मैं कौन हूँ? ये एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब २७ सालों के बाद भी मैं नहीं ढूंढ़ पाया हूँ... पर यकीन मानिए रोज कोशिश करता हूँ इस जवाब को ढूंढने का. आखिर मेरा क्या अस्तित्व है... मैं कौन हूँ??? मैं रोज सुबह इसलिए नहीं जागना चाहता कि मुझे उठ कर ऑफिस जाना है, रात को इसलिए नहीं सोना चाहता कि सुबह ऑफिस जाने के लिए उठना है... मैं सोना चाहता हूँ खुद के लिए, जागना चाहता हूँ खुद के लिए... कुछ ऐसा करना चाहता जिससे मुझे ख़ुशी मिले, संतुष्टि मिले, जिस काम को कर मेरा दिल खुश हो... जिससे मुझे गर्व की अनुभूति हो...
मुझसे संपर्क साधना बहुत आसान है... ab8oct@gmail.com पर मेल कर सकते है, http://ab8oct.blogspot.com/, http://humarinayisubah.blogspot.com/ पर मेरे विचारों को पढ़ सकते है....
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सोमवार, 19 सितम्बर 2011

जिंदगी का सबसे अनमोल दिन... १९ सितम्बर

कभी कभी तो कई कई दिनों तक मेरे पास लिखने को कुछ भी नहीं रहता और आज इतना कुछ है कि सोंच रहा हूँ कहाँ से शुरू करूँ... चलो ऐसा करता हूँ इस दिन की पोस्ट की शुरुआत अच्छी खबर और अपने लिए दुआ मांगने से करता हूँ फिर विचारों की ओर रुख करूँगा... तो दुआ देने के लिए तैयार रहिये...

आज मेरा पहला जन्मदिन है (हैप्पी बर्थडे तो मी...)... अरे-अरे चौंक क्यों रहे है? जन्म तो मैंने लगभग २७ साल पहले ले लिया था (इसी ८ अक्टूबर को मेरा २७ वर्ष पूरा हो जायेगा)... आज मेरी जिंदगी का पहला जन्मदिन है... मेरी नयी जिंदगी... लगभग हर कोई जनता है कि मैं किन दौर से गुजरा हूँ... मानसिक रूप से लगभग टूट चूका था और बहुत हद तक कह सकते है कि डिप्रेस हो चूका था... कई महीने शाय्काय्त्रिस्ट की दवा खा के गुजारी और फिर रही सही कमर मेरी टी बी की बिमारी ने पूरी कर दी... माँ-पा का बहुत साथ मिला इन सबसे उबरने में... उनके साथ ही किसी और का भी साथ मिला... वो थी "सहर"... आज ही की तारीख में ठीक एक साल पहले उसके साथ मैं एक नए रास्ते पर चला था... और इन पुरे सालों में उसने मेरा हर पल और हर मोड़ पर साथ दिया है... अगर मैं कहूँ कि उसने मुझमें जीने की इच्छा जगाई तो गलत नहीं होगा... मुझे जीने की एक नहीं हिम्मत, वजह और हौसला दिया... मुझे खुश होने का मौका दिया... मैं हूँ इस बात का अनुभव कराया... खुद पर गर्व करना सिखाया... वो एक छोटे से शहर की रहने वाली सीधी सी लड़की है पर शायद अनुभव, रिश्ते, प्यार और दोस्ती में कहीं ज्यादा ऊपर है मुझसे... मैंने भगवान पर कभी भरोषा नहीं किया है... माँ-पा के बाद अगर किसी को भगवान का दर्जा दिया है तो वो मेरी सहर है... हाँ मुझे ये कहने में गर्व महसूस होता है कि मैं उससे और वो मुझसे प्यार करती है... पर परिस्थितियाँ हमारे अनुकूल नहीं है... किसी और की गलती की सजा हम दोनों को भुगतना है... गुनाह किसी और ने किया और उसकी बदनामी का दाग मैं झेल रहा हूँ... उसके परिवार की नजर में शायद मुझसे बुरा इस दुनिया में कोई नहीं होगा... पर यकीन मानिये मैंने कोई गलती नहीं की है और वो भी इस बात को जानती है... उसे भी पता है कि गुनाहगार कौन है, फिर भी उससे अलग होने की सजा शायद मुझे, नहीं हम दोनों को भुगतनी है... इन एक सालों में मैं उससे सिर्फ दो बार मिला हूँ... अंतिम मुलाक़ात ८ जनवरी को थी (लगभग साढ़े ९ महीने पहले) पर आज तक न उसका चेहरा भूल पाया हूँ और न ही दिल में उसके लिए प्यार कम हुआ है... मुझे, नहीं-नहीं हम दोनों को आप लोगों की दुआ की जरुरत है... तो हमारे पहले जन्मदिन पर बधाई के साथ साथ दुआ भी देंगे न?


कल का  दिन देश के लिए और देश-वाशियों के लिए बड़ा झटकेदार था... एक घंटे में दो झटके... पूर्वोत्तर को तो हिला के रख दिया... पता नहीं कितने लोगों को असमय मृत्यु प्राप्त हुई और न जाने कितने घायल हुए... इसके सही जानकारी आप लोगों को जरुर होगी... न भी है तो न्यूज़ चैनल खोल लीजिये अपडेट हो जाइएगा... पर बात मैं कुछ और बताना चाहता हूँ.. आखिर क्या वजह है इन झटकों का?... पृथ्वी क्यों बार बार हमें झटके दे रही है?... मेरे पास तो सीधा सा जवाब है कि इसका कारण है बोझ... जब आप कोई बहुत भारी सामान उठाते है या उठाये रखते है तो आप भी कांपने लगते है, डगमगाने लगते है... ये तो आप लोगों ने भी महसूस किया होगा... हमने धरती पर इतना बोझ बढा दिया है कि वो भी अब कांपने लगी है... उसके पैर डगमगाने लगे है... दुनिया हमेशा बदले के नियम पर चलती है... सबकुछ खुद को बैलेंस करता है... प्रकृति भी कर रही है...  जितना हम उससे ले रहे है उतना वो हमसे भी लेगी... हम जिस तरह प्राकृतिक सम्पदा का अनुपयोग कर रहे है, उसे ख़तम कर रहे है... प्रकृति उसे बैलेंस तो करेगी ही... हम धरती में छेद कर के प्राकृतिक सम्पदा निकाल रहे है... धरती का सीना चीर कर कई बड़े बड़े भवन-इत्यादि उस पर बसा रहे है... पेडों को काट कर धरतो की मजबूती को वैसे ही कमजोर कर रहे है जैसे हमने अपनी भावनाओं को तोड़ कर अपनी एकता को कमजोर कर दिया है... बिना वजह भी भौतिक चीजों का इस्तेमाल कर के प्रदुषण का स्तर हर रोज बढा रहे है... तो इन सबके बदले प्रकृति हमसे बदला तो लेगी ही... बिमारी के रूप में, भूकंप के रूप में, कभी सूखे के रूप में तो कभी बाढ़ के रूप में, कभी कोई सुनामी आएगा तो कभी कहीं भूस्खलन होगा... प्रक्रति बदला तो लेगी ही... समय अभी भी है या तो हम संभल जायें या फिर इसी तरह किसी भी वक़्त मरने के लिए तैयार रहे... फैसला आपका है कि आपको क्या चाहिए...

8 कुछ आपकी खामोशी:

Sonal Rastogi ने कहा…

जब बुरा समय चल रहा होता है तो एक अंतहीन रात की तरह लगता है ...यकीन नहीं होता कभी उजाला भी होगा पर हज़ारो सालो से रात के बाद सुबह तो आती ही है ना ...आपके जीवन में अब उषा की लाली दमके शुभकामनाये

सदा ने कहा…

अक्‍सर ऐसा हो जाता है ... बहुत-बहुत शुभकामनाएं ।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है! आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

sushma 'आहुति' ने कहा…

गहन अभिवयक्ति....

रचना दीक्षित ने कहा…

जन्मदिन की बहुत शुभकामनायें. अब आपके जीवन में सब शुभ ही हो यहीं कामना.

रेखा ने कहा…

जन्मदिन की बहुत -बहुत बधाई .....

kshama ने कहा…

Aapko dheron shubh kamnayen!

संजय भास्कर ने कहा…

@ सदा जी ने सही कहा
अक्‍सर ऐसा हो जाता है

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