मैं कौन हूँ? ये एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब २७ सालों के बाद भी मैं नहीं ढूंढ़ पाया हूँ... पर यकीन मानिए रोज कोशिश करता हूँ इस जवाब को ढूंढने का. आखिर मेरा क्या अस्तित्व है... मैं कौन हूँ??? मैं रोज सुबह इसलिए नहीं जागना चाहता कि मुझे उठ कर ऑफिस जाना है, रात को इसलिए नहीं सोना चाहता कि सुबह ऑफिस जाने के लिए उठना है... मैं सोना चाहता हूँ खुद के लिए, जागना चाहता हूँ खुद के लिए... कुछ ऐसा करना चाहता जिससे मुझे ख़ुशी मिले, संतुष्टि मिले, जिस काम को कर मेरा दिल खुश हो... जिससे मुझे गर्व की अनुभूति हो...
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बृहस्पतिवार, 22 मार्च 2012

क्योंकि हम सब इसी लायक है...

बजट आ गया... पेश हो गया... पारित भी... और हम पर लाद भी दिया जायेगा... हर बार की तरह सरकार ने अपना बोझ हम पर लाद दिया... पहले से ही देश की खराब अर्थ-व्यवस्था का बोझ हम अपने सिर पर उठा ही रहे है अब और बोझ लाद कर सरकार ने हमारी कमर तोड़ने का पूरा इंतजाम कर दिया है... सरकार की नियत का पता तो हमें पिछले पैंसठ सालों से है पर मुझे ये समझ में अभी तक नहीं आया कि हम लोगों की नियत को क्या हो गया है. पिछले पैंसठ सालों में क्या हमने दर्द, मजबूरी और बेइंसाफी को अपने अन्दर ढाल लिया है? १९४७ से पहले हमें कुछ बाहरी लुटते थे... आज उनसे कम संख्या में मौजूद हमारे ही अपने लुट रहे है. आजादी से पहले लुटेरों से लड़ने के लिए गांधी जी, सुभाष जी, भगत सिंह जी, चंद्रशेखर जी, लाला जी, नेहरु जी और न जाने कितने अनगिनत लोग थे और उनके पीछे सारा हिन्दुस्तान था... पर आज कोई एक भी नहीं आवाज उठाने के लिए... क्या हो गया है हमें?

पहले एक गाँधी, एक लालाजी देश के लिए चलते थे तो उनके पीछे पूरा एक कारवाँ चलता था... उस कारवाँ में देश-भक्त पैदा होते थे... और आज जब कोई जे.पी. अपने कदम उठाते है तो उनके कारवाँ से निकले लोगों को दुनिया जानती है.... आज जब कोई अन्ना हमारे लिए आवाज उठाते है, भूखे रहते है, अपनी जान की परवाह नहीं करते तो हम इसलिए घर से निकल नहीं पाते क्योंकि बाहर ठण्ड बहुत ज्यादा है... कोई घर बैठ के उनकी सराहना करता है तो कोई उन्हें पागल की उपाधि देता है... आज किसी अन्ना को अपना आन्दोलन इसलिए छोड़ना पड़ता है क्योंकि रातों-रात हमारी सरकार अपने फैसले सदन के एक भाग में तो पारित करवा लेती है पर अगले दिन उसे दूसरी सदन में लटका दिया जाता है.... मतलब न वो लोकपाल आये जो जनता की मांग है और न वो जो सरकार का दिखावा है... पर हम कुछ नहीं बोलते... कुछ सौ लोग उस सदन में बैठ हमें उल्लू बना रहे है हम बन रहे है... और वो भी आइस-क्रीम खाते हुए, टीवी देखते हुए और ठहाका लगाते हुए...

आज के युवा (मैं भी खुद को इसमें शामिल मानता हूँ) फेसबुक के अपडेसन से खुश है, हम ये देख के खुश है कि हमारे पोस्ट पर कितने कमेन्ट आये या फिर कितने लोगों ने इसे लाईक किया. पर खुद किसी के लाईक किये जाने के लायक नहीं है. आज लगभग हर दिन किसी न किसी भ्रष्टाचार की खबर मिलेगी, कहीं किसी को लुट लिया जायेगा, कहीं किसी लड़की की अस्मत को नीलाम कर दिया जायेगा... कभी भी कोई बम हमारे चिथडे उड़ा देगा, कभी भी हम भाइयों के बीच ही कोई मस्जिद-मंदिर के नाम पर दंगा करा देगा... कहीं कोई गैस काण्ड होगा और लोग सदियों तक इन्साफ के इन्तजार में मरते रहेंगे... कहीं कोई खेल होगा और लोग घोटालों का खेल खेलेंगे... कहीं नेता सदन में बैठ पौर्ण-मूवी देखेंगे... और हम ब्लॉग पर लिख कर - फेसबुक पर अपडेट करके ही खुश हो जायेंगे...

बचपन से सुना और पढ़ा है कि ये लोकतंत्र है... लोगों ने तो यहाँ तक कहा कि हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश है... पर इस लोकतंत्र को मैंने कभी महसूस नहीं किया... किस बात का लोकतंत्र है? किस बात की स्वतंत्रता है? कहने के लिए वोट तो डालते है पर नेता चुनने का अधिकार हमें नहीं है... राजनितिक दल लाख हल्ला मचाते है फिर किसी अपराधी को उम्मीदवार घोषित कर देते है... हम मजबूर है कि दस अपराधियों में से किसी एक को अपना लीडर चुन ले... ये है हमारी स्वतंत्रता? रातों-रात किसी घरेलु महिला को किसी राज्य का मुख्य-मंत्री बना दिया जाता है... ये है स्वतंत्रता? जिसे लोगों ने चुना तक नहीं उसे हमारे देश का प्रधान-मंत्री बना दिया जाता है... ये है स्वतंत्रता? और क्या यही हमारी लोकतांत्रिकता? मुझे तो लोकतंत्र कम और नेताओं का तंत्र-मन्त्र ज्यादा नजर आता है... हम कुछ जानना चाहेंगे पर जान नहीं सकते... हम अपने ही नेताओं से, प्रतिनिधियों से जवाब नहीं ले सकते... ज्यादा कोशिश किया तो हड्डियां तोड़ दी जाएँगी... हमेशा के लिए धरती के छः फुट नीचे या चिता के ऊपर लिटा दिया जायेगा.... यही है स्वतंत्रता? मुझे लगता है इससे ज्यादा स्वतंत्र तो हम १५ अगस्त १९४७ से पहले थे...

एक हमारी सत्ता पक्ष की पार्टी है... एक हमारे प्रधान-मंत्री है... देश में कुछ भी हो जाये वो कुछ न बोलते है और न करते ही है... हालिया घटना संक्षेप में बताऊंगा... हमारे अभी-अभी सत्ता से हटाये गए रेल-मंत्री साहब ने रेल बजट पेश किया... किराया बढा दिया... उन्ही कि पार्टी अध्यक्षा ने उनकी आलोचना की पर हमारे प्रधान मंत्री जी चुप रहे... शनिवार को रेल-मंत्री जी ने इस्तीफा दे दिया... रेल-मंत्री जी का कोई जवाब नहीं... एक छोटा सा सवाल कि आखिर दिनेश त्रिवेदी जी को रेल-मंत्री पड़ से क्यों इस्तीफा देना पड़ा? अगर रेल-बजट के कारण तो प्रधान मंत्री जी ने वो रेल-बजट वापस क्यों नहीं लिया??? रेल-मंत्री को खारिज किया तो उनके बनाए बजट को क्यों नहीं??? इसका सीधा सा मतलब है देश को बेवकूफ बनाया जा रहा है... और बेवकूफ बना भी कौन रहा है जो इस पुरे देश का लीडर है, अगुआ है... हमारा ऐसे लीडर जिसे हमने नहीं चुना था, एक ऐसे लीडर जो किसी भी सदन का सदस्य तक नहीं थे... एक ऐसे लीडर जिनके बारे में देश जनता है कि वो पंजाब प्रांत के निवासी है पर उन्हें पंद्रह सौ किलोमीटर से भी ज्यादा दूर असम प्रांत से राज्य-सभा का सदस्य बना दिया जाता है... एक ऐसा प्रांत जहाँ उन्होंने शायद ही अपने जीवन का कोई समय गुजारा हो...

एक हमारी विपक्ष है जिन्हें खुद लड़ने से फुर्सत नहीं मिलती... एक ऐसा विपक्ष जिसके सदस्यों को घर में समय नहीं मिल पाता तो सदन में बैठ कर पूर्ण-क्लिप देख लेटे है... एक ऐसा विपक्ष जो अपनी ही बातों पर कायम नहीं रह पाता... जो जनता के सामने अपनी बात सही रूप से नहीं रख पाता... हालिया घटना का उदाहरण देता हूँ जब लोकपाल पर घमासान छिड़ा हुआ था तो ये पार्टी अपनी बात तक खुल के नहीं बोल रही थी ताकि उसके ऑप्सन भी बचे रहे... इसे कहते है बेवकूफ बनाना... ये हमारे देश का एक ऐसा विपक्ष है जिसके पास दिखाने को एक चेहरा भी नहीं है... अभी-अभी उत्तर-प्रदेश में चुनाव हुए... पूरी चुनाव ख़त्म पर इन्हें खुद नहीं पाता था कि अगर गलती से ये जीत भी गए तो कौन इनका लीडर होगा... एक ऐसा विपक्ष है ये जिसकी बिहार में सहयोगी पार्टी (या शायद ये बिहार में सहयोगी पार्टी है) उत्तर-प्रदेश में इनके साथ खड़ी नहीं होती है... एक ऐसा विपक्ष जिसके उत्तराखंड के मुख्य-मंत्री चुनाव हार जाते है... ये ऐसा विपक्ष है जिसके नेता कर्नाटक में अपनी गद्दी के लिए लड़ते है... एक ऐसा विपक्ष जो भगवान का घर (भले वो किसी और धर्म का हो) तोड़ कर खुश होते है और गर्व करते है जैसे उन्होंने कोई बहुत बड़ा काम कर लिया था... मैं जानता हूँ ये भीड़ का काम था और भीड़ को सजा नहीं होती पर हमारे क़ानून को भीड़ के चेहरे को सजा देनी चाहिए थी... सबको पता है वो कार-सेवक किस पार्टी से सम्बन्ध रखते थे और उस पार्टी के मुखिया कि नैतिक जिम्मेदारी बनती थी उस पुरे प्रकरण की जिम्मेदारी लेनी की.... ये हमारे ऐसे विपक्ष है जो सालों तक एक अपराधी नेता का जमकर विरोध करते है, तब तक जब-तक वो दूसरी पार्टी में है... और जैसे उसने पार्टी छोड़ी उसे गले लगाकर स्वागत करते है ये कहते हुए कि उसकी छवि साफ़ है... कहाँ है नैतिकता?

जैसा कि मैंने अपने पिछले पोस्टों में भी कहा है, दो साल लगभग होने वाले है कॉमनवेल्थ खेल को और उसमें हुए घोटाले को... कौन जिम्मेदार है इन सबका? सरकार अपने ही पार्टी के मंत्री से पैसे वापस लेने के लिए कोई कदम क्यों नहीं उठाती? २जी घोटाले को उजागर हुए भी अब तो बहुत समय हो गया... हमारी ही अदालत ने इसके बनते लायसेंस को खारिज कर दिया... सरकार पैसे निकलवाने के लिए कोई कदम क्यों नहीं उठाती? देश की अर्थ-व्यवस्था खराब है, जनता पर बोझ डालना जरूरी है... फिर सरकार नेताओं पर भी बराबर बोझ क्यों नहीं डालती? नेताओं के खर्चों में, उनको मिलने वाली सुविधाओं में कटौती क्यों नहीं होती? देश की अर्थ-व्यवस्था का इतना ही बुरा हाल है तो चुनाव प्रचार के नाम पर करोडो का खर्च क्यों हो जाता है और जनता को बताया भी नहीं जाता कि वो पैसे आये कहाँ से... ये सारे वही काले धन है जो जनता से चुराए गए है... बड़ी आसानी से लोगों ने हमारे धन को काला कर लिया... देश की अर्थ-व्यवस्था भी चरमरा रही है... फिर उस काले धन को लाने के लिए सरकार कोई कदम क्यों नहीं उठाती?

और हम.. चुप-चाप अपनी बर्बादी का तमाशा देख रहे है... हमें तो मजा आता है अपने ही देश में विदेशी संस्कृति और भाषा का इस्तेमाल करने में... अपनी संस्कृत और अपने लोगों का मजाक उड़ाने में... हमें मजा आता है फैशन के नाम पर नंगा नाच नाचने में... हमें मजा आता है मनोरंजन के नाम पर अश्लीलता परोसने और देखने में... हमें मजा आता है चुपचाप लोगो पर अत्याचार होते देखने में और जब खुद पर अत्याचार हो तो दोष देने में... हमें मजा आता है शराब के नशे में सिगरेट के धुंए उड़ाने में... हमें मजा आता है सचिन के शतक में भले टीम हार जाये... हमें एक आई पी एल में करोड़ों खर्च करने में मजा आता है बजाय उस राशि का दस प्रतिशत भी देश विकास पर खर्च करने के... हमें तब मजा आता है जब कोई फिल्म-स्टार किसी क्रिकेट टीम को करोड़ों में खरीदता है पर बच्चों के लिए स्कूल और बीमारों के लिए अस्पताल नहीं खोल सकता.. हमें तब मजा आता है जब एक शो पर हमें अनजान से पोर्न-स्टार को दिखाया जाता है... हमें मजा आता है अपनी ही बर्बादी पर... और मुझे मजा आता है अपने देश की को बर्बाद होते हुए देखने में... क्योंकि हम सब इसी लायक है...

3 कुछ आपकी खामोशी:

kshama ने कहा…

Zabardast likha hai! Tippanee to lambi chaudi dena chah rahi thee....sehat aade aa rahee hai!

Peeyush Prasad ने कहा…

hame maja aata hai tumahara blog padhne me.
peeyush prasad

मनोज कुमार ने कहा…

विचारोत्तेजक।

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