मैं कौन हूँ? ये एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब २७ सालों के बाद भी मैं नहीं ढूंढ़ पाया हूँ... पर यकीन मानिए रोज कोशिश करता हूँ इस जवाब को ढूंढने का. आखिर मेरा क्या अस्तित्व है... मैं कौन हूँ??? मैं रोज सुबह इसलिए नहीं जागना चाहता कि मुझे उठ कर ऑफिस जाना है, रात को इसलिए नहीं सोना चाहता कि सुबह ऑफिस जाने के लिए उठना है... मैं सोना चाहता हूँ खुद के लिए, जागना चाहता हूँ खुद के लिए... कुछ ऐसा करना चाहता जिससे मुझे ख़ुशी मिले, संतुष्टि मिले, जिस काम को कर मेरा दिल खुश हो... जिससे मुझे गर्व की अनुभूति हो...
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मंगलवार, 20 मार्च 2012

इक सपना जिसे देखा नहीं मैंने अब तक...



इक सपना हकीक़त बनने वाला है
मेरी अधूरी जिंदगी का...
इक सपना जिसे देखा नहीं मैंने अब तक...
इक सपना जिसे जाना नहीं मैंने अब तक...
वो सपना मेरी जिंदगी में आने वाला है...
वो सपना मेरी जिंदगी ही होने वाला है...
इस सपने को मैंने नहीं देखा...
बस मुझे कह दिया गया कि ये तुम्हारा सपना है...
सपने बुने किसी और ने...
सपने चुने किसी और ने...
और अचानक उसे मेरे नाम के साथ जोड़ दिया गया...
मैं ये नहीं कह सकता कि सपना बुरा है...
मैं ये भी नहीं कह सकता कि सपना अच्छा है...
वो तो ऐसा सपना है जिसे मैंने देखा ही नहीं अब तक...
शायद वो सपना हसीन होगा...
शायद वो सपना मेरे दिल के करीब होगा...
शायद वो मुझसे ज्यादा मेरे लिए अहमियत रखेगा...
पर अभी तो मैं कुछ नहीं कह सकता उस सपने के बारे में...
क्योंकि उस सपने को देखा नहीं है मैंने अब तक...
मेरी अधूरी जिंदगी का एक अनचाहा सपना है...
मेरी अँधेरी जिंदगी का इक सुहाना सपना है...
मैं तो सपने देखने की हालात में भी नहीं था...
मैं तो आधा सोया आधा जगा हुआ था...
सपने देखने की इच्छा अभी-अभी तो मरी थी मेरी...
अभी-अभी तो सपनो से दूर किया था खुद को...
बल्कि कोशिश ही कर रहा था दूर होने कि अपने सपनों से...
और अचानक नियति ने मेरी आँखों के लिए एक सपना बुन दिया...
इक ऐसा सपना चुन दिया मेरी आत्मा के लिए...
जिसे देखा नहीं मैंने अब तक...
इक सपना जिसे जाना नहीं मैंने अब तक...


फोटो हर बार की तरह गूगल देवता की कृपा से. इसी तरह कृपा बनाये रखे गूगल देव हम तुच्छ इंसानों पर.

1 कुछ आपकी खामोशी:

रविकर ने कहा…

बढ़िया प्रस्तुति |
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