बस ज़रा सोंचिये क्या सजा होनी चाहिए इस गुनाह की...

बृहस्पतिवार, 17 मई 2012
(चित्र बड़ी मुश्किल से पहली बार खुद डिजाइन किया है इस आलेख के हिसाब से)

बहुत दिन हो गया है न मैंने सोंचा है और न सोंचने के लिए आप लोगों को कोई मुद्दा दिया है... मेरे ही पास ऐसा कोई मुद्दा भी नहीं था और अभी ऐसा कुछ सोंच भी नहीं रहा था... परन्तु आज बस ज़रा सोंचिये... 

आज बात परिवारवाद की करता हूँ. अब आप ये मत सोंचने लग जाना कि मैं किसी बड़ी राजनितिक पार्टी का नाम लेने वाला हूँ. क्योंकि ऐसा करने का न कोई मकसद है और न ही कोई फायदा. दुनिया जानती है उस परिवार को, उसके द्वारा किये गए हर गलत काम को, परिवारवाद को बढ़ावा देकर अपना उल्लू सीधा करने को और देश को उल्लू बनाने को, देश को कंगाली की हालात में पहुंचा कर खुद अमीरी की सीढीयाँ चढ़ने को... मैं बस एक मुद्दा उठाना चाहता हूँ, एक ऐसा मुद्दा जो छोटा भले दिखे पर छोटा है नहीं. धोखाधरी (फ्रौड) की श्रेणी में ये अव्वल न हो तो उससे कम भी नहीं होगा. आज ये मुद्दा मेरे दिमाग में इसलिए आया कि हमारे सबसे बड़े परिवारवाद को समर्थन देने वाले राजनितिक पार्टी से ये भी जुड़े है... तो इनमें भी वे गुण तो आयेंगे ही...

साहब बहुत बड़े तो नहीं पर छोटे स्तर पर भी नहीं आते... पर रहने दीजिये बात इसकी नहीं करते... बात करते है उस मुद्दे की... वोटर कार्ड का नाम तो सबने सुना होगा, वोटर लिस्ट में नाम भी होगा (अगर नहीं है लिखवा लीजिये)... आप कई जगह अपना नाम वोटर लिस्ट में लिखवा सकते है... हाँ... मजाक नहीं कर रहा मैं... इस देश में सब संभव है... जहाँ आप रहते है या जहाँ के रहने वाले है वहां नाम लिखाना तो आसान है ही... वहां भी लिखा सकते है जहाँ न आपका निवास है और न कोई निवास प्रमाण-पत्र... अरे आपको तो मेरी बात पे विश्वास ही नहीं हो रहा... देखो यार मैं सीरिअस मुद्दे पर मजाक तो बिलकुल नहीं करता... और अगर आपके परिवार में कोई व्यक्ति राजनीति से जुडा है तब तो बहुत आसान है और अगर वो राजनितिक व्यक्ति किसी स्तर पर भी लीडर है तब तो सोने पे सुहागा...

इस देश में कुछ भी संभव है... कुछ भी का मतलब कुछ भी... पहले तो मैंने सिर्फ ये सुना था कि कोई व्यक्ति कहीं से भी चुनाव लड़ सकता है, वहां से भी जहाँ न वो रहता है और शायद कभी गया भी न हो... उदाहरण के तौर पे आप हमारे प्रधान-मंत्री साहब को ले सकते है... घर उनका पंजाब में है पर सांसद वो असम से है... भाई ये है हमारे अखंड भारत की पहचान... व्यक्ति पुरे देश का है... न कि सिर्फ एक जगह का... वो अलग बात है कि जब आपको कोई सिम कार्ड लेना हो, गाडी खरीदनी हो, ड्राइविंग लाइसेंस बनवाना हो, लोन लेना हो, घर लेना हो, इत्यादि-इत्यादि तो आपको उस जगह विशेष का प्रमाण-पत्र देना होगा... वरना तो ये सपने छोड़ ही दीजिये..

खैर लगता है मैं मुद्दे से भटक रहा हूँ... मुद्दा तो वोटर लिस्ट में नाम का है... एक व्यक्ति जो रहता शहर अ में है, उसकी पूरी पढाई-लिखाई उसी शहर से होती है, उसके पिता उसी शहर में रहते है, उसका अपना घर उसी शहर में है, जाहिरतौर पर स्कूल-कॉलेज में उसी शहर का पता रजिस्टर्ड होगा... लेकिन उस व्यक्ति का नाम शहर ब के वोटर लिस्ट में लिखा हुआ है और वोटर कार्ड भी शहर ब का बना हुआ है... व्यक्ति शहर ब जा के इमानदारी से अपना वोट भी डालता है इसलिए क्योंकि उसके कोई रिश्तेदार शहर ब के रहने वाले है और वहां से चुनाव लड़ते है और जीतते भी है शायद... अब ये समझ में नहीं आया कि उस व्यक्ति का वोटर कार्ड शहर ब में बना कैसे... घर उसका वहां नहीं है, शिक्षा-दीक्षा भी वहां से नहीं हुई, घर वहां नहीं है, पिता भी वहां नहीं रहते... तो फिर कैसे बना? वोटर कार्ड बनवाते समय उसने प्रमाण कहाँ से उपलब्ध करवाए? उसने साबित कैसे किया कि वो शहर ब का निवासी है? जाहिर तौर पर नेता जी ने ये सब करवाया होगा... पर आखिर क्यों? एक अदद वोट के लिए... क्या नेता जी को अपने कार्य और अपनी छवि पर भरोषा नहीं है जो एक एक वोट के लिए इतना बड़ा धोखा न सिर्फ देश के साथ बल्कि हर व्यक्ति के साथ... अब ये तो मैंने सिर्फ एक उदाहरण दिया... नेताजी ने इस तरह अपने पुरे परिवार को शहर ब का निवासी साबित कर रखा होगा... और वो सरे लोग अपने मूल निवास क्षेत्र के भी निवासी होंगे... मतलब संविधान के साथ भी मजाक... एक मत देने का अधिकार है और व्यक्ति एक ही समय में दो जगह का निवासी होने के साथ-साथ दो मत देने का अधिकारी भी है...

खुले-आम इस देश में संविधान और कानून का मजाक उड़ाते हुए व्यक्ति देश को धोखा दे रहा है... ऐसे लोगों के साथ क्या करना चाहिए? देश के साथ धोखा करने वाले को, देश में अपराध करने वालों को देश-द्रोही, अपराधी और गद्दार कहा जाता है तो क्या ऐसे लोगों को भी देश-द्रोही करार नहीं देना चहिये? ऐसे लोगों को भी सजा नहीं देना चाहिए? क्या ऐसे व्यक्ति हमारे नेता होने के लायक है? क्या ऐसे लोगों को अपना लीडर-अपना अभिभाभाक स्वीकार करना चाहिए? ये राजनितिक लोग तो अपराधी है ही क्या वो अपराधी नहीं है जो उनका साथ देने के लिए अपराध कर रहे है?

क्या लिखूं मैं? और आखिर क्यों लिखूं मैं? क्या फर्क पड़ जायेगा मेरे लिखने से या कुछ कहने से? ऐसे लोग न पहले सुधरे हुए थे और न आगे सुधरने वाले है... ऐसे लोग लाख खुद को साफ़-छवि का ईमानदार व्यक्ति कहे, दुनिया भले इनको इज्जत की नजर से देखती हो पर मैं न इन्हें स्वीकार पाता हूँ और न ही इनका सम्मान कर पाता हूँ... और न कभी करूँगा... मेरे ख्याल से ऐसे लोगों की उम्मीदवारी ख़त्म होनी चाहिए और ऐसे लोग जिन्होंने दुसरे शहरों में अपने नाम के वोटर-कार्ड बनवा रखे है उनकी इस देश की नागरिकता ख़त्म होनी चाहिए... पर आखिर ये करेगा कौन? जहाँ हर व्यक्ति अपने-आप में अपराधी हो वहां सजा देने का अधिकारी कौन है?

लेकिन बस ज़रा सोंचिये कि क्या ये सही है???

क्या लिखूं उसके बारे में...

बुधवार, 16 मई 2012
कल उनकी पहली शिकायत मिल गयी... कहा "सब पर कुछ न कुछ लिखते है... आज अपने दिल पर लिख डाला... मुझ पर कभी कुछ नहीं लिखा..." अब उनको कौन समझाए कि जो कल लिखा है वो अपने दिल पर नहीं उन्ही पर लिखा है. ये अलग बात है मुख्य किरदार अपने दिल को बना डाला पर केंद्र तो वही थी. अब कौन उनको समझाए कि अपने दिल को तो बलि का बकरा हमने यूँ ही बना दिया, मुद्दा तो उनके लिए बसे प्यार को जताने का था. माना कि हम सिर्फ उनके बारे में ही नहीं लिखते पर ये सरासर गलत आरोप है हम पर कि हम उनके बारे में बिलकुल नहीं लिखते. उनको हमारी जिंदगी में आये अभी कुछ ही वक़्त तो हुआ है... पहले ठीक से अपनी गिरती-संभलती, अँधेरे से उजाले की ओर निकलने की कोशिश करती इस जिंदगी को तो दुरुस्त कर ले... पहले इस कलम से निकलने वाले दर्द की स्याही को तो निकाल के बाहर फ़ेंक दूँ... पहले इस दिमाग से दुखों के सपनो को तो भूला सकूँ... पहले अपनी आँखों से आंसुओं के हर एक बूँद को तो सुखा सकूँ... फिर लिखूंगा उनके लिए, सिर्फ नहीं पर उनके भी लिए...

अभी क्या लिखूं उनके बारे में... क्या किसी शब्दों में बाँध पाऊंगा उनके वजूद को? क्या कोई शब्द उनकी खूबसूरती के साथ इन्साफ कर पायेगा? क्या कोई शब्द उनकी अच्छाई को दर्शा पायेगा? क्या कुछ शब्दों का समूह उनके बेशुमार प्यार को जाता पायेगा? फिर क्या लिखूं उनके बारे में...?

फिर भी सोंचा एक कोशिश तो कर ही लूँ... आखिर उन्होंने खुद कहा है कि उनके बारे में भी कभी लिखूं तो एक कोशिश तो बनती है... कल रात भर जागा रहा... कभी बंद कमरे में अपने बिस्तर पर आँखें मूँद के सोंचा... कभी छत पर खुले आसमान के नीचे तारों के बीच उनके लिए शब्दों को ढूंढा... कभी बालकोनी में खड़े होकर बहती ठंडी हवाओं से पूछा... तो कभी घर से सामने की सड़क पर टहलते हुए रात के वीरानों में तलाशा...

पर एक भी ऐसा शब्द नहीं मिला जो उसे साक्षात न सही कम से उसके रूप को दर्शा तो सकें. कल दिन के उजालों में भी चारों ओर नजरें दौडाई... सोंचा कुछ तो होगा इस धरती पर जो उसे परिभाषित कर सकें... गुलाब को देखा तो उसमें कांटें नजर आये... पहाड़ को देखा तो उसमें कठोरता नजर आई... समुन्दर की तरफ नजरें की तो एक वीराना नजर आया... हवाओं की तरफ देखा तो अस्थिर नजर आया... नदियों की तरफ देखा तो वो अपना वजूद खोती नजर आई... सूरज में सिर्फ जलन और तपन थी... तो चाँद में दाग के साथ उधार की रौशनी थी... तारें भीड़ में भी अकेले पड़े थे... रेगिस्तान में खालीपन भरा था... मंदिर गया तो दुआओं का असर भी कम लगा... मस्जिद की चौखट पे जो रखे कदम पर अजान के स्वर भी कम लगे... गिरजा भी गया और गुरुद्वारे भी पर कोई न मिला... ऊपर वाले की तरफ देखा तो वो भी दूर नजर आया... 

आखिर कहाँ से ढुंढू उसे जो उसे परिभाषित कर सके... जो उसकी खूबसूरती के साथ न्याय कर सके... जो उसके वजूद को यथार्थ कर सके... अब तो उसी से पूछना चाहता हूँ कि क्या लिखूं उसके बारे में...

कौन सही है मैं या मेरा नक्चढ़ा दिल...

मंगलवार, 15 मई 2012
कुछ दिनों पहले की बात है या शायद कुछ महीने पहले की बात है.... अब छोडो यार खुद डिसाइड कर लो आप लोग कि दिनों पहले की बात है या महीनों पहले की... जब की बात हो क्या फर्क पड़ता है, फर्क पड़ता है  बात से न कि समय से... हाँ तो बात उस समय कि है जब मेरा बांया हाथ दूसरी बार नाराज होकर चटक बैठा था. उस वक़्त मेरी गर्दन ने बहुत हो-हल्ला मचाया था... उसकी दास्ताँ मैं सुना चूका हूँ... कुछ दिनों से मेरे सीने में धड़कते दिल ने मेरे घर में कोहराम मचा रखा है... 

पूछने की बहुत कोशिश की पर कमबख्त सीधी तरीके से कुछ भी सुनता ही नहीं. आखिर सबसे जयादा दुलारा जो है मेरा इसलिए थोडा नक्चढ़ा हो गया है. कल काफी मिन्नत की उससे, घुटने टेके उसके सामने, कई जोक्स सुना डाले, गुदगुदी कर डाली... तब जाके कहीं माना और कोहराम का कारण बताना शुरू किया. (अब आप लोग ये मत पूछना कि कुछ दिन से परेशान कर रहा था तो कल ही इतनी मिन्नत क्यों कि, सीधा सा जवाब है कल रविवार की छुट्टी थी... अब बाकी दिन इतना समय नहीं मिलता है न)... हाँ तो दिल से जो मेरी बातचीत हुई उसका विवरण दे रहा हूँ... आप ही बताइयेगा कौन सही है मैं या मेरा नक्चढ़ा दिल...

मैं: "क्या हो गया मेरे जान क्यूँ नाराज बैठा है? क्यूँ इतना कोहराम मचा रखा है? आखिर ऐसा क्या कर दिया मैंने?"
दिल: "क्या किया है तुमने? यु स्टुपिड आदमी किता तंग कर रखा है तुमने मुझे, पता है तुम्हे?"
मैं: "पर मैंने किया क्या है मेरे प्यारे?"
दिल: "अब तुम मेरे दिमाग ताऊ को मत खराब करो, वैसेईच अपन का मूड थोडा बिग्ड़ेला है."
मैं: "पर क्यूँ? यही तो पूछ रहा हूँ. देखो अगर कोई गलती हो गयी है तो माफ़ कर दो. देखो कान पकड़ता हूँ अपने."
दिल: "ओये हेल्लो गलती करो तुम, और साला पकड़ो मेरे कान भाई को. नहीं चलेगा, साला ये बिलकुल नहीं चलेगा. एक चमाट लगवा डालूँगा हाथ भाई को बोल के फिर सोंच लियो अपना हाल."
मैं: "ठीक है यार. ये लो अपने घुटने टेकता हूँ तुम्हारे आगे. अब तो बता दो... प्लीज़......"
दिल: "फिर साला अपनी गलती की सजा मेरे दोस्त को दे रहा है... तुझे पता है न अपना कितना खासमखास है मेरा यार 'घुटना'... देख साला अपने दिमाग ताऊ वहीँ रहते हैं हमेशा... तो सोंच के कहियो कुछ भी..."
मैं: "अरे मेरे बाप... गलती हो गयी यार... बता भी दे... क्यूँ इतना भाव खा रहे है?"
दिल: "साले तू भी न बहुत तंग करता है मुझे... अच्छा एक बात बता.."
मैं: "क्या...?"
दिल: "गर्दन बहन की तकलीफ तो बड़ी तलीनता से सुनी तुने... और मुझसे पूछा तक नहीं एक बार भी..."
मैं: "अरे यार तो इतनी देर से मैं क्या कर रहा हूँ?"
दिल: "तू फिर अपन के साथ... मैं नहीं बता रहा अब"
मैं: "अच्छा यार सॉरी सॉरी सॉरी..."
दिल: "एक बात और बता..."
मैं: "पूछ..."
दिल: "मेरा काम आखिर क्या है?"
मैं: "मतलब????"
दिल: "मतलब क्या मतलब... हिंदी में पूछा है तुझसे... समझ में नहीं आता क्या... छोड़ तू भी क्या समझेगा... तेरी बुद्धि तो आज कल कहीं और घांस चरने गयी है... मेरा काम सीधा सा है तेरे शरीर में बहते खून को साफ़ करता हूँ और तेरे पुरे शरीर को उसकी सप्लाई कर देता हूँ..."
मैं: "हाँ... तो..."
दिल: "तो के बच्चे... आज कल इस काम के लिए तो बड़ा कम समय देता है और जो काम मेरा नहीं है वो करवाता रहता है..."
मैं: "मतलब?"
दिल: "तू भी न साला कुछ भी नहीं जानता... यार एक बात बता मैंने किसी को अपने घर रखने का ठेका लिया है?"
मैं: "मतलब  :(  "
दिल: "मतलब तुने जो उसको फ्री फंड में मेरे घर में बिठा रखा है उसके बारे में बात कर रहा हूँ... न घर का किराया तय किया न एडवांस दिया... बस मेरी छोटी बहन आँख के घर के रास्ते सबको धोखा देते हुए मेरे घर में घुसा दिया..."
मैं: "यार... अब तू भी न... तुझे पता है वो कौन है... अब देख मुझपर-तुझपर अब उसका ही तो हक़ है..."
दिल: "चल छोड़-छोड़.. दिमाग ताऊ का दही मत कर... तुझपर हक़ है ये तो समझा... पर मुझपर क्यों??? उसका दीदार किया आँख बहनों ने, उसने अंगूठी पहनाई अंगुली भाई को... फिर साला मैं क्यों उसके लिए परेशान रहूँ... जिस अंगुली भाई को उसने अंगूठी पहनाई वो तो मजे में सोने में खेल रहा है... सोने की अंगूठी पे इतर रहा है... सबको खुश हो-होकर खुद को दिखा रहा है... आँख बहनों ने भी उसकी खूबसूरती को खुद में बसा लिया... जब न तब उसकी तस्वीर को निहारने लगती है... फिर साला मैं क्यों फ्री-फंड में ओवर-ड्यूटी करूँ???"
मैं: "......."
दिल: "हो गया न चुप... एक तो चल पहले उसे मेरे घर में बसाया तो बसाया... अब उसकी यादों ने भी कब्ज़ा कर लिया है... उसकी बातें है कि हवाओं की तरह मेरे घर में इधर से उधर घुमती रहती है... साला मैं अपने काम पे कंसंट्रेट ही नहीं कर पता... पूरा दिन इन्हें संभालने में ही वक़्त गुजर जाता है... एक तो अपना काम भी करो और ऊपर से साला इनको भी संभालो... अपने से ये दोनों काम नहीं होने वाले..."
मैं: "यार... पर इसमें मेरी गलती कहाँ है... ???"
दिल: "तो मेरी गलती है? देख अभिषेक ! अपना दिमाग खराब न कर... मूड साला बहुत ख़राब है... सोंच के बता कौन सा काम करना है... या तो मैं अपना खून की सप्लाई वाला काम करूँ या फिर इनको संभालूं दिन भर... अब तू बता"
मैं: "भाई मेरे..."
दिल: "साला भाई नहीं बोलने का..."
मैं: "अच्छा यार... सॉरी... देख कुछ दिन की तो बात है... अभी थोडा ओवर-ड्यूटी, एक्स्ट्रा-वर्क कर ले... फिर हम दोनों मिल के संभालेंगे... यार देख तुझे पता है अभी वो मेरे पास, मेरे घर में नहीं है... अभी नहीं ला सकता न उसे... इसलिए तो तब तक तेरे घर में बसा रखा है... बाद में हम दोनों मिल के उसका ख्याल रखेंगे... वैसे एक सच बताऊँ?"
दिल: "क्या बोल... "
मैं: "उसे तेरे घर में न रखूं तो कहाँ रखूं? मैं तो पूरी जिंदगी उसे तेरे घर से नहीं निकाल सकता और निकालूँगा भी नहीं... तुझे दिक्कत हो रही है तो तू अपना खून सप्लाई का काम बंद कर दे पर उसे तकलीफ नहीं होनी चाहिए... रहेगी तो वो हमेशा तेरे ही घर... और एक बात बता..."
दिल: "क्या बोल यार..."
मैं: "आखिर तू उससे प्यार भी तो करता है..."
दिल: "...."
मैं: "अब तेरी चुप्पी आ गयी न... अब बता तू बोल क्या करना है... निकाल लूँ उसे तेरे घर से..."
दिल: "अब छोड़ यार अवि, तू भी न साला ईमोसनल कर देता है... चल कोई नहीं कर लूँगा यार एडजस्ट..."
मैं: "अरे... नहीं... तू क्यों एडजस्ट करे... मैं अभी निकाल देता हूँ न उसे..."
दिल: "नहीं.. नहीं..."
मैं: "क्यों अभी तो तू इतना हल्ला मचा रहा था..."
दिल: "अब छोड़ न यार... कितना तू बातों को पकड़ता है... रहने दे यार मेरे घर में उसे... मेरे घर में भी रौनक बनी हुई है... और पता है... उसकी यादें तो इतनी चंचल है न कि बस पुरे दिन भर मेरे घर से निकलने वाली नसों के रास्ते पुरे बदन में दौड़ती रहती है... और तो और दिमाग ताऊ पर भी कब्ज़ा कर लिया है... और उसने तो अपने व्यवहार और प्यार से आत्मा तक को अपना बना लिया है..."
मैं: "  :-)  "

अब आप सब गुणी-जन ही फैसला कीजिये और हो सके तो कुछ सलाह जरूर दीजियेगा...

ख़ुशी :-) और गम :-(

बुधवार, 9 मई 2012
बहुत दिनों से सोंच रहा था कुछ सार्थक लिखूं... अब इसका ये मतलब बिलकुल नहीं कि अब तक निरर्थक लिखता आ रहा था... पर सोंचा बहुत दिन हो गए लोगों को कुछ ज्ञान नहीं बांटा... वैसे ऐसा नहीं है कि आज अचानक दिमाग में कीड़ा घुस गया ज्ञान बांटने का... हुआ यूँ कि मेरे एक अजीज ने एक ऐसी बात रख दी मेरे सामने कि मजबूर हो गया आज लिखने को... लिखना तो कल से ही चाह रहा था पर कल ऑफिस में काम ज्यादा था और उसके कारण समय कम... और आज कल मैं घर पर सिर्फ आराम करता हूँ और कुछ नहीं...

आज मैं अपनी एक छोटी सी सोंच आप सबके सामने रखना चाहता हूँ. सोंच ख़ुशी और गम पे... क्या है ख़ुशी और क्या है गम? हर व्यक्ति के लिए ख़ुशी और गम की परिभाषा अलग-अलग होती है. हर व्यक्ति के लिए ख़ुशी और गम के मायने अलग-अलग होते है. कोई चीज अगर हमें ख़ुशी देती है तो किसी को गम भी दे सकती है. अगर हम खुश है तो कतई जरूरी नहीं कि दुसरे भी खुश रहेंगे. जहाँ तक मैं सोंच पाता हूँ, ख़ुशी और गम को परिभाषित करना सबसे आसान है... इन्हें सिर्फ एक ही पंक्ति में परिभाषित किया जा सकता है. ख़ुशी और गम सिर्फ एक ही बात पर निर्भर करती है और वो है आकांक्षा... अगर हमारी आकांक्षा पूरी हो जाये तो ख़ुशी और अगर न पूरी हो तो गम... अगर हमारी इच्छा के अनुरूप हो तो हमें ख़ुशी होती और अगर न हो तो गम होता है... और ये बात हर काम, हर चीज, हर सोंच, हर सपने, हर रिश्ते के लिए लागू होती है. व्यक्ति के हिसाब से उसकी इच्छा बदलती रहती है. हर व्यक्ति की इच्छा की सीमा अलग-अलग होती है.

अब बात करता हूँ इसी ख़ुशी और गम के समय व्यक्ति के व्यवहार की. ये दोनों ही किसी भी व्यक्ति को पागल करने के लिए काफी है. जब व्यक्ति खुश होता है तो अपनी ख़ुशी किसी के साथ भी बांटता है... या शायद सबके साथ बांटता है. व्यक्ति अपनी ख़ुशी हर किसी के साथ बाँट सकता है... अपने परिवार के साथ... दोस्तों के साथ... दोस्तों के दोस्तों के साथ... मोहल्ले वालों के साथ... सफ़र में यात्रियों के साथ... किसी के भी साथ... व्यक्ति अपनी मुस्कान पूरी दुनिया को दिखाता है... पर गम व्यक्ति सिर्फ अपने करीबियों के साथ बांटता है. करीबी जो दिल से करीब होते है. व्यक्ति अपने आंसू सिर्फ उनको दिखाता है जो उसके सबसे करीब होते है और जो सच में उसके अपने होते है. इसलिए शायद कहा जाता है कि गम में अपनों की पहचान होती है. और मैं कहता हूँ गम में जो आपका साथ दे वो तो अपना है ही पर जो अपने गम में आपका साथ चाहे वो सबसे जयादा आपका अपना है...

मेरे ख्याल से खुश रहने के तीन तरीके है...
१. हर व्यक्ति को कुछ-न-कुछ जरूर करना चाहिए. कुछ जो वो सच में करना चाहता है. कुछ जो उसका दिमाग नहीं दिल करना चाहता है.
२. हर व्यक्ति को किसी-न-किसी से जरूर प्यार करना चाहिए. और ये कोई भी हो सकता है. कोई व्यक्ति, दोस्त, परिवार, कोई भी पशु-पंक्षी, कोई पेड़ या कोई भी.
३. हर व्यक्ति के मन में कोई-न-कोई आशा होनी चाहिए. ये आशा किसी भी चीज के लिए हो सकती है.
और इन तीनों के लिए व्यक्ति को ईमानदार होना चाहिए भले ही वो दुनिया के लिए ईमानदार न हो.

Leo F. Buscaglia ख़ुशी के बारे कहते है... "Too often we underestimate the power of a touch, a smile, a kind word, a listening ear, and honest compliment, or the smallest act of caring, all of which have the potential to turn a life around." 

आज बहुत कुछ लिखना चाहता हूँ...

बृहस्पतिवार, 3 मई 2012

कि आज फिर कुछ लिखना चाहता हूँ
पर न जाने क्यों लिखना संभव नहीं हो पा रहा है
कुछ तो है मन में जिसे पन्नो पे उतारना चाहता हूँ
कुछ तो है जिसे शब्दों में बांधना चाहता हूँ
पर न जाने क्यों बांधना संभव नहीं हो पा रहा है

बैठ तो गया हूँ कागज़-कलम लेकर अपनी
पर शब्द है पीछा छुड़ा के भाग रहे है मुझसे
छिप रहे है कोनो में, बच रहे है मेरे सामने आने से
मैं उन्हें पकड़ के अपनी सोंच में पिरोना चाहता हूँ
पर न जाने क्यों पिरोना संभव नहीं हो पा रहा है

तेरी तारीफ़ के लिए ढूंढ़ रहा हूँ कुछ फूल नए
तेरी चहक के लिए तलाश रहा हूँ कोई पंक्षी दीवानी
चंचलता तेरी नदियों को देना चाहता हूँ 
तेरे सपनो को आज अपनी आँखों में सजाना चाहता हूँ
पर न जाने क्यों सजाना संभव नहीं हो पा रहा है

कि आज फिर कुछ लिखना चाहता हूँ
तेरी खूबसूरती के लिए नए रंग तलाशना चाहता हूँ
तुझसे आज मैं अपना बनाना चाहता हूँ
कि आज फिर बहुत कुछ लिखना चाहता हूँ...

हत्या या आत्म-हत्या... प्यार या गुनाह...

बुधवार, 2 मई 2012

शनिवार का अखबार पढ़ रहा था.... अब इस बात को छोडिये कि शनिवार का अखबार आज क्यों पढ़ रहा था. ये उतना महत्वपूर्ण नहीं है. एक बड़ी रोचक सी घटना का जिक्र था. एक रेप के आरोपी कैदी ने जेल में ही आत्महत्या कर ली. लेकिन आखिर क्यों??? ऐसा तो हुआ नहीं होगा कि उसे आत्म-गलानी और अपराधबोध हुआ हो. ऐसे जघन्य अपराध करने वालों के साथ ऐसा नहीं होता. वो तो सजा पाने के बाद भी ऐसी ही विकृत सोंच में डूबे होते है. ऐसे लोगों के लिए मैं सिर्फ इतना ही कहता हूँ कि ये लोग मानसिक रोगी है... पागलखानों में जितने पागल रहते हों उन सबसे बड़े पागल होते है ये... और ऐसे लोगों के लिए कोई जेल नहीं होनी चाहिए बल्कि सीधे मौत की सजा दे देनी चाहिए. और उस आरोपी के साथ भी बिलकुल ऐसा ही हुआ. फर्क सिर्फ इतना है कि उसे मौत की सजा किसी और ने नहीं बल्कि खुद उसने खुद को दे दी. जेल के बाथरूम में कम्बल को फाड़ के उसकी रस्सी बनायीं और खुद को फांसी के सजा दे दी. ये उसने बहुत अच्छा काम किया. हमारे अति-व्यस्त अदालतों का समय जाया होने से बचा दिया. लेकिन उसने आत्म-हत्या की क्यों ये एक बड़ा सवाल है. मैंने पहले भी कहा कि उसे आत्म-ग्लानी या अपराधबोध तो हुआ नहीं होगा.. पर सच्चाई ये है कि उसे उसके अपराधबोध ने नहीं मारा... उसे उसने खुद भी नहीं मारा... जेल के अन्दर ही उसकी हत्या कर दी गयी. हाँ मैं सच कह रहा हूँ... उसे जेल के बंद बाथरूम के कमरे में फांसी से लटका दिया गया. ये कोई सनसनीखेज खुलासा नहीं है, ये तो रोजमर्रा की, आये दिन होने वाली घटना है. रोज कितने ही इसका शिकार होते होंगे. पर मालूम नहीं चल पता हमें. और आज इसके बारे में पता चला पर इसे आत्महत्या का नाम देकर इस हत्या पर पर्दा डाल दिया गया.

चलिए मैं आप लोगों को इस हत्या की घटना क्रम से वाकिफ कराता हूँ.

बात छोटी सी थी. एक लड़का और एक लड़की एक दुसरे से प्यार करते थे. लड़की थोड़ी कम उम्र की थी पर सिर्फ उम्र कम रही होगी, भावनाएं नहीं तभी तो जब घर वालों ने इसकी खिलाफत की तो लड़की लड़के के साथ अपना घर छोड़ के भाग गयी और शादी रचा ली. लड़की के घर वालों ने खोज खबर लगानी शुरू कि और कुछ दिनों के मेहनत के बाद पुलिस की मदद से ढूंढ़ निकाला उन दोनों को. एक नाबालिक लड़की को घर से भागने के आरोप में लड़के को जेल हो गयी. अपहरण और बलात्कार का आरोप लगा लड़के पर. लड़की ने घरवालों के दबाव में उसकी पुष्टि भी कर दी, अब अगर उस लड़के ने आत्म-हत्या कर ली तो क्या गलत कर लिया? हाँ ये जरूर कहूँगा कि उसे इतना कमजोर नहीं होना चाहिए, पर मेरे ख्याल से उसने कमजोर पड़ कर आत्म-हत्या नहीं की होगी बल्कि मजबूती से अपनी बदनामी का सामना करते हुए एक सन्देश छोड़ गया इस समाज के लिए कि सच में गुनाहगार कौन है...

उसने एक गलती की इस समाज में प्यार करने की गलती, दूसरी गलती कम उम्र की लड़की से प्यार करने की, तीसरी गलती घर से भागने की... पर इन गलतियों के लिए मौत की सजा क्या ज्यादा नहीं है? और फिर उन गुनाहगारों का क्या जिन्होंने उसे आत्म-हत्या के लिए मजबूर किया? लड़की अपनी भावनाएं तो नहीं रोक पायी, प्यार भी किया, घर से भागी भी, शादी भी की पर अपने घरवालों का सामना न कर सकी.. उसका साथ न निभा सकती थी पर उसे गलत साबित तो नहीं होने दिया होता... कम से कम उसे एक गुनाहगार की मौत तो नहीं मरना पड़ता... लड़की उस लड़के की मौत की सबसे पहली कारण...

अब परिवार की बात.. जहाँ बचपन से प्रेम के पाठ सिखाये जाते है... पर प्यार करने पर समाज का सबसे बड़ा दुश्मन माना जाता है. अगर परिवारवालों ने उनके प्यार का साथ दिया होता या उन्हें दुसरे तरीके से अच्छे-भले-बुरे की बात समझाई होती तो शायद न वो घर से भागते और न लड़के को असमय मृत्यु से मुलाक़ात करनी पड़ती. उस लड़के की हत्या में परिवारवालों का स्थान और हाथ दूसरा है...

अब समाज की बात... एक ऐसा समाज जो धर्मों के नाम पर दंगे तो बर्दास्त कर सकता है पर प्यार के नाम पर दो जाति तक नहीं... अगर दो अलग-अलग जाति के दो लोग एक साथ प्यार से रहे, खुश रहे तो इन्हें समस्या होती है पर एक ही जाति के समाज की तथाकथित स्वीकृत शादी के दो लोग अगर खुश न रहे, लड़ते-झगड़ते रहे तो इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता... एक बात तो निश्चित तौर पर कह सकता हूँ कि लड़के की गिरफ्तारी और झूठे आरोप के बाद समाज ने उसके परिवार वालों की बेइज्जती में कोई कमी नहीं रख छोड़ी होगी... लड़के की हत्या के तीसरे और महत्वपूर्ण भागीदार है ये समाज...

अब कोई मुझे जवाब देगा कि लड़के को तो उसके गलती की सजा मिल गयी या उसने खुद दे दी... पर इन तीन हत्यारों को सजा कौन देगा???... लड़के और उसके परिवार को इन्साफ कौन दिलाएगा??? 

कुछ कहना चाहता हूँ...

मंगलवार, 1 मई 2012

सुनो
आज मैं तुमसे
कुछ कहना चाहता हूँ
कुछ ऐसा जो न तुमने सुना हो कभी
कुछ ऐसा जो न मैंने कहा हो कभी
कि सुनो
आज मैं तुमसे
कुछ कहना चाहता हूँ
मैं कहना चाहता हूँ
कि एक नयी रौशनी से मुलाकात हुई है मेरी
जिंदगी मेरी अंधेरों से गुजर रही थी अब तक
और आज उजालों की चादर लपेट नाच रही है
जिन आखों में तन्हाइयों की परछाई थी
आज उनमें तेरे इन्तेजार पल रहे है
सुनो
आज मैं तुमसे
कुछ कहना चाहता हूँ
तेरा इन्तेजार
और तेरा प्यार
जीने की वजह बन गयी है मेरी
तुझे अपना बनाऊं
ये जिद हो चुकी है
कि सुनो
आज मैं तुमसे
कुछ कहना चाहता हूँ
कल तक अकेला था
और आज तेरी यादों का साथ है बांहों में मेरी
हर पल अपने दिल में
धड़कन महसूस करता हूँ तेरी
जब देखता हूँ अपनी आत्मा की तरफ
तो तू ही दिखाई पड़ती है मुझे
कि सुनो न
आज मैं तुमसे
कुछ कहना चाहता हूँ
तेरे इन्तेजार में तड़प तो बहुत है
पर पता नहीं क्यों
मोहब्बत-सी हो गयी है इस इन्तेजार से
कि सुनो
आज मैं तुमसे
सिर्फ इतना ही कहना चाहता हूँ
कि तुझे जिंदगी मानता हूँ अपनी
और तुझसे बहुत मोहब्बत करता हूँ मैं...

आज मैं उड़ना चाहता हूँ...

शनिवार, 28 अप्रैल 2012
आज मैं उड़ना चाहता हूँ
खुले आकाश में...
समुन्दर के पार...
नदियों के साथ उड़ना चाहता हूँ
मेरे शब्दों के पर लगा के उड़ना चाहता हूँ
पर्वतों को हथेली पे उठा के...
आकाश को बदन पे लपेट के...
हवाओं को मुट्ठी में बंद करके उड़ना चाहता हूँ
तेरे प्यार को किस्मत बना के उड़ना चाहता हूँ
फूलों की खुशबुओं को दिल में बसा के...
काँटों की चुभन को सीने में छुपा के...
जंगलों के आर-पार उड़ना चाहता हूँ
जीवन के नए सहर को आँखों में बसा के उड़ना चाहता हूँ
आज मैं उड़ना चाहता हूँ...
इतना ऊँचा कि सूरज भी सर उठा के देखे मुझे
इतना तेज कि कोई रौशनी भी छू न सके मुझे
आज मैं उड़ना चाहता हूँ...
तेरे संग मैं दुनिया के पार तक उड़ना चाहता हूँ...
आज मैं उड़ना चाहता हूँ...

मैं तुमसे प्यार नहीं करती...

बुधवार, 25 अप्रैल 2012
"मैं तुमसे प्यार नहीं करती."
"प्यार नहीं करती? फिर वो क्या था जो हमारे बीच पिछले चौदह महीनो से चल रहा था?"
".... कुछ नहीं."
"क्या मतलब है कुछ नहीं?"
"मैं बस मजाक कर रही थी."
"चौदह महीनो का मजाक? क्या तुम्हे एक बार भी नहीं लगा इस मजाक से मेरा क्या होगा? क्या बिगाड़ा था मैंने तुम्हारा जो तुम मेरे साथ ऐसा कर रही हो? किस गलती की सजा दे रही हो मुझे? सजा देने से पहले मेरा गुनाह तो बता दो..."
"मैं अब तुमसे बात नहीं कर सकती. मुझे भूल जाओ और किसी अच्छी लड़की से शादी कर लेना."
"तुम्हे भूल जाऊँ? पर कैसे? और किस अच्छी लड़की से? वो भी तुम्हारी तरह मजाक करने वाली निकली तो मेरा क्या होगा?"
"तुम्हे जरूर अच्छी लड़की मिल जाएगी. मुझसे भी ज्यादा अच्छी..."
"क्या गारंटी है कि मुझे अच्छी लड़की मिल जाएगी और मेरी जिंदगी फिर बर्बाद नहीं होगी? तुम ये गारंटी दोगी? दोगी मुझे लिखित गारंटी कि अगर भविष्य में मेरे साथ फिर बुरा हुआ तो उसकी जिम्मेदार तुम और तुम्हारे घर वाले होंगे? जाओ-जाओ सहर... मुक्त किया मैंने तुम्हे... तुम्हे मेरे जीवन की चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है. वैसे भी तुमलोगों को मुझे जितना बर्बाद करना था कर लिया, अब मेरी जिंदगी मुझपर छोड़ दो और रहने दो मुझे मेरे हाल पर. तुम्हारे मजाक का बहुत-बहुत शुक्रिया सहर, बहुत-बहुत शुक्रिया. दुआ करूँगा कि तुम कभी फिर किसी और से प्यार न करो... अगर मुझसे मजाक में भी एक पल के लिए भी प्यार किया हो तो उस प्यार की कसम किसी और के साथ मजाक करके उसकी जिंदगी बर्बाद न करना."


मैं जानता हूँ सहर तुम जो भी बोल रही थी वो झूठ बोल रही थी. मैं जानता हूँ तुम मजबूर हो. तुम्हारे हर शब्दों के पीछे छिपे दर्द को अपने दिल पर महसूस कर रहा था मैं. कल तक तो सब ठीक था हमारे बीच और आज अचानक दुनिया ने मिलकर हमारी दुनिया ही बिखेर दी. जानता हूँ मैं, अभी तुमसे काफी सख्ती से बात कर रहा था मैं. पर क्या करता, मैं भी मजबूर था. मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे दिल से भुला दो और कोई ऐसा तुम्हारे जीवन में जो तुमसे इतना प्यार करे कि मेरे नाम की लकीरें तक मिट जाये तुम्हारे जेहन से. लेकिन एक वादा है मेरा तुमसे मैं कभी तुम्हे भूल नहीं पाऊंगा. चाह के भी नहीं भूल सकता मैं तुम्हे. मैंने तुम्हे अपनी पत्नी स्वीकार चूका था मैं और एक पत्नी के होते हुए मैं दूसरी शादी कैसे कर सकता हूँ.... तुम मेरे साथ रहो या न रहो पर मेरी सहर हमेशा मेरी यादों में मेरे साथ, मेरी बाहों में रहेगी...

ये कोई कहानी नहीं बल्कि एक हकीक़त है. कल ऑफिस से लौटते वक़्त बस में अपने बगल में बैठे एक लड़के की बातचीत सुन रहा था... उधर की आवाज भी साफ़-साफ़ सुनाई दे रही थी... अंतिम के वाक्य उसके मन के ही वाक्य है... अब आप पूछेंगे कि मैंने उसके मन की बात कैसे जानी तो उसके बातचीत के बाद जब उसे रोता देखा तो खुद को रोक न सका और बात करने के लिए मजबूर हो गया... उसने कोई आप-बीती नहीं सुनाई बस यही कुछ वाक्य कह कर अगले ही बस-स्टॉप पर उतर गया... उसी के कहे शब्दों के आधार पर अपनी सोंच को घोल के लिख दिया.... उसके लिए सिवाय दुआ के कुछ भी नहीं मेरे पास... मुझे नहीं पता क्या हुआ उसके साथ... पर जो भी हुआ जरूर गलत हुआ... क्या मजबूरियाँ थी उस लड़की के साथ ये भी नहीं जानता पर इतना बड़ा फैसला लेने में उसे तकलीफ जरूर हुई होगी... पर उनकी इस बातचीत के आधार पर इतना तो कह सकता हूँ कि दोनों ने सच्चे दिल से एक दुसरे से प्यार किया है जो कि आज कल देखना थोडा मुश्किल सा है... लड़की का नाम "सहर" काल्पनिक है क्योंकि किसी की भावना का मजाक नहीं उडाना चाहता हूँ...

ख़ामोशी... बहुत कुछ कहती है...

शनिवार, 21 अप्रैल 2012

रोज सोंचता था कि आज तो कुछ लिखूंगा. पर रोज यही होता कि एक भी शब्द नहीं मिलते. परन्तु आज तो जिद ठान ही ली मैंने लिखना तो है. चाहे जैसा भी लिखूं, पर लिखना है... पता नहीं क्या लिखूंगा पर लिखूंगा... बस बैठ गया हूँ लिखने.... अब मैं पहले बता देता हूँ कि अगर पढ़ कर बोर होइएगा तो मुझे दोष तो बिलकुल मत दीजियेगा... सच कह रहा हूँ वैसे भी मैं कुछ ख़ास तो लिख नहीं पता... जो भी उट-पटांग मन में आता है उतार देता हूँ और घोषित कर रखा है मैंने भी खुद को ब्लॉगर...

आज मैं बात करना चाहता हूँ उस दिन की जिसकी चर्चा मैंने अपने लास्ट पोस्ट में की थी... हाँ अपने सगाई वाले दिन की. १४ अप्रेल २०१२... वैसे तो सबकुछ पहले से प्लान था पर फिर भी सबकुछ अजीब और अनजाना सा लग रहा था. अपने ऑफिस के काम की व्यस्तता के कारण सुबह ही पहुँच पाया था अपने घर. दिल्ले से लगभग १५०० किलोमीटर दूर बिहार का एक जाना-पहचाना सा शहर, पूर्णियां... यही मेरा जन्म-स्थान और मेरा घर है. सुबह से शाम चार बजे का वक़्त कुछ काम करते हुए, आराम करते हुए और थोडा-बहुत बाजार घूमते हुए बीता. घर में कुछ कहा-सुनी भी हुई तो जीजाजी की सलाह भी मिली. सगाई में कुछ ही गिने चुने लोगों को आमंत्रण था जिनमें से कुछ ऐसे लोग भी थे जो मुझे पसंद नहीं या जिन्हें मैंने पसंद नहीं... खैर ये तो हर घर की बात है... मन में एक अजीब सी घबराहट भरी इन्तेजार के बाद वो वक़्त भी आया जब मुझे अपने सगाई वाले स्थल पर पहुंचना था. शहर के मुताबिक़ एक अच्छे से होटल के एक छोटे से हॉल में अच्छी सजावट के साथ अच्छी सी व्यवस्था थी. लगभग सारे मेहमान आ चुके थे. दाखिल होने के बाद मैं भी अपने जीजाजी 'राजीव' के साथ एक कोने में बैठ गया. मेरी जिंदगी एक ऐसी लड़की से जुड़ने वाली थी जिसे मैंने देखा तक नहीं था. एक अनचाहा और अनजाना सा डर मन में घर कर चूका था. न चाहते हुए भी आँखें उस चेहरे को देखने के लिए दरवाजे पर बार-बार जा रही थी. और वो एक पल जब अचानक से उसका उस हॉल में दाखिल होना. बस एक झलक देख पाया था. लगभग दुल्हन के रूप में उसका शांत और शरमाया हुआ चेहरा नीचे जमीन में खुज ढूंढता हुआ सा लग रहा था. ऐसा लगा जैसे वो धरती की लकीरों में जरूर हमारी किस्मत ढूंढ़ रही होगी. थोड़ी देर के रीति रिवाजों के बाद एक दुसरे को अंगूठी पहना दी पर एक बार भी उसके चेहरे को जमीन से उठता हुआ नहीं देखा. उसकी इस नजाकत ने पहले ही पल मेरे दिल को कहीं भीतर तक छू लिया. मेरी होने वाली सालियों, मेरी भाभी और जीजाजी के हंसी मजाक के साथ वक़्त बीत चला.
राजीव जीजाजी और मेरी छोटी साली के ही पहल से पहली बार उससे बात करने का मौका मिला. पर पांच मिनट के उस अकेले मुलाकात में भी उसकी इक आवाज तक न सुन सका. घबराहट मेरे अन्दर भी थी और उसके चेहरे से भी झलक रही थी. पर बात तो शुरू करनी थी. बिना सोंचे कुछ बातें प्रारभ कि तो पर जवाब उसके गले से निकल नहीं पाया. इसे शर्म कहूँ या नजाकत या फिर उसका मुझ अनजान के लिए घबराहट एक बार भी उसका चेहरा मेरी तरफ नहीं उठा और उसे देखने की इच्छा मन में ही रह गयी. ०९ मार्च २००८ से (लगभग चार सालों से) अपने ब्लॉग को लिख रहा हूँ... नाम दिया था मैंने अपने ब्लॉग का "ख़ामोशी... बहुत कुछ कहती है" और इसे सार्थक होता हुआ उस वक़्त महसूस कर रहा था... भले ही वो ख़ामोश थी पर सच में ऐसा लग रहा था जैसे बहुत कह दिया हो उसने... पर उसे इस तरह घबराता देखने की हिम्मत और बची नहीं थी इस लिए जल्द ही उसे छोड़ के निकल आया. लगभग रात के आठ बज चुके थे और अपनी व्यस्तता के ही कारण अगली सुबह चार बजे ही दिल्ली के लिए वापस रवाना भी होना था इसलिए अपने घर को प्रस्थान कर गया एक उम्मीद और इन्तजार लेकर. इन्तेजार उसकी दूसरी मुलाक़ात का और उम्मीद कि उसने मुझे पसंद किया होगा. अब तो अपनी आने वाली जिंदगी से मुलाक़ात हमारी शादी में ही होगी. मुझे नहीं पता कि वो क्या सोंचती है, पर उसकी सोंच को पूरा करने की कोशिश जरूर करूँगा.

घर तो वापस आ गया था पर मन का एक कोना उसके पास ही छोड़ के आ गया था. एक कसक थी उसे न देख पाने की, उसकी आवाज न सुन पाने की. पता नहीं ऐसा क्यों था... जिसे जानता तक नहीं जिसे उस दिन से पहले देखा भी नहीं उसके लिए ये भावनाएं क्यों थे... जिस दिन मेरे परिवार ने उसे मेरी किस्मत से जोड़ा था उसी पहले दिन से मैंने उसे अपनाने की कोशिश की है... अपने अतीत को उसी दिन पीछे छोड़ दिया ताकि उसे अपना आने वाला कल दे सकूँ... अपने दिल से पूरी कोशिश की है कि उसे उसका पूरा हक़ और अपनी इमानदारी दे सकूँ... पर थोडा अपने किस्मत और अपनी आदतों से भी डरता हूँ... डरता हूँ कि कहीं किसी के साथ नाइंसाफी न कर जाऊं... अपने आने वाले दिनों के लिए उसके लिए और अपने परिवार के लिए फिर से एक नयी कोशिश करूँगा... बाकी तो समय, किस्मत और मेरी जिंदगी फैसला करेगी... अपने जाने की तैयारी कर लेने के बाद जब दो तीन घंटे बचे तो बिस्तर पर लेटे हुए कुछ पंक्तियाँ यूँ ही दिमाग में चली आई...

"दीदार हम भी कर लेते खुदा के अक्स का,
मेरे चाँद ने अपना चेहरा उठाया तो होता...
आत्मा अधूरी ही रह गयी मेरी,
मेरी जिंदगी का खुबसूरत आवाज सुनाया तो होता...
वो बैठे थे मेरे सामने पर लगा जैसे बहूत दूर रहती है,
उनकी ख़ामोशी मेरे दिल से बहुत कुछ कहती है,
हम मौत तक रुक भी जाते उन्ही के छाँव तले,
एक बार उन्होंने ख़ामोश लब से ही सही... बुलाया तो होता..."

आप सबकी दुआओं का इन्तजार रहेगा... और मालूम है हर बार की तरह आप मुझे जरूर देंगे... वहां से जल्दी चले आने के कारण तसवीरें ला नहीं पाया पर जल्द ही उपलब्ध करूँगा... बाकी मिलते है फिर मेरी हर बार की तरह ख़ामोशी के साथ जल्द ही...

(चित्र साभार: गूगल से)

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