मैं कौन हूँ? ये एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब २७ सालों के बाद भी मैं नहीं ढूंढ़ पाया हूँ... पर यकीन मानिए रोज कोशिश करता हूँ इस जवाब को ढूंढने का. आखिर मेरा क्या अस्तित्व है... मैं कौन हूँ??? मैं रोज सुबह इसलिए नहीं जागना चाहता कि मुझे उठ कर ऑफिस जाना है, रात को इसलिए नहीं सोना चाहता कि सुबह ऑफिस जाने के लिए उठना है... मैं सोना चाहता हूँ खुद के लिए, जागना चाहता हूँ खुद के लिए... कुछ ऐसा करना चाहता जिससे मुझे ख़ुशी मिले, संतुष्टि मिले, जिस काम को कर मेरा दिल खुश हो... जिससे मुझे गर्व की अनुभूति हो...
मुझसे संपर्क साधना बहुत आसान है... ab8oct@gmail.com पर मेल कर सकते है, http://ab8oct.blogspot.com/, http://humarinayisubah.blogspot.com/ पर मेरे विचारों को पढ़ सकते है....
http://facebook.com/ab8oct या http://twitter.com/ab8oct जैसे सोसल साईट पर मुझसे जुड़ सकते है...

बृहस्पतिवार, 28 जनवरी 2010

अलविदा रायपुर...


अभी कुछ ही दिनों पहले तो आया था यहाँ... रायपुर... २५ दिसम्बर २००९. एक महीने से ज्यादा हो गया और पता भी न चला... दीदी और जीजाजी का अच्छा साथ जो मिला, कई नए दोस्त बने और एक रिश्ता भी... एक अनजाना रिश्ता...

जब आया था तो सब कुछ नया था... शहर नया, गलियाँ, दुकानें, लोग सब नए... बिलकुल अनजाने... एक दो दिन तो बहुत खाली खाली सा लगा... पर जल्द ही इस शहर ने मुझे अपना बना लिए... अवन्ती बाई चौक पर सिगरेट की दूकान, जहाँ मैं रोज सिगरेट पीता था, दूकान वाला अब पहचानने लगा है. मेरे पहुँचते ही बिना कुछ कहे Ultra Mild सिगरेट निकाल कर दे देता है. चौक के पास ही दाहिने वाली गली में स्वस्तिक कंप्यूटर, जहाँ मैं रोज अपने लगभग दो घंटे इन्टरनेट पर बिताता हूँ, वो भी मुझे जान गए है, दुसरे दिन ही उन्हें मेरा नाम याद हो गया था. मेरे पहुँचते ही तीन नंबर वाला केबिन मेरे लिए उपलब्ध हो जाता था... चौक पर की चाय दूकान, जहाँ मैं रोज सबेरे अपनी Morning Walk के साथ चाय पीता था. चाय वाले को याद हो चूका है कि मुझे कम चीनी और कड़क चाय पसंद है.
 
देखते देखते एक महिना बीत गया और बिलकुल पता नहीं चला... दीदी के ही ऑफिस में काम करने वाले शीतांशु जी (जो की दीदी के घर के बगल में ही रहते है) से मेरी रोज अच्छी बात-चीत होती है, बिलकुल किसी मित्र की तरह. दीदी के घर के बगल में ही रहने वाले एक दम्पति का लगभग डेढ़ साल का बेटा 'हर्ष' अब मुझसे बहुत घुल मिल गया है. उसे टल्ला (टीवी) देखना बहुत अच्छा लगता है. दीदी के मकान मालिक के कुत्ते को भी नहीं भूल सकता, जो रोज आते जाते समय भूंकता जरूर है (हाँ कभी कभी नहीं भी भूंकता है, चुप-चाप पड़ा रहता है).

करीबन दो साल के बाद अपने सबसे अच्छे दोस्त 'अभिषेक अनंत (रिंकू)' से भी मिला (फ़ोन पर तो लगभग हर हफ्ते बात होती है पर मेरे दिल्ली और उसके नागपुर में रहने के कारण मिलने का मौका नहीं मिल पता). दीदी और जीजाजी के बुलावे पर नागपुर से नव-वर्ष मनाने के लिए रायपुर आया था. १ जनवरी को हमने साथ में थ्री इडीयट्स भी देखी और रात का खाना नए बस स्टैंड के सामने वाले Resturant राजघराना में खाया.



२४ जनवरी को हुए ब्लॉगर मीट को भी नहीं भूल सकता, आखिर मेरे जीवन का पहला मौका था जब मैं किसी गोष्ठी में शामिल हुआ था, जहाँ मुझे कहने का, अपनी कविता सुनाने का मौका मिला. जहाँ मैं डॉक्टर महेश सिन्हा जी, अनिल पुसदकर जी, बी एस पाबला जी, ललित शर्मा जी, राजकुमार जी, संजीत त्रिपाठीजी , अंकुर गुप्ता जी, तोषी जी, सूर्यकांत जी एवं कई अन्य ब्लॉगर एवं पत्रकारों से मिला. अगले दिन कुछ अखबारों में इस ब्लॉगर मीट की चर्चा भी थी और मेरा नाम भी था उस में... पहली बार मेरा नाम किसी अखबार में छपा था... इतना गौरवान्वित और उत्साहित महसूस कर रहा था उस वक़्त जैसे मैंने कोई दुनिया जीत ली हो....


कल यहाँ से जा रहा हूँ, वापस दिल्ली... जिंदगी एक सफ़र है, किसी एक पड़ाव पर नहीं रूकती... कुछ विश्राम के बाद फिर आगे बढ़ जाती है... मुझे भी यहाँ से आगे बढ़ना है... ये एक महीने मेरे जीवन के सबसे अनमोल महीने है... इस में मैंने बहुत कुछ पाया है, यहाँ तक कि इसी एक महीने में मुझे मेरा प्यार भी मिला... इसी एक महीने में मेरा लिखने का जूनून भी वापस जागा... इसी एक महीने में मेरी सोंच में बहुत बदलाव आये... ये एक महिना मेरे जीवन का सबसे अनमोल महिना है... जिसे मैं शायद मरने के बाद भी न भूल सकूँ...


कहते है दुनिया गोल है... देखते है अगर ऐसा है तो फिर आऊंगा यहाँ एक दिन... जरूर आऊंगा... अपने रायपुर से मिलने... बिछड़ने का गम तो है पर साथ ही ख़ुशी भी है कि यहाँ से बहुत सी हसीं यादें ले जा रहा हूँ...


दीदी 'प्रज्ञा प्रसाद', जीजाजी 'राजीव कुमार', अपने लंगोटिया यार 'अभिषेक अनंत (रिंकू)' शीतांशु जी, हर्ष, डॉक्टर महेश सिन्हा जी एव, डॉक्टर नितिन मलिक  को दिल से धन्यवाद देना चाहूँगा, जिन्होंने मेरे इस महीने को यादगार बनाने में अहम् भूमिका निभाई...


अगली बार मिलने तक अलविदा रायपुर...

मंगलवार, 26 जनवरी 2010

Happy Republic Day....


सबसे पहले तो मेरी तरफ से आप सबों को गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाई.... आज सुबह आँख खुलते ही सबसे पहले मन में कुछ पंक्तियों ने जन्म लिया...
"हँसना, मुकुराना, हर बात पर मजाक बनाना
ये मेरी फितरत नहीं यारों, जीने का अंदाज है
हंस कर ग़मों को गले लगा लेता हूँ
मुस्कुरा कर परेशानियों को भगा देता हूँ
जिन्दगी मेरी खुद मजाक बन गयी है इसलिए
दुनिया का मजाक बना देता हूँ
कि छोड़ कर किसी दिन चला जाऊँ दुनिया
तो न बहाना आँखों से दो बूँद अपने
कि हंस लेना, मुस्कुरा लेना
बना लेना एक मजाक मेरे नाम पर...."


थोड़ी देर और बिस्तर पर पड़ा रहा फिर आदतन निकल पड़ा घर से यूँ ही सड़कों पर भटकने... एक बच्ची को देखा जो हाथों में तिरंगे की बण्डल लिए सड़क किनारे खड़ी लोगों का इन्तेजार कर रही थी, कि कोई तो आये जो उससे तिरंगा ख़रीदे. सामने के पान दूकान पर कई लोग सिगरेट, गुटखे और पान के मजे ले रहे थे पर किसी के पास दो रुपये नहीं थे उस बच्ची से तिरंगा खरीदने को... बिना तिरंगे की स्वतंत्रता देख चूका हूँ आज तिरंगे के रहते गणतंत्रता देख रहा था.


थोड़ी देर में एक मोटर-साइकिल चालाक उस बच्ची के पास रुका और उसने एक तिरंगा ख़रीदा पर उसके पास खुल्ले पैसे नहीं थे. न जाने मुझे क्या सूझी मैंने उस व्यक्ति के बदले २ रुपये खुद उस बच्ची को दे दिए... दो तिरंगा फिर मैंने उससे अपने लिए ख़रीदा और वापस घर की ओर मुद चला... कुछ ही कदम बढे होंगे मेरे कि न जाने किस भाव से मैं वापस उस बच्ची तक आया और मैंने उसके सारे तिरंगे खरीद लिए और उन तिरंगों को फिर उसे ही देकर मैंने कहा कि वो अब इमानदारी से इन तिरंगों को लोगों में मुफ्त बाँट दे...


फिर वहां से मैं वापस आ गया. मुझे नहीं मालूम कि मुझसे पैसे मिलने के बाद भी उसने तिरंगे बांटे या नहीं पर मैंने अपना काम कर दिया. उस वक़्त मेरे दिल ने कहा ऐसा करने को और मैंने किया... मैंने दिल की बात सुनी... मैंने कोई देशभक्ति नहीं निभाई, मैंने कोई देश के लाभ का काम नहीं किया... बस जो दिल ने कहा वही किया....


एक बार फिर गणतंत्रता दिवस की आप सबों को बधाई...

सोमवार, 25 जनवरी 2010

रायपुर प्रेस क्लब में ब्लोग्गर्स मीट


कल, २४ जनवरी २०१०, पूर्व नियोजित समयानुसार रायपुर प्रेस क्लब में ब्लोग्गर्स मीट का आयोजन हुआ. सभाग्या है मेरा कि मुझे भी उसमें सम्मिलित होने का सुअवसर प्राप्त हुआ. पहली बार किसी गोष्ठी में जाने का मौका मिला और लोगों को अपनी बात कहने का भी. गौरव की अनुभूति हुई वहां कै बड़े और दिग्गज पत्रकारों और ब्लोग्गर्स के बीच खुद को पाकर.

सबसे पहला धन्यवाद डॉक्टर महेश सिन्हा जी का करूँगा, जिन्होंने न मुझे उस मीट में शामिल होने का मौका दिया बल्कि खुद मुझे मेरे घर से लेने आये और वापस घर तक पहुँचाया भी. अभी कुछ ही दिनों पहले की ही तो बात है मैं उन्हें जानता तक नहीं और आज उनसे एक गहरा अनजाना रिश्ता बन गया है.

ब्लोग्गर्स मीट का आरम्भ लगभग १५:०० हुआ. यह रायपुर या यों कहें छत्तीसगढ़ का पहला ब्लोग्गर्स मीट था. कई बड़े नाम भी मौजूद थे और कई नए चेहरे भी. गोष्ठी की शुरुआत श्री अनिल पुसदकर जी ने की. शुरुआत हुई ब्लॉग की उपलब्धता, इसके रूप, मजबूती और इसके योग्यता से, योग्यता कि कैसे ब्लॉग पांचवे खम्भे के रूप में उभर कर आ रहा है और समाज की समस्याओं और निवारण का एक अच्छा माध्यम है.... अनिल जी ने छत्तीसगढ़ की खराब होती छवि पर भी सवाल उठाया. ये एक अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा भी है. हम कमियों को तो बढा-चढ़ा कर लिखते, छापते और सुनाते है पर सच्चाई और वास्तिवकता से कोशूं दूर रहते है. अनिल जी ने एक बहुत ही उम्दा सुझाव दिया कि एक ऐसा कमुनिटी ब्लॉग बनाया जाये जिसमें छतीसगढ़ के सही समस्याएं, उसकी उपलब्धि सही और निष्पक्ष रूप से लोगों तक पहुँचाया जा सकें... मैं उनके इस प्रयास को सार्थक और सही मानता हूँ.

अनिल जी के बाद श्री बी एस पाबला जी ने लोगों को संबोधित किया और अपना परिचय और विचार लोगों के सामने रखें. लगभग 60 ब्लोग्गर्स का समूह मौजूद था (कुछ अन्य ब्लोग्गर्स व्यक्तगत समस्याओं के कारण मौजूद नहीं हो सके), ये एक छोटी मगर सार्थक शुरुआत थी. एक के बाद एक सभी लोगों को अपने विचार रखने का मौका मिला. श्री ललित शर्मा जी से कई जानकारियाँ मिली. कुल मिलाकर कहूँ तो इस मीट में कई सारी नयी जानकारियाँ और विचार सामने आये. कोई ब्लॉग सिर्फ शौक के लिए लिखता है तो कोई इसे धनार्जन का श्रोत भी मानता है. बोलने का मौका मुझे भी मिला. पर उत्साह, डर और घबराहट में शायद मैं अपने मन की बात कह ही नहीं पाया. जाने से पहले मैंने सोंचा था ये कहूँगा, वो कहूँगा, ऐसे बोलूँगा, वैसे अपनी बात रखूँगा... पर जब बोलने का मौका आया तो सारे शब्द गायब हो गए.


मीट के दौरान कही गयी एक बहुत ही अच्छी और सार्थक जोक मुझे याद है... "दो सेब के पेड़ आपस में बात कर रहे थे. पहले ने दुसरे से कहा कि एक दिन ऐसा आएगा जब सिर्फ सेब ही सेब के पेड़ बचेंगे बाकी सब ख़त्म हो जायेंगे. तो दुसरे ने सवाल किया वो कैसे... पहले ने कहा, जिस तरह लोग आपस जात धर को लेकर में लड़ रहे है, मर रहे है मार रहे, एक दिन सिर्फ हम ही तो बचेंगे, आदमी आदमी को मार रहा है, जानवरों को मार रहा है और जानवर भी दुसरे छोटे जानवरों को मार रहे है... एक दिन सिर्फ हम ही तो बचेंगे... तो दुसरे सेब के पेड़ ने धीरे से कहा, कौन सा सेब का पेड़ बचेगा? लाल वाला या सफ़ेद वाला" ये सिर्फ एक जोक नहीं था बल्कि बहुत बड़ी सोंच और चिंता की बात थी इसमें...

सभी ब्लोग्गर्स साथियों के बीच एक मात्र महिला ब्लोग्गर भी थी, श्रीमती तोशी गुप्ता. उनका चर्चा मैंने इस लिए किया क्योंकि उन्होंने ब्लॉग के माध्यम से एक शसक्त शुरुआत की थी पर कुछ लोगों की धमकियों ने उन्हें लिखने से डरा दिया. मैं तोशी जी से इतना ही कहूँगा,
"कि तमाशबीनों की दुनिया है यह, बुरा किसी को दीखता नहीं..
और बुरा जो दिखाने की कोशिश करो तो और भी कुछ दीखता नहीं...
ये दुनिया झूठ और फरेबों से चल रही आज
यहाँ इमानदारी की कीमत नहीं, सच बिकता नहीं...."


सबके परिचय और विचार विमर्श के बाद सभा का अंत मेरी कुछ पंक्तियों से हुआ था....
"अपनी जिंदगी से न यूँ मुझे किनारा कीजिये
ग़मों में ही सही अपनी, मुझे अपना सहारा कीजिये
तेरी महक सदा पाता हूँ पास अपने
कोई तो अपनी मौजूदगी का इशारा कीजिये
अपनी जिंदगी से न यूँ मुझे किनारा कीजिये

होश खोता रहा है आइना भी तुझे देख-देखकर
यूँ तो खुद को न सामने उसके संवारा कीजिये
इन्तेजार में तेरी एक झलक पाने को तो चाँद भी है
इक पल का ही सही, वक़्त कोई अपना हमारा कीजिये
अपनी जिंदगी से न यूँ मुझे किनारा कीजिये

गुनाह की है तुझसे मोहब्बत करने कि मैंने
खतादार हूँ तेरे हुस्न की आरजू की है
सजा देने को ही सही, एक बार तो
अपनी जिंदगी में शामिल दोबारा कीजिये
अपनी जिंदगी से न यूँ मुझे किनारा कीजिये
ग़मों में ही सही अपनी, मुझे अपना सहारा कीजिये"

ब्लोग्गर्स मीट के बाद रात्री भोजन की भी व्यवस्था की गयी थी जो कि एक शानदार और यादगार था... खाने के साथ साथ लोगों की बातें और मजाकें खाने में और मसाला डाल रहे थे... रात करीब १० बजे लोगों से विदा ली फिर मिलने के लिए...

कल की शाम मेरी सबसे ज्यादा यादगार और हसीं शाम थी... एक ही शाम में मैंने उत्साह, गर्व, डर, घबराहट और ख़ुशी सारी भावनाओं का मजा ले लिया. महेश अंकल का साथ, पाबला जी की गर्मजोशी से मिलाया गया हाथ (मेरे हाथों में अभी भी दर्द है), ललित शर्मा जी की मूंछें, अनिल जी का व्यवहार और बाकी बंधुओं का सौहाद्र ... हमेशा याद रहेगा...

रविवार, 24 जनवरी 2010

जंगलराज (मेरी लिखी पहली और आखिरी व्यंग्य कथा)

पढने का शौक तो बचपन से था... लिखना कब शुरू किया पता नहीं चला... ९वि में पढता था, उन दिनों परसाई जी की एक व्यंग्य कथा पढ़ रहा था... अचानक मेरे मन में भी एक व्यंग्य ने जन्म लिए. मेरी पहली रचना है ये... और अब तक की आखरी व्यंग्य कथा भी... फिर कविता और कहानियों की ओर मुद चला और व्यंग्य शब्दों से निकल कर कहीं मेरे जीवन में बैठ गया... बहुत बात कर ली मैंने अब इस व्यंग्य कथा का आनंद लीजिये...


ओंस उपोन अ टाइम... अरे छोडिये ये तो हर समय की बात है... हाँ ये बात है एक जंगल की, जहाँ पूरी तरह जंगलराज था. अब जंगल है तो जंगल राज भी होगा ही... और जैसा की हर जंगलराज में होता है वहां भी वही होता था... बड़े और शक्तिशाली, बाहुबली जानवर राज करते थे, चप्प्लुस टाइप जानवर उनकी चापलूसी करते थे और बच गए बाकी जानवर उम्मीद में जीते थे कि कभी उनका भी दिन आएगा... जंगलराज ख़त्म होगा और राम राज आएगा... पर कभी ऐसा हुआ है कि जंगल में राम राज आये, वहां तो जंगल राज ही होगा... सब कुछ ठीक चल रहा था, बिलकुल जंगल राज की तरह...

पर एक दिन गड़बड़ हो गयी... कहीं से उस जंगल में एक जानावरखोर आदमी आ गया... रोज किसी न किसी मरियल जानवर के चारे को खा जाता... आतंक मंच गया पुरे जंगल में... सब त्राहिमाम करने लगे.. मीटिंग हुई, कि कैसे इस जानवरखोर आदमी से छुटकारा पाया जाये... जंगल का राजा तक घबराया हुआ था... तभी एक मरियल सी बकरी ने एक सुझाव दिया कि क्यों न किसी शिकारी बाघ को नियुक्त किया जाये उस जानवरखोर इंसान को मारने के लिए. बात सब को जंच गयी... पास के दुसरे जंगल से एक शिकारी बाघ को बुलवाया गया.. उसकी फीस जनता (जो कुछ नहीं जानता उसे जनता कहते है) के पैसे से देना तय हुआ... तो आ गया शिकारी शिकार को...लगाया एक ऊँची सी जगह पर अपना डेरा और थाम के बन्दुक जा बैठा... थोड़ी दूर पर जानवरखोर आदमी को फ़साने के लिए उसी बकरी के चारे को चारा बनाया... (अक्सर ऐसा ही होता है, चारा कोई और होता है, वाह-वाही कोई और लुटता है)... हाँ तो जैसा की शिकारी ने शिकार को फ़साने के लिए चारा डाला, और संभाल के बन्दुक बैठ गया इन्तेजार में...

शिकार आता उससे पहले आदमी पालन वाले भेडिये आ गए... उन्होंने शिकारी बाघ से पूछा कि क्या कर रहे हो यहाँ... शिकारी ने बताया कि उसे बुलवाया गया है जानवरखोर इंसान को मारने के लिए... "क्या तुम इंसान का शिकार करने आये हो? तुम्हे नहीं मालूम यहाँ आदमी का शिकार करना जुर्म है?"
"मालिक वो एक जानवरखोर इंसान है, जनता उससे परेशान है. उससे छुटकारा, बचाव चाहती है."
"वो सब हम नहीं जानते... तुम उसका शिकार नहीं कर सकते. तुम पर केस बनेगा, गिरफ्तारी होगी तुम्हारी. पुलिस बुलाना पड़ेगा." कह कर आदमी पालन वाले भेडिये ने मोबाइल निकाला और पुलिस सियार को बुलवा लिया.
पुलिस सियार ने आते ही अपनी हथकड़ी निकाली और शिकारी बाघ को पहना डाली.
बेचारा शिकारी समझाता रहा, गिडगिडाता रहा. तभी एक हवलदार लोमरी ने इंस्पेक्टर सियार से कहा "साहब इसके पास तो बन्दुक भी है, कहीं ये कोई आतंकवादी तो नहीं?"
"अरे नहीं सरकार, मैं एक शिकारी हूँ, बन्दुक का लायसेंसधारी हूँ. ये देखिये मेरा कार्ड और लायसेंस."
"अरे ये तो दुसरे जंगल का लायसेंस है. यहाँ इस जंगल में नहीं चलेगा. तुम्हे तो कैद होगी, सजा होगी."
"साहब ऐसा न कीजिये... उस जानवरखोर का मारा जाना अत्यंत आवश्यक है. जनता परेशान है, उनके चारे वो खाए जा रहा है... ऐसे ही छोड़ दिया तो कभी आपके चारे तक भी पहुँच सकता है."
"जनता का चारा खा रहा है तो तुम्हे क्या तकलीफ जब हमें नहीं है. बस तुम उसे नहीं मार सकते और अगर मारना चाहते हो तथा बचना चाहते हो तो कुछ हलके हो जाओ."
बात शिकारी बाघ की समझ में नहीं आई. बगल में तमाशा देख रहे जानवरों में से एक बुजुर्ग बन्दर ने बात समझाई. बात शिकारी के समझ में आ गयी... उसने ५० रुपये हवलदार लोमड़ी को, ५०० रुपये इंस्पेक्टर सियार को और ५००० रुपये आदमी पालन वाले भेडिये को देकर अपनी जान छुड़ाई... और उस जानवरखोर आदमी को मारने की परमीसन पाई...

एक बार फिर शिकारी ने अपना बदूक उठाया, निशाना लगाया और डेरा जमाया तब तक वो जानवरखोर आदमी उस मरियल बकरी के चारे के साथ साथ उस मरियल बकरी को भी मार कर खा चूका था और अगले दिन फिर आने के लिए जा चूका था....

शनिवार, 23 जनवरी 2010

कुछ तस्वीरें देखिये आपको इनमें क्या लगता है


मध्य रात्री का चाँद 31 दिसंबर को इसे बड़ा कर के देखें . पृष्ठभूमि  में आपको कुछ नजर आता है





कमरे की खिड़की से ली गयी तस्वीर दूरी 3-4 फीट

शुक्रवार, 22 जनवरी 2010

वो अजनबी कौन थे...



दिनांक १८ अक्टूबर, २००७... शाम के लगभग ८ बजे.... दिल्ली के पुष्प विहार इलाके में अकेला टहल रहा था. मन उदास था और अन्दर ही अन्दर रो भइ रहा था मैं. कुछ बूँद आंसुओं के आँखों में भी थे. नौकरी छोड़ी थी उसी दिन मैंने. नौकरी छोड़ने का दुःख नहीं था बल्कि उसके लिए तो संतुष्टि थी, उदास था मन क्योंकि पापा को नाराज हो गए थे मेरे नौकरी छोड़ने से.... अकेले ही सुनसान सड़क पर घूम रहा था. नजरें नीची थी और चेहरा भी झुका हुआ था... हाथ में सिगरेट भी थी....


अचानक किसी ने मुझे टोका "क्या हुआ बेटा? उदास क्यों हो?" नजर उठा कर देखा तो एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति था, चेहरे मैं गजब का आत्मविश्वास और एक अलग ढंग का तेज था. मैंने उनसे कहा नहीं ऐसी कोई बात नहीं बस थोड़ी तबियत ठीक नहीं लग रही.
"तबियत नहीं बेटा तुम्हारा मन खराब है... क्या हुआ जो इतना उदास हो? नौकरी गयी तो गयी."
"नहीं नौकरी की चिंता नहीं है उसे तो मैंने ही छोड़ा है. उसकी तो ख़ुशी है, संतुष्टि भी है और सुकून भी"
"अच्छा मतलब पिता की बात का बुरा मान गए, बेटा वो तुम्हारे पिता है. तुम्हारी उन्हें चिंता होती है इस लिए तो उन्होंने तुम्हे कहा. उनकी बात से क्या उदासी" उन्होंने कहा...
"पर मैंने उन्हें छोड़ने का कारण बताया भी तो था. फिर भी वो मुझे गलत ठहरा रहे है."
"ऐसा नहीं है वो तुम्हे गलत नहीं ठहरा रहे, बल्कि उन्हें तुम्हारे भविष्य की फिक्र है. और उदासी किस बात की... तुमने फैसला अपने दिल से लिया है. दिल से लिया गया फैसला कभी गलत नहीं हो सकता. बेटा हमेशा जब भी कोई उलझन हो दिल की ही सुनना... दिल हमेशा एक ही रास्ता दिखता है चाहे वो गलत हो या सही... पर सिर्फ एक रास्ता, दिमाग की तरह वो उलझन को और बढाता नहीं है. चलो अब उदासी छोडो और मुस्कुराओ..." मेरे चेहरे पर स्वतः ही एक मुस्कान आ गयी...
"अच्छा बेटा अब मैं चलता हूँ." कहकर वो चले गए.


उनके जाते ही दिमाग अचानक से चौंका... अरे उन्हें कैसे पाता कि मैंने नौकरी छोड़ दी है और मेरी पिता जी से कोई बात हुई है जबकि मैं तो उन्हें जानता तक नहीं... तत्काल मैंने पीछे मुड़कर देखा पर सुनसान रास्ते पर कोई नहीं था... दूर चौराहे पर कुछ गाड़ियों के आने जाने का क्रम जरूर नजर आ रहा था. उनके जाने और मेरे पीछे मुड़ने में ३० सेकेंड से ज्यादा का फर्क नहीं होगा, इतनी जल्दी कोई कहाँ जा सकता है... जबकि रास्ते के दोनों ओर बड़ी बड़ी दीवारें है और कोई गली या घर भी नहीं... एक अनजान डर ने मुझे तुरंत अपने कैद में ले लिया और मैं तुरंत वहां से लगभग भागता हुआ अपने घर पहुँच कर ही रुका.... न जाने वो अजनबी कौन थे...

बृहस्पतिवार, 21 जनवरी 2010

अपने वहम, संयोग या सत्य को थोडा और आगे बढाता हूँ...

अपने वहम, संयोग या सत्य को थोडा और आगे बढाता हूँ... 
मेरे पिछले पोस्ट पर "अजय कुमार जी" और "राजीव जी" ने कहा कमरा बदल लेने को... पर मैं इनकी इस बात से इत्तेफाक नहीं रखता... भागना मैंने सिखा नहीं... मैं तो और उसे जानना चाहता हूँ... डरता नहीं मैं इन सब चीजों से... आप लोगों के शब्दों में अगर कहूँ तो यदि भगवान ने इस श्रृष्टि की रचना की है तो उस साए की रचना भी भगवान द्वारा ही हुई होगी. फिर उससे खौफ खाने या भागने का क्या मतलब... अगर मैं मान भी लूँ कि वो आत्मा या साया बुराई को समर्थित है तो भी नहीं भागूँगा... ऐसे तो हम फिर कायर ही कहलायेंगे... आतंकवादी, क्रिमनल, गुंडे तो उस साए से भी खतरनाक है... फिर तो हमें उनसे भी छिप कर भागना चाहिए... पर कहाँ तक और कब तक???


खैर मैं अपने वहम को और थोडा विस्तार देता हूँ तथा कुछ और घटनाओं पर प्रकाश डालता हूँ...


उस साए को मैंने बहुत बार और भी महसूस किया है... कई बार उस साए ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश की है. सिर्फ मेरे फ्लैट के कमरे में ही नहीं... वरण छत पर (मुझे रोज रात खाना खाने के बाद छत पर टहलते हुए सिगरेट पिने की आदत है), बाज़ार में चलते वक़्त अचानक उसका दिखना वो भी दिन के लगभग ३ बजे, साकेत स्थित केंद्रीय विद्यालय के गेट के पास वाली चाई की दूकान पर, और भी अन्य जगहों पर... उसके उपस्थिति का कोई वक़्त नहीं होता. मतलब ऐसा रोज नहीं होता... अगर रोज होता तो मैं विज्ञान को मान लेता और खुद को मानसिक बिमारी का शिकार... पर उसकी उपस्तिथि कभी हफ्ते में एक बार तो कभी किसी महीने में नहीं भी होती थी. उस साए से एक बात तो पक्की हो चुकी है इतने दिनों में कि वो मेरा बुरा नहीं चाहती, बल्कि कुछ है जो बताना चाहती है... पर मैं उसे सुन नहीं पाता, उसे साफ़ साफ़ देख नहीं पाता... मैं जानना चाहता हूँ आखिर क्या है वो? कौन है वो? और क्यों वो मुझे दिखती है या दिखने की कोशिश करती है? पर सवाल अभी भी सवाल ही है... जवाब का इन्तेजार है, शायद जल्द मिल जाये...



थोडा अपनी जिन्दगी में पीछे चलता हूँ जहाँ दो और ऐसी ही घटनाएं मेरे साथ घट चुकी है. आज से लगभग ६ साल पहले वर्ष २००३, स्थान पटना का कुर्जी स्थित मेरा किराये का कमरा, महिना अगस्त का (दिनांक याद नहीं), समय रात के २ बजे (लगभग)... मैं नया नया ही अपने पैत्रिक घर पूर्णिया से पटना आया था अपनी होटल प्रबंधन की पढाई के लिए. कोलेज के पास ही कुर्जी में किराये के कमरे में रहता था. मेरे कमरे से लगा एक बड़ा सा बालकोनी भी था (पीछे की तरफ, बालकोनी के कारण ही उस एक छोटे से कमरे का किराया बाकी कमरों से २०० रुपये ज्यादा था). मुझे देर रात तक पढने की आदत थी (अब देर रात ही पढूंगा न, ९ बजे तो कमरे पर वापस ही आता था). कमरे में बालकोनी में जाने के लिए एक दरवाजा था और दरवाजे के दोनों ओर दो छोटी-छोटी खिड़कियाँ थी. एक खिड़की के समीप मैंने अपना बिस्तर लगा रखा था. गर्मी का ही मौसम था इसलिए बालकोनी की तरफ का दरवाजा और खिड़कियाँ खोल कर ही सोता था और बिस्तर पर अपना सर खिड़की की ओर रखता था. लगभग एक बजे मैं सो गया. कुछ ही देर बाद अचानक मेरी नींद खुली (वैसे मेरी नींद बहुत कड़ी है, और बीच में ढोल-नगाड़ों की आवाज से ही खुलती है). लगा जसे मेरी खिडकी से कोई मुझे देख रहा है. कमरे की बत्ती बंद थी. अँधेरे के अलावा और कुछ दिख तो रहा नहीं था. बाहार दूर से आती किसी रौशनी से हलके तौर पर चीजों को देख सकता था. एक बार तो डर गया कि कहीं कोई चोर तो नहीं. तेजी से उठ कर बैठा और सीधे हाथ स्वीच बोर्ड की ओर चले गए. खिड़की की ओर देखा तो कोई नजर नहीं आया. उठ कर बालकोनी में गया, जैसे ही दरवाजे से बाहर झाँका एक बार को तो मेरे प्राण सुख गए. कोने में एक साया खड़ा था. लगभग एक मिनट तक मैं उस साए को और वो साया मुझे देखता रहा. दिमाग और शरीर पर जोड़ डालने पर भी मैं हिल भी नहीं पा रहा था. जब बहुत जोड़ लगाने पर अपने कदम आगे बढ़ाये तो वो साया धीरे से मुस्कुराते हुए आँखों के सामने से गायब हो गया. मैंने इसकी चर्चा किसी से नहीं की. पर अगले ही दिन मैंने वो कमरा छोड़ दिया तथा अपने मामा के घर (अशोक नगर, कंकडबाग) में शिफ्ट हो गया. मामा का घर खाली ही था क्योंकि हाल ही में उनका ट्रान्सफर पटना से बेगुसराय हो गया था. निचले तल्ले में एक किरायेदार रहते थे. और ऊपर के तल्ले में मामा के घर में मैं रहने लगा (इससे एक फायदा तो हुआ था, किराये के जो ७०० रुपये लगते थे एक छोटे से कमरे के वो नहीं लगने वाले थे और घर भी बड़ा था. सुख सुविधाओं की हर वस्तुओं के साथ).



उस घटना के लगभग ६-७ महीने के बाद महिना शायद मार्च का था एक घटना और घटी. मामा के घर में आगे साइड से दो कमरे थे एक मेरा बेडरूम हो गया था और दूसरा उसके साथ लगा कमरा ड्राविंग रूम था. दोनों कमरे के साथ भी बालकोनी थी जो आगे की साइड में थी कमरे से लगी हुई पर दोनों कमरे की बालकोनी सेपरेट थी. देर रात पढने की आदत तो थी ही (वो जाने वाली भी नहीं थी.) मैं रोज ड्राविंग रूम में ही सोफे पर पढता था और कई बार सोफे पर ही सो भी जाता था. उस रात भी २ बजे तक पढने के बाद सोफे पर ही गया. थोड़ी ही देर में बंद आँखों से ही (नींद पूरी तरह से आई भी नहीं थी उस वक़्त तक) महसूस हुआ कि कोई ठीक मेरे सामने खड़ा है. आँख खोली तो लगभग २ साल का एक बहुत ही खुबसूरत बच्चा मुझे एकटक देख रहा है और धीमे-धीमे मुस्कुरा रहा है. पल भर को डर और बेचैनी से मेरी धडकनें इतनी तेज हो गयी कि लगा दिल बाहर आ जायेगा सीना चीड कर. शरीर बिलकुल कड़ा हो गया. २०-२५ सेकेंड के बाद वो बच्चा हँसता हुआ सीधे बालकोनी की तरफ भागा और गायब हो गया. घर के अन्दर आने का दरवाजा बंद था. सीधी की ग्रिल भी ताले से बंद थी. फिर वो किधर से आ गया. और भागा भी बालकोनी की तरफ. पहली मंजिल से वो कैसे भाग सकता है. रात भर फिर सो नहीं पाया. कुछ दोस्तों से इसकी चर्चा की तो उन्होंने वहम बताया. मैंने भी मान लिया कि सपना या वहम ही होगा... थका हुआ होऊंगा तो ऐसे ख्याल पनप गए होंगे... उसके बाद जब तक पटना में रहा (२००६ तक) फिर कोई घटना नहीं घटी, इससे पहले भी कभी ऐसा नहीं हुआ था.


सच है कि मैं भगवान (जिन्हें लोग कहते है) को नहीं मानता, भुत-प्रेत, आत्मा-परमात्मा, अगला या पिछला जन्म जैसी बातों पर विश्वास नहीं है मेरा... पर इन घटनाओं के बाद पूरी तरह से नकार भी नहीं पाता. बस दिल को तसल्ली दे देता हूँ कि "ALL IS WELL"....

बुधवार, 20 जनवरी 2010

वहम, संयोग या सत्य...


इस वाकये को बताने से पहले मैं ये बता दूँ कि मुझे भगवान, परमात्मा, आत्मा, भुत आदि बातों पर बिलकुल विश्वास नहीं है. दिल्ली में जहाँ मैं रहता हूँ मेरे फ्लैट में एक तस्वीर भी नहीं मिलेगी भगवान (जिसे लोग मानते है) की.


रात के लगभग १२ बज रहे थे. जनवरी का महिना, दिनांक: २७, वर्ष: २००९, स्थान: दिल्ली के साकेत में मेरा किराये पर लिया गया फ्लैट. मेरे फ्लैट में दो कमरे है, एक अन्दर की ओर और बाहर की ओर. बाहर वाले कमरे से घर के अन्दर आने का रास्ता और एक छोटा सा बालकोनी भी है. बाहर के कमरे में मैं और अन्दर के कमरे में मेरा भाई सोते थे. जनवरी का महिना... दिल्ली की कड़ाके की ठण्ड. भाई भी नहीं था तो उस रात मैं अन्दर वाले कमरे में सो गया. रजाई की गर्मी में चैन की नींद सो रहा था.


अचानक एक आवाज से मेरी नींद टूटी. छत से लटका पंखा पुरे वेग से जोरों से आवाज करता घूम रहा था. पंखे से ज्यादा तेज मेरा दिमाग घूम गया ये सोंच कर कि पंखा आखिर चला कैसे. स्विच बोर्ड पर हाथ डाला तो पंखे का स्विच ओन था. अकेले फ्लैट में सिर्फ मैं था, चारों ओर से खिड़कियाँ और दरवाजे बंद थे, फिर पंखे का स्विच किसने ओन कर दिया. खैर पंखे को बंद किया और फिर आराम से रजाई में दुबक गया. सुबह लेट से आँख खुली. रात की बात याद थी. एक बार फिर स्विर्च को ओन-ऑफ करके चेक किया कि कहीं स्विच तो ढीला नहीं हो गया. पर स्विच एक दम नया मालूम पड़ रहा था. खैर संयोग सोंच कर बात को भूल गया.


कुछ दिनों बाद मेरा भाई वापस आ गया. फिर हम अपने अपने कमरे में सोने लगे. मेरे भाई को देर रात तक पढने की आदत है. फरवरी का महिना (इस महीने में भी दिल्ली में इतनी ठण्ड तो जरूर होती है कि कोई भी पंखा नहीं चलाता) रात के करीब करीब १२ बजे पंखा फिर घुमने लगा. इस बार उस कमरे में मैं नहीं मेरा भाई था. बाहर के कमरे में मैं चैन की नींद सो रहा था. भाई थोडा घबरा गया अचानक पंखा चलने से... उसने डरते हुए स्विच ऑफ किया (इस बार भी स्विच ओन हो गया था खुद-ब-खुद) और दोबारा पढने बैठ गया. सुबह इस बात को उसने मुझे बताई. मैं सोंच में पड़ गया कि एक ही सप्ताह के अन्दर दो बार एक ही घटना... माजरा तो जानना ही पड़ेगा. पकड़ लाया मैंने एक मेकेनिक को स्विच और पंखे की जांच के लिए. पर सब कुछ ठीक मिला. मेकेनिक के अनुसार कोई गड़बड़ी नहीं थी. फिर संयोग मान कर बात को भूल गया.


कुछ दिनों के बाद भाई अचानक रात में मेरे पास आकर सो गया. सुबह पूछने पर बताया कि रात उसे डर लग रहा था. मैंने पूछा डर किस बात का तो जवाब से उसके मेरे भी सर में दर्द हो गया. उसने बताया कि उसे लगा कि उसके बिस्तर पर पैर के पास कोई बैठ उसे घुर रहा है. मैंने उसे प्यार से समझाया कि उसका वहम होगा, सपना देखा होगा कोई. भुत-प्रेत जैसी बातें नहीं होती है. बात उसके समझ में आ गयी. कुछ दिनों बाद उसकी तबियत अचानक खराब हो गयी और उसे घर (पूर्णिया, बिहार) जाना पड़ गया. एक बार फिर मैं अकेला था. महिना फरवरी का ही था... हाँ दो दिनों के बाद ही फरवरी २००९ ख़त्म होने वाला था. दिन शनिवार. उस दिन मेरा एक मित्र मेरे घर आया हुआ था. रात काफी देर तक बात करने के बाद हमने सोने का मूड बनाया और मित्र को मैंने अन्दर वाले कमरे में सोने को भेज दिया और खुद बाहर वाले कमरे में सो गया (मुझे अपने कमरे में ही अच्छी नींद आती है). बीच रात अचानक वो भी घबरा कर मेरे पास आ कर सो गया. सुबह उसने भी वही कहा जो मेरे भाई ने बताया था. मेरे मित्र को भी बिस्तर पर किसी के होने का अहसास हुआ था... इस बार बात सोंचने वाली थी.... संयोग एक बार हो सकते है पर बार बार नहीं... वहम एक को हो सकता है... पर एक ही वहम तीन लोगों को.... ये सोंचने वाली बात है...


अगली रात रविवार मैं अपने फ्लैट में अकेला था. अन्दर वाले कमरे की बत्ती बुझी हुई थी और मैं अपने कमरे में बिस्तर पर अधलेटा, दीवाल से सिर टिकाये कुछ पढ़ रहा था. अचानक मुझे लगा कि अन्दर वाले कमरे में कोई है. मैंने अपनी नजरें उठाई और अन्दर वाले कमरे की तरफ देखा... एक साया नजर आया... साए को देख कर इतना तो कह सकता हूँ कि वो साया किसी लड़की का था. पल भर को तो शरीर अकड़ सा गया. वो साया मेरी ही ओर देख रहा.. सॉरी देख रही थी... और मैं एक तक उस साए को... लगभग २०-२५ सेकेंड के बाद मैंने अपने शरीर को बुरी तरह झिंझोड़ा और बिस्तर से उठ कर अन्दर वाले कमरे की ओर बढा... पर दरवाजे तक पहुँचते-पहुँचते वो साया मेरी ही आँखों के सामने गायब हो गयी... तेजी से अन्दर वाले कमरे में दाखिल हुआ. बल्ब जलाया और चारों ओर देखा परन्तु कोई नहीं था. बिस्तर के निचे, दरवाजे के पीछे, अलमारी के पीछे सब जगह चेक किया पर कोई न था. तुरंत बाहर वाले कमरे में आया. और मैं दरवाजे को खोलकर बाहर आया, छत पर गया, बालकोनी भी चेक की पर नतीजा कुछ नहीं निकला.


वापस अपने कमरे में आ गया. डर, बेचैनी, घबराहट और सोंच के कारण फिर रात भर नहीं सो पाया. अगले दिन सोमवार करीब रात के ९ बजे ऑफिस से घर वापस आ रहा था. अपने घर की गली में पहुँच कर बस ऐसे ही (रोज की तरह) अपने फ्लैट की ओर निचे से देखा (ये जानने के लिए की खाना बनाने वाली आई है या नहीं, अगर वो आती है तो कमरे की बत्ती जली रहती है)... पर अंधेरी बालकोनी में मैंने साफ़ साफ़ किसी लड़की को खड़े देखा. सामने वाले घर से इतनी रौशनी तो आ रही थी कि मैं अपनी बालकोनी में कड़ी किसी लड़की को देख सकूँ... मैं भागता हुआ अपने फ्लैट तक पहुंचा, ताला खोला और अन्दर दाखिल हुआ, सबसे पहले कमरे की बत्ती जलाई फिर बालकोनी की ओर भागा. पर वहां कोई नहीं मिला. फिर से पूरा घर छान मारा यहाँ तक की छत भी... पर नतीजा वही ढाक के तीन पात.. मेरे घर की बालकोनी के ही सामने वाले घर की छत है जिस पर एक तथा-कथित आंटी कड़ी थी. मैंने आंटी से पूछ कि क्या उसने मेरी बालकोनी में किसी को खड़े देखा था अभी अभी. पर जवाब नकारात्मक मिला. उन्होंने बताया कि वो वहां पर लगभग एक घंटे से है और उन्होंने मेरी बलोकोन्य में किसी को भी नहीं देखा, हाँ वरण काम वाली आधे घंटे पहले तक थी.


मेरे लिए ये घटना डर, बेचैन करने वाली, और सोंचने पर मजबूर करने वाली थी. उस रात के बाद मैंने कई रात उसे तलासने की कोशिश की, उसे फिर से देखने की कोशिश की. पर ढूंढ़ नहीं पाया. हाँ कुछ कुछ दिनों के अंतराल पर वो साया अपने होने का अहसास जरूर अभी भी करवाती रहती है.


मैं आज तक इसी उधेड़बुन में हूँ कि वो मेरा वहम था या मेरी सोंच से भी बढ़कर कोई सत्य....

मंगलवार, 19 जनवरी 2010

खामोश अदा


तेरी खामोश
अदा
गुनगुनाती रहे
सदा
उम्मीदों से भरा
आँचल
लहराता रहे करता
हलचल
होंठों से निकली हर आवाज
बन जाये मेरी जिंदगी की
साज
तेरी शरमाहट भरी
मुस्कान
बन चुकी है मेरी
जान
हर रात देखता हूँ तुझे
सपनों में
हर पल तुझे महसूस करता हूँ
जीवन में
तेरी जिंदगी मेरी सांस चुकी है
बन
अब तो बता कब आओगी
मेरे जीवन में बनकर
दुल्हन...

सोमवार, 18 जनवरी 2010

माँ....

जीवन में पहली बार मैंने अपनी माँ के लिए कविता लिखी है... माँ एक ऐसा शब्द जिस में पूरा संसार छिपा हुआ है... माँ एक ऐसा शब्द जिसने पूरी श्रृष्टि की रचना की है... मेरी ये कविता मेरी माँ को समर्पित...


माँ....
मैं एक बार फिर बच्चा होना चाहता हूँ
तेरी गोद में रखकर सर
चैन की नींद सोना चाहता हूँ
माँ....
अकेलापन मुझे डरा रहा है
माँ...
तन्हाई मुझे खा रही है
चारों ओर से घिरा पा रहा हूँ
आत्मा मेरी थकन महसूस कर रही है
माँ....
मैं थक चूका हूँ दौड़ते दौड़ते
मैं और भागना नहीं चाहता
माँ....
में तेरे आँचल तले
खुद को छुपा लेना चाहता हूँ
मैं देर तलक तेरे सीने से लगकर
खूब रोना चाहता हूँ
माँ....
मैं दर्द और तकलीफ में
फंस सा गया लगता हूँ
माँ... 
मैं तुमसे खुद को दूर पा रहा हूँ
माँ.... 
मुझे तुम्हारी प्यारी सी थपकियाँ चाहिए
माँ... 
मैं तुम्हे अपना ढाल बनाना चाहता हूँ
माँ...
मैं तुम्हारे पास होना चाहता हूँ
माँ.... 
मैं एक बार फिर बच्चा होना चाहता हूँ
देर तलक तेरी गोद में सुरक्षित
चैन से सोना चाहता हूँ
माँ....
मैं एक बार फिर बच्चा होना चाहता हूँ...



शनिवार, 16 जनवरी 2010

जिंदगी के किस मोड़ पर आ गया हूँ


जिंदगी के किस मोड़ पर आ गया हूँ
उलझन और परेशानी के अँधेरे में घिर गया हूँ
जब साथ न था कोई तो अकेला न था
आज जब सबका साथ है तो तन्हा हो गया हूँ
लगता है जैसे निकाल ली हो आत्मा किसी ने
और जीने को बेजान छोड़ गया है
हाथों को किसी जंजीर से बाँध कर
लड़ने को जंग-ए-मैदान में छोड़ गया है
पैरों को जकड कर किसी रस्सी से
दौड़ने का हुक्म कोई दे गया है
लगता है जैसे इस भरी हुई दुनिया में
खाली कोई मुझे कर गया है
ये किस मोड़ पर आ गया हूँ
जहाँ सिर्फ अँधेरा ही अँधेरा है,
जहाँ आँखें बंद कर दी हो किसी ने
और दुनिया देखनी है कह गया है
ये किस मोड़ पर आ गया हूँ
जिन्दा तो हूँ पर मौत की ख़ामोशी सुन रहा हूँ
न जाने ये किस मोड़ पर आ गया हूँ...
जहाँ तन्हा और अकेला हो गया हूँ....

Blogger meet at Raipur on 24.01.2010

दिनांक २४.०१.२०१० दोपहर के ०१ बजे प्रेस क्लब रायपुर में एक ब्लॉगर मीट का आयोजन किया जा रहा है.

मैं सभी ब्लॉगर बंधुओं, लेखकों, पढने वालों और अन्य मित्रों का स्वागत करता हूँ तथा विनर्म निवेदन करता हूँ कि आप अपना बहुमूल्य समय देकर हमें कृतार्थ करें... उम्मीद से ज्यादा भारोषा है कि आप लोग अपना साथ अवश्य देंगे...

अभिषेक प्रसाद
http://ab8oct.blogspot.com/
http://kucchbaat.blogspot.com/

शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

एक नए शहर में खामोश मुलाक़ात...

मेरी ख़ामोशी कुछ न कुछ अक्सर मुझे कहती रहती है... बस इसी तरह एक और ख़ामोशी मेरे मन में उत्तपन हुई और मैंने बसी ख़ामोशी से उसे सीधी बात पर कह डाली... हम आम व्यक्तियों के बीच से एक ख़ास व्यक्ति डॉक्टर महेश सिन्हा जी ने बड़ी खामोश टिपण्णी दे डाली. टिपण्णी किसे अच्छी नहीं लगती, मुझे भी लगी. सोंचा जानूतो आखिर ये सख्स है कौन जिन्होंने मुझमें अपनी दिलचस्पी दिखाई... मालूम पड़ा रायपुर के निवासी है जिनकी जडें बिहार से जुडी है. संयोग कि मैं भी अभी रायपुर में हूँ. मिलने की, कुछ सिखने की इक्छा जगी... बस एक छोटा सा निवेदन किया उनसे मिलने का. उम्मीद तो था पर मन में कहीं डर भी था कि आखिर क्यों आयेंगे मुझसे मिलने...



पर अगले ही दिन सोमवार ११ जनवरी को उनका फ़ोन आया, मिलने की इक्छा उन्होंने भी प्रकट कर दी. मैंने कहा सर मैं आता हूँ मिलने आपसे तो बड़ी ही आत्मीयता से उन्होंने कहा कि मैं शहर का नया हूँ तो मुझे तकलीफ होगी वो खुद आयेंगे. बुधवार को उन्होंने अपना समय दिया... शाम के लगभग ६:३० में पहुँच गए मुझसे मिलने... बड़ी ख़ामोशी से... साथ में मेरी दीदी श्रीमती प्रज्ञा प्रसाद और जीजाजी श्री राजीव कुमार भी थे...थोडा नर्वस था कि क्या बातें करूँगा... पर जब बात-चीत का दौर चला तो समय का पता ही नहीं चला... देश से लेकर गाँव तक, विज्ञान से लेकर अध्यात्म तक, राजनीती से लेकर परिवार तक की बात हुई...


जब जाने का समय हुआ तो आशीर्वाद भी मिला... मैं रात भर सोंच रहा था... उनके बारे में... मैं उनका धन्यवाद करूँगा कि उन्होंने अपने व्यस्त कार्यक्रम से अपना बहुमूल्य समय निकाला मेरे लिए... आज उनका ब्लॉग देखा... इस मुलाकात की चर्चा भी की है उन्होंने... बहुत अच्छा लगा... ख़ुशी हुई और गर्व भी... मैं तो सोंच ही रहा था इस मुलाकात की चर्चा करने की और उन्होंने मुझसे पहले बाजी मार भी ली... उनके सानिध्य और आशीर्वाद की चाह हमेशा रहेगी मन में और उम्मीद ही नहीं भारोषा भी है कि उनका आशीर्वाद हमारे साथ रहेगा... १७ जनवरी को फिर से मिलने का संयोग प्राप्त हो रहा है... भिलाई से पाबला जी आ रहे है... अच्छा साथ और समय मिलेगा उस दिन... ख़ामोशी और भी गहरी होगी...

महेश अंकल को मेरा सादर प्रणाम...

उनका एक संक्छिप्त परिचय...
ये एक निश्चेतना विशेषज्ञ है. समाचार पत्र परिवार से संबंद रखते है. विद्यार्थी जीवन में नेतागिरी भी की. आज कल डोक्टारी के साथ साथ जीवन का अर्थ समझने की  कोशिश भी कर रहे है...


कई सारे ब्लॉग से जुड़े है....
१. कबीरा खड़ा बाज़ार में
२. पांचवा खम्बा
३. कायस्थ परिवार पत्रिका
४. पहला अहसास
५. अग्रदूत
६. संस्कृति

बाबूजी के खामोश होने के एहसास से

अचानक लगा
फिसल गया हूँ
बाबूजी के कन्धों से

अचानक लगा
छूट गई हैं उँगलियाँ
बाबूजी के हाथों से

अचानक लगा
आज दरवाजे पर कौन खड़ा होगा
लम्बी सी बेंत लिए
देर से घर लौटने पर

आज मैं
सुबह समय पर जग गया
बहार गली में देर तक नहीं खेला
तितलियों के पंख नहीं तोड़े

बस
बाबूजी के खामोश होने के एहसास से !

खामोशी ... सब कुछ कहती है (अविनाश वाचस्‍पति)


सब कुछ कहती है
खामोशी
जो रह जाता है
कहने से सदा।

खामोशी तो है
सदा से ही
कहने की एक
कातिल अदा।

खामोशी को
बदलते हैं जो
उदासी में
वे छीनते हैं
सबका मजा।

खामोशी
एक कायराना
हरकत नहीं
साहस की
बेमिसालीय
मिसाल है।

खामोशी की
नहीं होती है
राशि
जैसे राशि की
नहीं होती है
राशि।

खामोशी की
जमाराशि इन सबसे
बहुत अधिक है
कहीं अधिक है
आपको मालूम है
नहीं मालूम
तो अब मान लो।

खामोशी को
इसकी संपूर्णता में
पहचान लो
जान लो
पर बेवजह
खामोशी की भी
मत जान लो
जीने दो
खामोशी को
शोर की तरह।

चित्र भी पहचानना होगा

बृहस्पतिवार, 14 जनवरी 2010

मेरी जिंदगी का चौराहा... जहाँ मैं ठहर सा गया हूँ...


कभी कभी जिंदगी में ऐसे चौराहे आते है जहाँ से आगे जाने के रास्ते के चुनाव में हम असफल महसूस करने लगते है. कुछ ऐसा ही मेरे साथ हो रहा है आज कल... जिंदगी के ऐसे चौराहे पर आ कर खड़ा हो गया हूँ जहाँ से आगे का रास्ता नजर नहीं आ रहा. चारों ओर देखकर सिर्फ डर लग रहा है... चौराहे के चारो ओर तेज भागती परेशानियां, उलझनों, परिस्थितियों और जिम्मेदारियों की ट्रैफिक से डर गया हूँ... हिम्मत नहीं हो रही किसी भी ओर कदम बढ़ाने की. या यूँ कहूँ तो डर और उलझन में फंस गया हूँ...

किसी रास्ते के चुनाव से जिम्मेदारियों के छूटने का डर है तो किसी रास्ते के चुनाव से विश्वास टूटने का डर है. कोई रास्ता शायद अपनों से दूर ले जायेगा तो कोई मुझे मेरी अपनी संतुष्टि और खुशियों से दूर ले जायेगा... कौन सा रास्ता चुनुं मैं आज? किस ओर बढूँ? यहाँ इसी चौराहे पर खड़ा भी तो नहीं रह सकता ज्यादा देर... कब तक यहाँ रुका रह सकता हूँ... ये सिर्फ एक चौराहा है जिंदगी का न ही मंजिल है और न ही अंत... तो कैसे रुक जाऊँ मैं यहाँ? अपनी जिम्मेदारियों वाला रास्ता चुनता हूँ तो खुद कि संतुष्टि और खुशियों को मारना होगा, विश्वास को चुनता हूँ तो शायद बाकी सबको खोना पड़ेगा... अपनों को चुनता हूँ तो खुद को खो बैठूँगा... अपनी खुशियों को चुनता हूँ तो अपनी जिम्मेदारियों और अपनों से मुंह मोड़ना होगा... आखिर मैं क्या फैसला करूँ? किस ओर जाऊँ?

इतना ज्यादा उलझा हुआ महसूस कर रहा हूँ कि अन्दर से खुद को बिलकुल खाली महसूस कर रहा हूँ. लग रहा है जैसे अन्दर से बिलकुल खाली हो चूका हूँ... बिलकुल हल्का महसूस कर रहा हूँ... तन्हा और अकेला आज महसूस कर रहा हूँ... मुझे किसी से डर नहीं लगता सिवाय तन्हाई के... और आज मैं सबसे ज्यादा तन्हा महसूस कर रहा हूँ... आखिर कब तक बनी रहेगी ये उलझन? आखिर कब तक मैं यूँ ही इसी चौराहे पर खड़ा रहूँगा? आखिर कब तक???

शनिवार, 9 जनवरी 2010

क्या समझूँ...


कुछ दिनों पहले मैंने कहा था कि मेरा जूनून अब ख़त्म हो गया है. लिखने की इक्छा ख़त्म हो चुकी है... पर आज उसने मुझे लिखने के लिए मजबूर कर दिया है. आज सिर्फ उसके लिए कसम तोड़ रहा हूँ... जूनून, जो ख़त्म हो चूका था, आज उसे एक बार फिर जगाने की कोशिश कर रहा हूँ... शायद मेरी ये कोशिश आप सब लोगों को पसंद आये...

मेरी दौड़ती भागती जिंदगी में
अचानक एक ठहराव आया था
जिंदगी अचानक रुक गयी थी,
सोंच कुंद पड़ चुकी थी
प्राण निष्क्रिय हो चुके थे
मैंने तो मान लिया था कि
मेरा अंत आ चूका है
मैंने तो जीते जी अपनी
मौत को स्वीकार लिया था
लेकिन आज तुमने मुझे नया जीवन दे दिया
जीने की वजह, एक उम्मीद दे दी
क्या सोंचा तुमने
क्यों सोंचा मेरे बारे में
आखिर क्या फर्क ही पड़ता है तुम्हे
मेरे लिखने या न लिखने से
तुम्हे फर्क ही क्या पड़ता है
मेरे होने न होने से
मेरे अँधेरे जीवन में
उम्मीद का सूरज उगाने का क्या मतलब समझूँ
तपती धुप में पड़ी मेरी सिथिल आत्मा को
तुमने अपने साए की ढंडक दे दी
इसे क्या समझूँ
तुम मुझे जीतते हुए देखना चाहती हो
मुझे फिरसे जीते हुए देखना चाहती हो
इसे क्या समझूँ
भीड़ भरे चौराहे पर अकेला खड़ा था
परेशान था कि किधर बढूँ
तुमने आकर मेरा हाथ थमा
और जगा दिया विश्वास आगे बढ़ने का
आखिर क्यों
तुम्ही बताओ, आखिर तुम्हारे इस अहसान को
क्या समझूँ...

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