आप सबने मेरी ख़ामोशी में बड़ी ख़ामोशी से साथ दिया है... मेरी खामोश हौसला-आफजाई की है... हमेशा खामोश मार्गदर्शन किया है... पर आज मैं अपनी सारी ख़ामोशी तोडना चाहता हूँ... हमेशा के लिए... हाँ, हमेशा-हमेशा के लिए... आज पहली बार मैं कुछ शोर करना चाहता हूँ... उम्मीद है मेरी कलम से अभी निकलने वाली आखिरी पंक्तियाँ आपको पसंद आएगी...
एक काली अँधेरी रात...
एक ऐसी रात जो ख़त्म होने का नाम ही न ले रही थी
अँधेरा पल-दर-पल बढ़ता जा रहा था
अँधेरा कुछ घंटों का नहीं सालों का
पर अचानक एक दिन कुछ अलग हो गया
कुछ ऐसा जिसकी उम्मीद मैंने कब की छोड़ दी थी
कुछ ऐसा जिसकी उम्मीद तो उम्मीद ने भी नहीं कि थी
पर हुआ, होना था और हुआ...
अँधेरा ख़त्म हो रहा था
दूर से एक रौशनी पास आती नजर आ रही थी
मेरी अँधेरी रात के बाद सहर आ रहा था
एक चमकीला, सुहाना, खुबसूरत सहर...
आँखें चुन्धियाँ रही थी इतने सालों के अँधेरे के बाद
विश्वास ही नहीं हो रहा था...
बार बार खुद को ही जगा रहा था...
पर ये तो हकीक़त था... कोई सपना नहीं...
एक हसीन हकीक़त... किसी खवाब से भी ज्यादा हसीन...
पहले सुनहला सवेरा... और फिर
समय-दर-समय बढ़ता जीवन का उजाला...
दुखों ने डर से पीछा छुड़ा लिया मुझसे...
और उजाले में खुशियाँ लिपट पड़ी मुझसे..
जिन आँखों ने आंसुओं की नमी महसूस कि थी
उन्होंने सपनो की बारिश में भीगना शुरू किया
जिस आत्मा ने अकेलेपन का बोझ उठाया था सदा
उसने प्यार की भीड़ में पाया खुद को...
हर पल के साथ जीने की उम्मीद बढती गयी...
चाहत बलवान होती गयी... वजह गहराती चली गयी...
जिंदगी से प्यार बढ़ता गया...
आगे और आगे बढ़ने को कदम मचलते रहे...
मन समुन्दर की असीम गहराई में ख़ामोशी पाता रहा...
रौशनी बढती रही... अँधेरा ख़त्म हो चूका था...
जिस रौशनी की चाहत की थी वो मेरे पास था..
पर अचानक फिर कुछ हुआ... कुछ ऐसा
जिसकी कल्पना नहीं कि थी इन आखों ने...
हाँ अँधेरा नहीं माँगा था मैंने...
हाँ जीवन भर का उजाला माँगा था मैंने...
पर जिस रौशनी को जिंदगी मान रहा था
वो तो काली अँधेरी रात से भी ज्यादा काली
और मौत से भी ज्यादा दर्दनाक निकली...
एक उजाला हमेशा के लिए मेरे साथ बाँध गयी...
उजाला दर्द का... उजाला आंसुओं का...
सहर मेरी मौत का...
सहर अकेलेपन का...
रौशनी मांगी थी मैंने... पर किस कीमत पर?
अपनी जिंदगी, खुशियों और आत्मा की कीमत पर तो बिलकुल भी नहीं...
उजाला रहे हमेसा पास मेरे... इसके लिए
उस रौशनी ने मेरी आत्मा को ही जला दिया...
धू-धू कर अल रही है आत्मा मेरी...
आग की लपटों से सच सब ओर उजाला है...
इतना उजाला की मेरी आँखें चुन्धियाँ रही है...
जैसे-जैसे आत्मा की आग तेज होती जा रही है
खुशियाँ मर रही हैं
जिंदगी साथ छोडती जा रही है...
और मैं चुपचाप खड़ा सिर्फ देख रहा हूँ...
क्योंकि कभी मैंने ही कहा था...
ख़ामोशी... बहुत कुछ कहती है...
मैं नहीं जानता कि मैंने अभी क्या लिखा है, मुझे नहीं पता मैंने कैसा लिखा है... पर जो भी लिखा है आखिरी बार लिखा है... जानता हूँ आप में से कुछ लोग मुझे लिखते रहने के लिए फिरसे प्रोत्साहित कीजियेगा... पर लिखने के लिए आत्मा की जरुरत होती है, जो अभी जल रही है राख होने के लिए... लिखने के लिए मन की जरुरत होती है जो मर चूका है अब... लिखने के लिए किसी वजह की जरुरत होती है जो ख़तम हो चुकी है अब... मैं जानता हूँ मैं बहुत कमजोर हूँ, मुझे पता है मैं कायर हूँ... आज के बाद मैंने न लिखने की कसम खायी है... हाँ, ये सच है कि मैं कमजोर हूँ पर यकीन मानिए मेरी कसम नहीं... आप सबने मेरा बहुत साथ दिया है.. उसके लिए आप सबका बहुत बहुत शुक्रिया... आप सबके जीवन की बेहतरीन कामना के साथ...
अभिषेक प्रसाद
मो. 9818314678










8 कुछ आपकी खामोशी:
आप की ही मर्जी है अभिषेक जी ... आज जब इन्हें आप आखिरी बार कह रहे या कल जब भी लिखना चाहें ना चाहे vishraam bhi liya jaa sakta hai..
शादी करनी चाहिए या नहीं?
Ise aakharee baar na kahen...yun kahiye ki ek break le rahe hain....break ke baad phir milenge.Anek shubh kamnayen!
च में ख़ामोशी बहुत कुछ कहती है...प्रभावशाली अभिवयक्ति......
बहुत सुंदर रचना ..बधाई,...
मेरी नई पोस्ट ,....देखे ..
नयनों में जब होतीं बातें, क्या समझोगे ऎसी बातें
हर भाषा में होतीं बातें, कुछ सच्ची कुछ झूठी बातें
हार की बातें जीत की बातें, गीत और संगीत की बातें
ज्ञान और विज्ञान की बातें, हर मौसम पर करते बातें
आज चली कुछ ऐसी बातें, बातों पर हो जाएँ बातें
मै कोन हूँ? आपके इस सवाल का जवाब है कि आप बहोत ही कमाल के लेखक है From Great talent
khamoshi ko mukhar karti sundar rachna aur aalkeh..
उम्दा रचना लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! बधाई!
मेरे नये पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/
http://seawave-babli.blogspot.com/
sabse pahle rachna ke bare me kahun to bahut hi umda likha hai....
ab jahan tak andhero aur ujalo ki baat hai to andhero aur ujalo ka silsila chalta rahta hai...agar kabhi ye lage ki andhera khatm nhi ho raha to niyti ke bharose na baithkar khud ujalo ka nirmaan kijiye..sach ye mushkil nahi...mera anubhav hai...aap kyon likhna chod rahe hai ye nhi pata..par ye kisi bhi samasya ka samadhan nhi ..balki main to ye kahungi ki shayad lekhan hi andhere se ladne ki shakti de sakta hai...
एक टिप्पणी भेजें