जब आया था तो सब कुछ नया था... शहर नया, गलियाँ, दुकानें, लोग सब नए... बिलकुल अनजाने... एक दो दिन तो बहुत खाली खाली सा लगा... पर जल्द ही इस शहर ने मुझे अपना बना लिए... अवन्ती बाई चौक पर सिगरेट की दूकान, जहाँ मैं रोज सिगरेट पीता था, दूकान वाला अब पहचानने लगा है. मेरे पहुँचते ही बिना कुछ कहे Ultra Mild सिगरेट निकाल कर दे देता है. चौक के पास ही दाहिने वाली गली में स्वस्तिक कंप्यूटर, जहाँ मैं रोज अपने लगभग दो घंटे इन्टरनेट पर बिताता हूँ, वो भी मुझे जान गए है, दुसरे दिन ही उन्हें मेरा नाम याद हो गया था. मेरे पहुँचते ही तीन नंबर वाला केबिन मेरे लिए उपलब्ध हो जाता था... चौक पर की चाय दूकान, जहाँ मैं रोज सबेरे अपनी Morning Walk के साथ चाय पीता था. चाय वाले को याद हो चूका है कि मुझे कम चीनी और कड़क चाय पसंद है.
देखते देखते एक महिना बीत गया और बिलकुल पता नहीं चला... दीदी के ही ऑफिस में काम करने वाले शीतांशु जी (जो की दीदी के घर के बगल में ही रहते है) से मेरी रोज अच्छी बात-चीत होती है, बिलकुल किसी मित्र की तरह. दीदी के घर के बगल में ही रहने वाले एक दम्पति का लगभग डेढ़ साल का बेटा 'हर्ष' अब मुझसे बहुत घुल मिल गया है. उसे टल्ला (टीवी) देखना बहुत अच्छा लगता है. दीदी के मकान मालिक के कुत्ते को भी नहीं भूल सकता, जो रोज आते जाते समय भूंकता जरूर है (हाँ कभी कभी नहीं भी भूंकता है, चुप-चाप पड़ा रहता है).
करीबन दो साल के बाद अपने सबसे अच्छे दोस्त 'अभिषेक अनंत (रिंकू)' से भी मिला (फ़ोन पर तो लगभग हर हफ्ते बात होती है पर मेरे दिल्ली और उसके नागपुर में रहने के कारण मिलने का मौका नहीं मिल पता). दीदी और जीजाजी के बुलावे पर नागपुर से नव-वर्ष मनाने के लिए रायपुर आया था. १ जनवरी को हमने साथ में थ्री इडीयट्स भी देखी और रात का खाना नए बस स्टैंड के सामने वाले Resturant राजघराना में खाया.
२४ जनवरी को हुए ब्लॉगर मीट को भी नहीं भूल सकता, आखिर मेरे जीवन का पहला मौका था जब मैं किसी गोष्ठी में शामिल हुआ था, जहाँ मुझे कहने का, अपनी कविता सुनाने का मौका मिला. जहाँ मैं डॉक्टर महेश सिन्हा जी, अनिल पुसदकर जी, बी एस पाबला जी, ललित शर्मा जी, राजकुमार जी, संजीत त्रिपाठीजी , अंकुर गुप्ता जी, तोषी जी, सूर्यकांत जी एवं कई अन्य ब्लॉगर एवं पत्रकारों से मिला. अगले दिन कुछ अखबारों में इस ब्लॉगर मीट की चर्चा भी थी और मेरा नाम भी था उस में... पहली बार मेरा नाम किसी अखबार में छपा था... इतना गौरवान्वित और उत्साहित महसूस कर रहा था उस वक़्त जैसे मैंने कोई दुनिया जीत ली हो....
कल यहाँ से जा रहा हूँ, वापस दिल्ली... जिंदगी एक सफ़र है, किसी एक पड़ाव पर नहीं रूकती... कुछ विश्राम के बाद फिर आगे बढ़ जाती है... मुझे भी यहाँ से आगे बढ़ना है... ये एक महीने मेरे जीवन के सबसे अनमोल महीने है... इस में मैंने बहुत कुछ पाया है, यहाँ तक कि इसी एक महीने में मुझे मेरा प्यार भी मिला... इसी एक महीने में मेरा लिखने का जूनून भी वापस जागा... इसी एक महीने में मेरी सोंच में बहुत बदलाव आये... ये एक महिना मेरे जीवन का सबसे अनमोल महिना है... जिसे मैं शायद मरने के बाद भी न भूल सकूँ...
कहते है दुनिया गोल है... देखते है अगर ऐसा है तो फिर आऊंगा यहाँ एक दिन... जरूर आऊंगा... अपने रायपुर से मिलने... बिछड़ने का गम तो है पर साथ ही ख़ुशी भी है कि यहाँ से बहुत सी हसीं यादें ले जा रहा हूँ...
दीदी 'प्रज्ञा प्रसाद', जीजाजी 'राजीव कुमार', अपने लंगोटिया यार 'अभिषेक अनंत (रिंकू)' शीतांशु जी, हर्ष, डॉक्टर महेश सिन्हा जी एव, डॉक्टर नितिन मलिक को दिल से धन्यवाद देना चाहूँगा, जिन्होंने मेरे इस महीने को यादगार बनाने में अहम् भूमिका निभाई...
अगली बार मिलने तक अलविदा रायपुर...

































