसका विरोध हुआ भी गलत तरीके से तो बदले में दुसरे लोगों को भी इसका अश्लील, अमर्यादित जवाब देना कहाँ तक उचित था? कोई व्यक्ति अगर आप पर कीचड़ उछल रहा है तो क्या बदले में आपको भी कीचड़ में उतर जाना चाहिए? विरोध जब उत्तपन हुआ था तो कवयित्री को भी खुले मंच पर अपनी बात रखनी चाहिए थे न कि किसी ग्रुप या लौबी का इस्तेमाल अपने निजी द्वेष को निकालने में करना चाहिए था....
और रही बात मुकेश जी की किसी को किसी जगत से बाहर निकालने की तो इसका अधिकार हममें से किसी को नहीं. कोई जरूरी नहीं कि जिन्हें हम पसंद नहीं करते उन्हें दुसरे भी पसंद नहीं करेंगे... आप सबमें से ही किसी ने कहा था कि ब्लॉग किसी की जागीर नहीं... आलोचनाओं के लिए हमेशा तैयार रहिये... और अगर हमेशा मीठे फल खाने का ही शौक है सभी लेखक जनों को तो मीठे बोल ही सुनाइये और समाज में पच सकने लायक शब्दों का ही इस्तेमाल कीजिये... कुछ अलग होगा तो प्रतिक्रिया तो होगी ही... एक ही पल में हम समाज की तस्वीर तो नहीं बदल सकते...
वंदना जी को भी लोगों ने अश्लीलता का ताना दे दे कर परेशान कर डाला था.
भाई किसी को अपने मन का कुछ कहने भी दोगे या नहीं ?
अश्लीलता का निर्धारण किस पैमाने से किया जाए ?
किसी बात को एक अश्लील कहता है तो दुसरा उसे कला बताता है.
इस मुददे पर आपकी इस सुंदर सी पोस्ट का लिंक यत्र तत्र मिल जाता है।
धन्यवाद !
जिनमे थोड़ी सी भी समझदारी और सामाजिक-लेखकीय जिम्मेदारी होगी. वो, अरुण चंद्र राय जी की बातों से इत्तेफाक रखेंगे. कुछ ब्लागर मित्रों ने तो ब्लॉग को अपनी निजी जागीर ही समझ रखा है, जिसके माध्यम से अपनी उबकाई, और न जाने कितनी फालतू के साडे-गले सामग्री को परोसने में जज्जा भी नहीं महसूस करते, उन्हें इश्वर बुद्धि दे, कि कुछ समझदारी से इस सुविधा का लाभ लोगों को देने में मदद करें,
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