मैं कौन हूँ? ये एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब २७ सालों के बाद भी मैं नहीं ढूंढ़ पाया हूँ... पर यकीन मानिए रोज कोशिश करता हूँ इस जवाब को ढूंढने का. आखिर मेरा क्या अस्तित्व है... मैं कौन हूँ??? मैं रोज सुबह इसलिए नहीं जागना चाहता कि मुझे उठ कर ऑफिस जाना है, रात को इसलिए नहीं सोना चाहता कि सुबह ऑफिस जाने के लिए उठना है... मैं सोना चाहता हूँ खुद के लिए, जागना चाहता हूँ खुद के लिए... कुछ ऐसा करना चाहता जिससे मुझे ख़ुशी मिले, संतुष्टि मिले, जिस काम को कर मेरा दिल खुश हो... जिससे मुझे गर्व की अनुभूति हो...
मुझसे संपर्क साधना बहुत आसान है... ab8oct@gmail.com पर मेल कर सकते है, http://ab8oct.blogspot.com/, http://humarinayisubah.blogspot.com/ पर मेरे विचारों को पढ़ सकते है....
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रविवार, 20 नवम्बर 2011

एक गर्दन की दास्ताँ...

आज हाजिर हूँ आप सबके सामने... रविवार का दिन है.. फुर्सत ही फुर्सत है... कुछ ही देर पहले सोकर उठा हूँ... रात १ बजे सोया था और ठीक आधे घंटे बाद एक बुरी खबर ने नींद उड़ दी... मेरे साथ ही काम करने वाले एक लड़के, विजय सिंह, का कल शाम ऑफिस से लौटते वक़्त एक्सिडेंट हो गया... हालात नाजुक तो नहीं है पर फिर भी चोटें ज्यादा है... दुआ करता हूँ कि जल्द पूर्ण रूप से स्वस्थ होकर वो हम सबके बीच होगा.... चलिए अब सबको एक दास्ताँ सुनाता हूँ... हाँ वही जिसकी घोषणा मैंने अपने पिछले पोस्ट में की थी.... एक गर्दन की दास्ताँ... पढकर आप लोग सेंटी मत होइएगा और न अपना और न मेरा गर्दन दबाईएगा...

उसी दिन की बात है, जिस दिन अपने टूटे हाथ पर ख़ुशी और दुसरे बचे हाथ के लिए दुःख मना रहा था... अचानक मेरी गर्दन तुनक गयी कि उसे मैंने क्यों अनदेखा किया... समझ में ही नहीं आया कि दो हाथों की कहानी के बीच ये मुई गर्दन की दास्ताँ कहाँ से आ गयी... बड़े प्यार से अपनी गर्दन को सहलाते हुए पूछा पर कमबख्त गर्ल-फ्रैंड से ज्यादा नखरे दिखा रही थी... इतनी खुशामद तो मैंने कभी किसी की नहीं की... आ गया गुस्सा मुझे, पकड़ ली गर्दन अपनी और जोर से दबाते हुए पूछा तब जाकर साली ने मिमियाते हुए जवाब दिया... 

गर्दन... "अभिषेक तुम्हे अपने बांये हाथ के आराम की ख़ुशी है, दाहिने हाथ के दुगने बोझ हो जाने का दुःख भी है... पर मेरा कौन सोंचेगा?"
मैं... "तुम्हारा??? तुम्हे क्या हुआ? तुम्हे कौन सी चोट लगी है?"
गर्दन... "मेरे अन्दर चोट लगी है..."
मैं... "पर मुझे तो इसका अहसास नहीं हुआ... ये साला दिमाग भी आज कल बंद पड़ गया है क्या..."
गर्दन... "अरे नहीं दिमाग भैया तो सही काम कर रहे है... दिल दीदी का ध्यान कहीं और है..."
मैं... "हाँ ये तो है... तुम्हारी दिल दीदी तो बस एक ही ख्वाब में डूबी रहती है, न किसी बात का पता है और न ही होश..."
गर्दन... "वो भी क्या करेगी बेचारी, उसकी गलती थोड़े ही है... ये तो आँखों का कसूर है जिन्होंने उसे इस काम में लगा दिया..."
गर्दन... "अभिषेक जी आपने सोंचा है कि आपके हाथ टूटने से सबसे ज्यादा तकलीफ मुझे होने वाली है..."
मैं... "वो कैसे?"
गर्दन... "ये आपका बिगड़ा-लाडला बांया हाथ लटका हुआ तो मुझसे ही रहेगा... एक तो पहले ही मेरे ऊपर भैंस से भी बड़े और भारी दिमाग भैया का बोझ है... और अब ये आधा किलो का हाथ और दो किलो का प्लास्टर का वजन... मेरी तो गर्दन... उफ़ मतलब मैं ही टूट जाउंगी..."
मैं... "अरे हाँ यार... ये तो मैंने सोंचा ही नहीं था..."
गर्दन... "एक तो गलती दिल दीदी की, ध्यान कहीं और था उनका... फिर पैर चाचा का जो संभल नहीं पाए... और उस पर से हाथ भाई, जो छोटी से बात पर टूट कर बैठ गए... फिर सबकी गलती की सजा मैं क्यों भुगतूं?"
मैं... "सब भाई बंधू है तुम्हारे... तुम नहीं देख-भाल करोगी तो और कौन करेगा...?"
गर्दन... "पर हर बार... जुबान बहन कुछ गलती करेगी और लोग मुझे पकड़ लेते है... आँखें गलती करें और लोग मुझे मरोड़ देते है..."
मैं... "अब जुबान और आँखें किसी के हाथ नहीं आते न इसलिए..."
गर्दन... "और हाथ और दिमाग भैया मिलकर कोई गलती करें तो तलवार मेरे ऊपर क्यों लटकती है?"
"......."
गर्दन... "कोई गुनाह हाथ करें और फांसी का फंदा मुझे मिलता है... "
"....."
गर्दन... "क्या हुआ जवाब नहीं है न? पार्टी में अच्छा दिखना हो टाई बाँध देते हो मुझे... कितना सफोकेसन होता है कभी महसूस किया है... चेहरे को सुन्दर बनने के लिए न जाने कितने क्रीम लगा लेते हो... बदन के लिए भी न जाने कितने सुगन्धित साबुन और इत्र हैं आपके पास... पर मेरे बारे में कभी सोंचा... नहीं न?"
मैं... "अब छोडो इन बातों को...."
गर्दन... "क्यों छोडूँ? आपके लाडले को सँभालने के लिए पट्टा मुझे लगा दिया... पट्टे की रगड़ से कितनी जलन होती है मुझे..."
मैं... "तुम तो मुझे शमिन्दा करने लगी अब..."
गर्दन... "क्यों न करूँ? मेरी तो औकात ही नहीं है आपकी नजर में... "
मैं... "औकात कैसे नहीं है... जिसे भी चाहता हूँ, जो भी अजीज है उसे पहले तुमसे ही तो मिलाता हूँ... गले लगा लेता हूँ.."
गर्दन... "बस इतना ही न... और?"
मैं... "एक मिनट रुको... आता हूँ... मेरा फ़ोन बज रहा है..."
गर्दन... "जवाब नहीं है तो फ़ोन का बहाना करके भाग लिए... अब आप ही लोग मेरे दुःख और दर्द का रास्ता बताइये..."

अब आप लोग ही बातों यार... मैं क्या करूँ? ये तो नाराज बैठी है मुझे... कहीं किसी दिन लचक गयी तो लेने के देने पड़ जायेंगे... उससे पहले प्लीज रास्ता बता देना...

10 कुछ आपकी खामोशी:

kshama ने कहा…

Oh...ha,ha,ha!

रश्मि प्रभा... ने कहा…

gardan se baatchit ... bahut achhi lagi , dilchasp

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की जा रही है!
आपके ब्लॉग पर अधिक से अधिक पाठक पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

Babli ने कहा…

बहुत बढ़िया लगा! शानदार प्रस्तुती!

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') ने कहा…

वाह क्या बात है.... नया अंदाज....
सादर....

सागर ने कहा…

bhaut hi khub....

"जाटदेवता" संदीप पवाँर ने कहा…

सही है

प्रेम सरोवर ने कहा…

बहुत रोचक और सुंदर प्रस्तुति.। मेरे नए पोस्ट पर (हरिवंश राय बच्चन) आपका स्वागत है । धन्यवाद ।

S.N SHUKLA ने कहा…

इस सुन्दर प्रस्तुति के लिए बधाई स्वीकारें.

संतोष पाण्डेय ने कहा…

क्या बात है. अलग अंदाज़ की रचना.

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