मैं कौन हूँ? ये एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब २७ सालों के बाद भी मैं नहीं ढूंढ़ पाया हूँ... पर यकीन मानिए रोज कोशिश करता हूँ इस जवाब को ढूंढने का. आखिर मेरा क्या अस्तित्व है... मैं कौन हूँ??? मैं रोज सुबह इसलिए नहीं जागना चाहता कि मुझे उठ कर ऑफिस जाना है, रात को इसलिए नहीं सोना चाहता कि सुबह ऑफिस जाने के लिए उठना है... मैं सोना चाहता हूँ खुद के लिए, जागना चाहता हूँ खुद के लिए... कुछ ऐसा करना चाहता जिससे मुझे ख़ुशी मिले, संतुष्टि मिले, जिस काम को कर मेरा दिल खुश हो... जिससे मुझे गर्व की अनुभूति हो...
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मंगलवार, 4 मई 2010

सवाल...

मैं कौन हूँ??? मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा सवाल... आखिर मैं कौन हूँ? मेरा क्या अस्तित्व है? इस दुनिया के लिए आखिर मेरी क्या जरूरत है? मैंने इस धरती पर जन्म क्यों लिया है? मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ?

ये कुछ ऐसे सवाल है जिनके जवाब ढूंढने की मैं बहुत कोशिश करता हूँ... पर हर बार नाकामयाबी के सिवाय कुछ हाथ नहीं लगता. खोजता रह जाता हूँ इन सवालों के जवाब पर अँधेरे के सिवाय और कुछ नजर नहीं आता. आखिर मैं कौन हूँ? मेरी पहचान क्या है? क्या मेरी पहचान सिर्फ मेरा नाम है? नाम... वो भी तो किसी और का दिया हुआ है.... फिर मेरा क्या है? मेरी क्या अस्तित्व है?

रोज सुबह जागना, तैयार होना, ऑफिस जाना और देर रात वापस आकर फिर सो जाना ताकि अगली सुबह उठकर फिर से ऑफिस जा सकूँ... क्या यही दिनचर्या मेरी जिंदगी की राह बन गयी है? क्या पूरी जिंदगी इसी दिनचर्या के साथ उम्र गुजारनी होगी? इन सबके बीच मेरा क्या है? कौन सा समय है जिसे मैं हक़ से अपना कह सकूँ? कौन सा काम है जो मेरा है?

चारो तरफ दिन के उजालों में भी अँधेरे के सिवाय और कुछ नहीं दीखता... दुनिया की भीड़ में भी खुद को सिर्फ अकेला पाता हूँ... चारो ओर शोर है पर अजीब सी तन्हा शांति महसूस होती है... कई चेहरे है आस पास पर अपना कोई चेहरा नहीं लगता... आखिर इस दुनिया को मेरी क्या जरूरत है? मैं क्यों हूँ इस दुनिया की भीड़ में? आखिर मैंने इस धरती पर क्यों जन्म लिया है?

मैं अपने आपको कवि, लेखक कहता हूँ... लोग मानते भी है... शब्दों से खेलता हूँ... शब्दों के सहारे भावनाओं से खेलता हूँ... हर तरह की भावनाएं.... दोस्ती की, प्रेम की, दुःख की, सुख की, रिश्ते की भावनाएं... पर फिर भी खुद को बिलकुल भावना विहीन महसूस करता हूँ... आखिर क्यों? कहाँ चली गयी मेरी सारी भावनाएं? मैं आज खुद को न किसी का दोस्त मानता हूँ और न ही किसी का हमसफ़र... न मैं किसी का सहारा खुद को समझता हूँ और न ही किसी का साथी.... आखिर मैं अकेला कैसे रह गया? जबकि कई लोग मेरे साथ है.... फिर भी अकेला क्यों महसूस करता हूँ?

कुछ दिनों पहले भी मैंने कहा था कि "मैं जो प्रेम की, दोस्ती की, विश्वास की बातें करता हूँ आज मैं खुद किसी से प्रेम नहीं करता, आज मैं खुद को किसी का दोस्त नहीं मानता, आज मुझे खुद पर ही विश्वास नहीं है..." आखिर मेरा विश्वास कहा खो गया. एक समय था जब मैं हमेशा कहता था कि "I am best and nobody is better than me" पर आज मुझे लगता है कि "I am the worst and everybody is better than me"... मेरा वो विश्वास कहाँ खो गया? मेरा खुद पर वो घमंड कहाँ चला गया?

कई सारे सवाल है मेरे जेहन के अन्दर और जवाब सिर्फ एक... तन्हा अँधेरा... कौन देगा मुझे मेरे इन सवालों के जवाब? कौन बताएगा मुझे कि मैं कौन हूँ?

4 कुछ आपकी खामोशी:

kshama ने कहा…

Shayad aisa samay har kisee ke jeevan me aata hai...har koyi apna atmwishwas kho baithta hai..chahe zahir ho na ho..

संजय भास्कर ने कहा…

... बेहद प्रभावशाली है ।

pramod ने कहा…

very nicely narrated . very touchy.

Pratibha The Talent ने कहा…

Very effective.

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