मैं कौन हूँ? ये एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब २७ सालों के बाद भी मैं नहीं ढूंढ़ पाया हूँ... पर यकीन मानिए रोज कोशिश करता हूँ इस जवाब को ढूंढने का. आखिर मेरा क्या अस्तित्व है... मैं कौन हूँ??? मैं रोज सुबह इसलिए नहीं जागना चाहता कि मुझे उठ कर ऑफिस जाना है, रात को इसलिए नहीं सोना चाहता कि सुबह ऑफिस जाने के लिए उठना है... मैं सोना चाहता हूँ खुद के लिए, जागना चाहता हूँ खुद के लिए... कुछ ऐसा करना चाहता जिससे मुझे ख़ुशी मिले, संतुष्टि मिले, जिस काम को कर मेरा दिल खुश हो... जिससे मुझे गर्व की अनुभूति हो...
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सोमवार, 6 फरवरी 2012

जीत किसकी होगी...


अपने पिछले ही पोस्ट में लिखा था मैंने... " इच्छा, उत्साह और वजह.... जब तीनों में से एक भी कम हो तो व्यक्ति किसी भी काम को अंजाम नहीं दे सकता..." और इसी पंक्तियों का हवाला देते हुए मैंने न लिखने की वजह बताई थी... पर न जाने क्यों इन तीनो में से एक भी न होते हुए भी अन्दर कुछ है जो हर वक़्त लिखने के लिए मजबूर करता है... रात बेचैनी और छटपटाहट में गुजर जाती है कि मन के भावों को मैं कागज़ पर उतार क्यों नहीं रहा... पता नहीं क्या है ये? बहुत कोशिश के बाद मैं इसे सिर्फ एक द्वन्द का ही नाम दे पा रहा हूँ... दिमाग न लिखने के लिए तैयार है तो मेरा दिल लिखने की छटपटाहट में समय गुजार रहा है... और मैं इन दोनों के बीच एक पेंडुलम सा झूल रहा हूँ...

मैं अपनी जिंदगी को ही समझ नहीं पाता हूँ... जब किसी अच्छे समय से गुजर रहा होता हूँ... खुशियों से झूम रहा होता हूँ तो अचानक कहीं से दर्द का एक बादल उड़ता हुआ आता है और गम की बारिश में भींगो देता है... मेरे समय की आंधी मुझे सबके बीच से कहीं दूर किसी बियाबान में उडा ले जाती है और अकेलेपन के सागर में अपनी ही तन्हाईओं से लड़ने के लिए छोड़ देती है... जब इन सबसे लड़ने की उबरने की कोशिश करता ही रहता हूँ तभी न जाने कहाँ से फिर एक नया लम्हा, एक नयी दुनिया और एक नया हालात मेरे सामने लाकर खड़ा कर दिया जाता है इस उम्मीद से कि मैं निःशब्द, बिना किसी रोष, बिना किसी सवाल के उसे अपना लूँगा... और ऐसा करना भी पड़ता है... क्योंकि जहाँ मैं कुछ बोलने के लिए अपने लैब हिलाता हूँ मैं गलत हो जाता हूँ... अपने अतीत के कारण आज हालात ऐसे हो गए है कि अपने ही भविष्य के लिए मैं अपना विचार, अपनी सोंच तक लोगों को नहीं बता सकता... मैंने जिंदगी में सोंचा था कि खूब तेज दौडूंगा... पर जिंदगी मुझे दौड़ने का तो दूर ठीक से चलने का मौका भी नहीं दे रही... बस लाद्खादा रहा हूँ... एक कदम बढा का जब तक खुद को संभालने की चेष्टा करता हूँ दूसरा कदम खुद आगे की ओर बढ़ जाता है या दूसरों के द्वारा बढा दिया जाता है...

खैर ये तो रही मेरी भ्रमित जिंदगी... जिससे मुझे पता है किसी को कोई सरोकार नहीं (कृपया बुरा न माने)... बस मन की कशमकश थी जो आप लोगों के साथ बाँट दी... अभी तो अपने ही द्वन्द में अपने दिल और दिमाग से और लड़ना है... पता नहीं जीत किसकी होगी...

2 कुछ आपकी खामोशी:

kshama ने कहा…

मैं अपनी जिंदगी को ही समझ नहीं पाता हूँ... जब किसी अच्छे समय से गुजर रहा होता हूँ... खुशियों से झूम रहा होता हूँ तो अचानक कहीं से दर्द का एक बादल उड़ता हुआ आता है और गम की बारिश में भींगो देता है...
Yahee to zindagee hai! Kaun samajh paya hai?

केवल राम : ने कहा…

यही कशमकश तो जिन्दगी को बेहतरी की और ले जाती है बस हमें अपनी आँखों को खुला रखना होता है और सही निर्णय लेकर आगे बढ़ना होता है ...!

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